पुस्तक समीक्षा
एक और सफ़र
लेखक : जय नारायण कश्यप
प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज
पृष्ट : 186
मूल्य : रूपए 225
माता-पिता तथा शिक्षकों को शिक्षा देता एक उपन्यास
इस उपन्यास में हिमाचल प्रदेश के दो लड़कों की कहानी है l एक लड़का हमीरपुर से तथा दूसरा सिरमौर से है l हमीरपुर वाले लड़के का नाम अध्रुव है और आयु है बारह वर्ष l सिरमौर वाले लड़के का नाम है गुलशन कुमार उर्फ़ गुल्लु तथा आयु है चौदह वर्ष l दोनों के परिपेक्ष्य अलग-अलग हैं l किन्तु समस्यायें तथा महत्वकांक्षायें दोनों की एक सी ही हैं l दोनों घर से भाग जाते हैं और दोनों की कहानी भी साथ-साथ ही चलती है l अध्रुव बहुत ही गरीब परिवार से है तो गुलशन एक सम्पन्न परिवार से है l दोनों का मन पढ़ने में नहीं लगता है l अध्रुव पैसा कमाना चाहता है तो गुलशन का शौक फिल्मी दुनिया मे जाकर एक्टर बनने का है l उसके पिता चाहते हैं कि वह पढ़ लिख कर डॉक्टर या इंजिनियर बने l एक्टर बनने के शौक में वह रात- रात भर घर से बाहर जाकर नाटकों में भाग लेता है l इसके पिता को नाटकों में भाग लेना बुरा लगता और इस पर आये दिन उसकी बुरी तरह से पिटाई करता है l घर से भागे दोनों भले ही अलग-अलग स्थानों तथा रास्तों से चले पर दोनों दिल्ली जैसे बड़े शहर में पहुँच जाते हैं और एक साथ मिल भी जाते हैं और मिलकर एक साथ काम भी करते हैं l अध्रुव अपने गाँव से भागकर जंगल व नदी-नालों को पार करता हुआ तथा भेड़ें चराने वाले गडरिये के साथ रात गुजारता हुआ शाह तलाई में बाबा बालकनाथ के मंदिर में पहुँच जाता है l उधर गुलशन घर से पैसे चुराकर अपने गाँव से पैदल चल कर राजगढ़ से बस लेकर चंडीगढ़ पहुँच जाता है l चंडीगढ़ पहुंच कर वह दिल्ली के लिये बस लेता है l बस में उसे हिमाचल से ही शुभेन्द्र नाम का एक लड़का मिलता है, जो बी. कॉम ग्रेजुएट है तथा लालकिले के सामने इलेक्ट्रिकल्स डेकोरेशन्स पीसीज़ व एप्लायंसिज़ के एक बड़े शोरूम की मालकिन के यहाँ एकाउंट्स का काम देखता है l शुभेन्द्र उससे बात शुरू करता है और बातों-बातों में ही पता लगता है कि गुलशन पर बम्बइया फिल्मों का भूत सवार है और घर से भाग कर मुम्बई जाना चाहता है l उसे लगा कि वह कहीं गलत हाथों में पड़कर बर्बाद ने हो जाये, इसलिये उसे समझा बुझा कर दिल्ली अपने ही कमरे में ले आता है l उधर अध्रुव बाबा बालकनाथ जी के मंदिर में भंडारे में अपना खाना खा लेता है, वहीं सराय में सो जाता है l मंदिर के भंडारे में जूठी पत्तलें उठाने तथा सफाई का काम बहुत अच्छी तरह से करता है l इसी बीच दिल्ली से आये एक सेठ की नज़र अध्रुव पर पड़ती है l सेठ का प्लास्टिक के डिब्बे बनाने तथा उन्हें बेचने का बहुत बड़ा कारोबार है l वह अध्रुव को प्लास्टिक के डिब्बे बनाने के काम के लिये दिल्ली ले आता है. सेठ के अन्य कारीगिर उसे प्लास्टिक के डिब्बे बनाना सिखाते हैं, कुछ दिन वह वहां काम भी करता है, किन्तु उसका मन वहां नहीं लगता और वह उस सेठ की नौकरी छोड़ देता है l कुछ दिन दिल्ली के भिन्न-भिन्न बाज़ारों में टक्करें मारता है और इसी बीच आढ़तियों के दाव-पेच सीख लेता है और धीरे-धीरे एक सफल अढ़ती बन जाता है, और अपनी महत्वकांक्षा को मूर्त रूप देता हुआ खूब पैसा कमाता है l
उपन्यास का मुख्य पात्र गुलशन दिल्ली पहुँचने पर शुभेन्द्र के मार्गदर्शन पर काम करने लगता है l शुभेन्द्र उसे एक बिजली के उपकरणों की मुरम्मत करने वाले की दुकान पर एक सहायक के रूप मे काम करने के लिये रखवा देता है l इसी बीच गुलशन की सौभाग्य से आकाशवाणी में संगीत विभाग में काम वाले एक संगीतकार श्रीमाली तथा उनकी पत्नी सुगंधा से भेंट हो जाती है. गुलशन सुरीली बांसुरी बजाना तो जानता था, श्रीमाली जी के यहाँ वह तबले की संगत पर बांसुरी बजाने तथा गाने की प्रतिदिन रियाज़ भी करने लगा l श्रीमाली जी की सहायता से अब उसे आकाशवाणी में छोटे-मोटे कार्यक्रम करने के भी अवसर मिलने लगे l अपने संगीत के शौक के साथ-साथ वह बिजली का काम भी सीखता रहा और कुछ समय बाद उसने अपने स्वयं का गलो साइन बोर्ड्स तथा प्लास्टिक की नेम प्लेट्स बनाने का काम शुरू कर दिया l इस काम में सुगंधा जी, शुभेन्द्र, तथा