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Editorial/सम्पादकीय News

ठोस होते शहर और उनके फुफ्फुस/फेफड़े

आवास की आवश्यकता दिनोदिन बस्तियों, शहरों महानगरों को आकाश रहित अर्थात स्पेस लैस करती जा रही है,,, किसी भी शहर में बसने की इच्छा,, और वह भी नगर के बीचों बीच, येन केन प्रकारेण,, हर सम्भव मार्ग से,, कानूनों को ताक पर रख कर,, बस्तियों, शहरों, महानगरों का दम घोंट रही है ,, जहाँ कहाँ कहीं भी पूर्ववर्ती इमारतों के बीच थोड़ी सी भी जगह दिखती है,, वही स्थान चिन्हित कर उस पर नयी इमारत सरकार की स्वीकृति से बना ली जाती है,, अब शिमला को ही ले लें,, अगर ड्रोन से वीडियोग्राफी की जाय तो पेड़ नदारद मिलेंगे,, सब ओर से भी अगर शिमला का छाया चित्रण किया जाय इमारतें ही इमारतें दृष्टव्य होंगी,, खाली स्पेस कहीं नज़र नहीं आयेगा,,, वास्तव में नगर भी खुले खुले होने चाहिए,, वो भी सांस लेते हैं,, उन्हें भी फुफ्फुस या फेफड़ों की आवश्यकता है,, उन्हें सांस आयेगा तभी शहर की वायु शुद्ध होगी और स्थानीय लोग स्वस्थ हो पायेंगे,, शहरों के बीच में जो खुला स्थान है उसे खुला ही रहने देना चाहिए,, उसका आबंटन किसी भी नगरवासी या किसी संस्थान को नहीं होना चाहिए,, अगर नये संस्थान खोलने की आवश्यकता हो तो नगर या शहर का फैलाव बाहर की ओर होना चाहिए,, शहर के बीचों बीच पार्कों के लिए स्थान अवश्य ही खुले रहने चाहिए.नगरों का बसाव अगर खुला खुला होगा तो अन्य जन सुविधाओं यथा सैनिटेशन इत्यादि के लिए भी सहज ही उपलब्ध होगा. सब जानते हैं कि अगर फुफ्फुस ठोस हो जायें तो व्यक्ति को सांस लेने के लिए स्थान नहीं बचेगा और उसकी मृत्यु निश्चित रूप में हो जायेगी,, इसी प्रकार शहर या नगर भी रहने के काबिल नहीं रहेंगे तो उनका सौंदर्य मिट जायेगा, सैलानी उधर का रुख नहीं करेंगे, आमदन के साधन घट जायेंगे और नया शहर बस जाने के बाद पुराना नगर उपेक्षित रह कर उजड़ जायेगा,, हमको नयी बस्तियाँ बना कर पुरानी बस्तियों को भी रहने के काबिल बनाये रखना चाहिए,, और यह सभी के लिए लाभकारी होगा।

✍️ जयनारायण कश्यप

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