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पुस्तक समीक्षा  साहित्य

जो सुख छज्जू दे चौबारे, ओ बलख न बुखारे

कहावतों और लोकोक्तियों की दुनिया रहस्यमयी होती है। इनका अपना इतिहास और मजबूत आधार है इसलिए इनकी उम्र मानव सभ्यता जितनी होती है। यह कहावतों की ताकत ही है कि हम इन्हें याद रख पाते हैं परंतु इनका इतिहास भूल जाते हैं। आपने ऐसी ही एक मशहूर कहावत सुनी होगी, ‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, ओ बलख न बुखारे।’ बल्ख और बुखारा दो समृद्ध शहर रहे हैं। ज़ाहिर है कि इन दोनों ऐतिहासिक व्यापारिक केन्द्रों में सभी सुख- सुविधाएं रही होंगी।

कहते हैं कि लाहौर में पुराने अनारकली बाज़ार में छज्जू का चौबारा था जिसके अवशेष आज भी गवाही देते हैं। जौहरी छज्जू का पूरा नाम था लाला छज्जूराम भाटिया। दोमंजिले आवास की पहली मंजिल पर उसका कारोबार था। दूसरी मंजिल पर परिवार रहता था और उसी की छत पर उसने बनाया था एक चौबारा। इस चौबारे को फकीरों ने अपना डेरा बना लिया था। इस चौबारे पर फकीरों की धूनी भी रमती थी और भजन-कीर्तन व सूफियों का नृत्य भी चलता था।

छज्जू का मन अध्यात्म में रमता गया। उसने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा फकीरों, भक्तों व जरूरतमंद लोगों पर खर्च करना शुरू किया। शीघ्र ही उसे छज्जू भगत कहा जाने लगा। लोग तब अक्सर कहते थे कि इस चौबारे पर आकर रूहानी सुकून और मानसिक शांति मिलती है। सत्रहवीं शताब्दी में उसका चौबारा फकीरों का डेरा बन गया। फकीर दिन में वहां धमाल नृत्य करते और तालियों के बीच गाते, ‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, ओ बलख न बुखारे’।

कथा – साहित्य में लोककथाओं और ऐतिहासिक कथाओं का अलग महत्त्व है। लोककथाओं में प्रेम, सत्य घटनाओं का ज़िक्र, रोमांच, रहस्य आदि पाठकों को पढ़ने के लिए उत्सुकता पैदा करते है। ऐतिहासिक कथाओं में समय – अवधि, राजनीतिक घटनाक्रम, देश, काल और परिस्थितियों का वर्णन रहता है जोकि रोचकता बनाए रखते हैं। राजी के साहित्य में जो ख़ास बात है, वह यह है कि पाठकों को मौलिक सामग्री के साथ – साथ इतिहास में दफ़न किस्सों और कहानियों को पढ़ने का आनन्द भी मिलता है।

गंगा राम राजी सामान्य घटनाओं को भी अपनी शैली से प्रभावशाली बनाने में सक्षम हैं। राजी का कथा संसार रोमांचक और रहस्यमयी तो है ही, साथ में अपने आसपास के परिवेश, सम्बन्धों, लोक, समाज, संस्कृति आदि से पूरी तरह प्रभावित भी है। यही कारण हैं कि राजी का अपना एक अलग ही पाठकवर्ग और साहित्यिक दुनिया है। गंगा राम राजी बनना आसान नहीं है। लेखन के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, मित्रों से लगाव, अपनों से आत्मीयता, रिश्ते – नातों से मेलजोल, बेबाकी, निडरता, निश्छलता, भोलापन, घुमक्कड़ी और ख़ुशमिजाज़ी एक व्यक्ति को गंगा राम राजी बनाते हैं। दरअसल राजी महल के किस्सों के बादशाह हैं गंगा राम।

‘छज्जू के चौबारे’ पढ़ने के अपने सुख हैं। पाठक संस्मरणों और लोककथाओं के साथ – साथ इतिहास के पन्नों में छिपी कहानियों का भी आनन्द उठाता है। राजी की कहानियां हों, चाहे उपन्यास हों या कथेतर साहित्य हो, कहन की एक अलग भाषा और शैली है। यह भाषा इतनी सरल और सम्प्रेषणीय है कि अचम्भा होता है। दरअसल सरलता को साधना बड़ा कठिन कार्य है। यही राजी की उपलब्धि है कि उन्होंने अपनी एक अलग ही किस्म की सरल भाषा ईजाद की है। इस कथेतर साहित्य की पुस्तक में निजी जीवन के अनुभवों से लेकर वैश्विक घटनाओं की व्याख्या राजी जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में की है जिसे राजी परम्परा का नाम भी दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह सृजन उनके अपने निजी अनुभव हैं। भोगा हुआ यथार्थ है। राजी स्वयं अनुभवों की पाठशाला हैं। एक ऐसी पाठशाला जहां यदि विद्यार्थी बनकर प्रवेश किया जाए तो सीखने के तमाम औज़ार हैं। हिंदी साहित्य में गंगा राम राजी अपने अनोखे अन्दाज़ेबयाँ के लिए जाने जाएंगे।

शोधकर्ताओं के लिए राजी की पुस्तकें एक सम्पूर्ण प्रयोगशाला हैं जिसमें कहानी, उपन्यास और कथेतर साहित्य का भण्डार है। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक का हिंदी साहित्य में खुली बाहों से स्वागत होगा।

✍️ गणेश गनी

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