अध्रुव ने उसकी सहायता की l कुछ दिनों में उनका काम अच्छा चल पड़ा l अब गुलशन, शुभेन्द्र तथा अध्रुव ने दुकान पर आने वाले हिमाचल के लोगों की सहायता से हिम कला संगम नाम की एक संगीत व नाटक संस्था बना ली और छोटे-छोटे कार्यक्रम करने लगे l अपनी लगन और रियाज़ के बलबूते पर उन्होंने दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय मेले में भी हिमाचल के नाटक तथा करयाला का एक सफल मंचन भी किया l हिमाचल के इन लोगों ने केन्द्रीय ऑडिटोरियम तथा दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर कुछ नाटक भी किये l उधर गुलशन तथा अध्रुव का कारोबार भी अप्रत्याशित प्रगति करता रहा l गुलशन की एक्टर बनने की अनबुझी प्यास ने अब उसे एक फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया. संयोग से धन, तकनीकि ज्ञान, निर्देशन तथा अन्य साधन भी धीरे-धीरे जुड़ते गये. नाटक व फिल्म जगत के जानकार लोगों का साथ भी मिल गया l फिल्म का शीर्षक “छुट्टी, सदा के लिये” रखा गया l इसमें स्कूल में पढ़ने वाले एक बच्चे की दुखद कहानी है l इसमें दिखाया गया की किस प्रकार नवमी कक्षा में पढ़ने वाला एक बच्चा माता-पिता तथा अध्यापकों की लापरवाही का शिकार होता है l सन्देश साफ़ था, “बच्चों को प्यार से न समझा पाना मां-बाप की या गुरुओं की असफलता है” l बहुत परिश्रम के बाद फिल्म बनके तैयार हो जाती है l समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में दिये गये विज्ञापनों की सहायता से एक प्रसिद्ध डिस्ट्रीब्यूटर भी मिल जाता हैं l फिल्म सात बड़े शहरों में एक साथ रिलीज़ होती है l जालंधर में रिलीज़ होने वाले प्रीमियर शो से ही पता लग जाता है कि यह फिल्म “बच्चों को बच्चों के कोण से ही समझना चाहिये” के संदेश को देने में सफल होगी l इस तरह गुलशन तथा अध्रुव का एक सफ़र पूरा हो जाता है और फिर वे अपने एक और सफ़र को आरम्भ करेंगे l
उपन्यासकार ने इस मार्मिक उपन्यास को बहुत ही अच्छे शब्दों द्वारा लिखा है l शब्दों को इस प्रकार गुंथा है कि पढ़ते ही एक सजीव चित्र पाठक के सामने प्रस्तुत हो जाता है l पाठक उपन्यास के पात्र अध्रुव के साथ कभी प्लास्टिक की फैक्ट्री मे पहुँच जाता है तो कभी दिल्ली के बाज़ारों – पहाड़गंज, चावड़ी बाज़ार, चांदनी चौक की पटड़ियों व रेहड़ियों को देखता हुआ, क़ुतुब रोड़ से चलते हुये सदर बाज़ार, बाराटूटी, खारी बावली होता हुआ फतेहपुरी पहुँचकर खाना खाने लग पड़ता है l और कभी गुलशन की ग्लो साइन बोर्ड की फैक्ट्री तथा आलिशान ऑफिस में पहुंचकर उसके कारोबार की बारीकियों तथा वैभव को देखकर दंग हो जाता है l इस कहानी के साथ-साथ लेखक ने सामाजिक भ्रष्टाचार, शिक्षा व स्वास्थ्य की बदहाली, काले धन और सफेद धन, तथा अन्य सामाजिक बुराइयों का भी शक्तिशाली चित्रण किया है l सन 1984 के शर्मनाक दंगों का वर्णन, जिसमें अध्रुव का एक साथी खजाना राम मारा जाता है, सचमुच ही रोंगठे खड़े करने वाला है l उपन्यास में कुछ ऐसे वाक्य भी हैं जो पाठक को घंटों सोचने के लिये मजबूर कर देते हैं l उदहारण के लिये, “व्यापार की अधिकतर शाखाओं में डर बिकता है, जैसे बीमा व स्वास्थ्य इत्यादि में”, ग्लो साइन बोर्ड्स के ऊपर लिखा हुआ नारा, “मुस्कराहट अमूल्य है, इसे बच्चों से न छीनें”l
इस शिक्षाप्रद उपन्यास का स्कूलों, कॉलेजों तथा जिला पुस्कालयों को आवश्यक रूप से खरीदा जाना चाहिये l अध्यापकों के विभिन्न प्रशिक्षणों के पाठयक्रमों में इस उपन्यास का शामिल किया जाना बहुत उपयोगी होगा l अध्यापकों तथा अभिवावकों को यह समझना बहुत आवश्यक है कि बच्चों को बच्चों के ही दृष्टिकोण से देखना चाहिये l उन पर अपने मापदण्ड थोपकर उन्हें दण्डित नहीं करना चाहिये l कुछ दिन पहले एक समाचार आया था कि हिमाचल में कांगड़ा में एक फिल्म सिटी का निर्माण हो रहा है l यदि यह फिल्म सिटी बनती है तो यह उपन्यास उसके लिये एक सफल कहानी दे सकता है l संक्षेप में यह उपन्यास एक स्वागत योग्य प्रयास है l
✍️ डॉ. पद्मनाभ गौतम, प्रोफ़ेसर (एमिरीटस)
लोक प्रशासन विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला,
निवास: गौतम कुटीर, संजौली, शिमला-171006