✍️ अनुराग शर्मा, शिमला
वैसे तो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता रहा है, लेकिन जिस तरह से मीडिया ने जनता की आवाज़ को बुलंद करने के लिए अपना दायरा विकसित किया है वह भी नितांत आवश्यक था। वर्षों पहले की अगर बात करें तो समाचार सिर्फ प्रिंट मीडिया जिसमे अखबार और पत्रिकाएं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सिर्फ दूरदर्शन और आकाशवाणी का ही जलवा था।
अपने दैनिक जीवन से कीमती समय निकाल कर समाचार पढ़ना, सुनना और देखना दैनिक दिनचर्या का ही भाग हुआ करता था, क्योंकि सारा दिन टेलीविजन या रेडियो पर समाचार प्रसारित नहीं हुआ करते थे और लाइव समाचार का तो रिवाज़ ही नहीं था। धीरे धीरे भारतीय मीडिया ने भी डार्विन के अनुकूलन के सिद्धांत को माना और महसूस किया की वैश्विक स्तर के मीडिया का मुकाबला करने के लिए खुद को बदलना होगा।
इसके कुछ समय बाद पत्रकारिता को पैसे कमाने का एक जरिया के रूप में देखा जाने लगा और जनता को उपभोक्ता के रूप में देखा जाने लगा। बहुत से नए नए 24 घंटे समाचार प्रसारित करने वाले चैनल भी दौड़ में शामिल होते चले गए। लेकिन अभी भी कुछ घर ऐसे थे जिनमें दूरदर्शन ही चलता था। दूरदर्शन और आकाशवाणी से प्रसारित खबरों को हमेशा से ही पुख्ता और विश्वसनीय माना जाता रहा है। लेकिन मीडिया की आधुनिक बनने की दौड़ में दूरदर्शन और आकाशवाणी पिछड़ते चले गए।
फिर खेल शुरू हुआ टी० आर० पी० का। यह टी० आर० पी० भी बड़े कमाल की चीज आई। असली दौड़ तो सबसे जल्दी अपने उपभोक्ताओं यानी जनता तक सबसे पहले समाचार पहुंचाने की थी। मीडिया के एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी। लाइव प्रसारण मीडिया के लिए संजीवनी बूटी की तरह काम कर गया, जिसमें बासी खबरों के लिए कोई जगह नहीं थी। लेकिन जो कभी समाचार हुआ करते थे वो अब बड़ी अपडेट बन चुके थे। सभी चैनल जोर जोर से चीखते चिल्लाते आपके सामने बड़ी अपडेट लेकर हम आए हैं जो किसी भी न्यूज चैनल में आपको देखने को नहीं मिलेगी इत्यादि बोल कर 1 से 2 मिनट के समाचार को बढ़ा चढ़ा कर खूब नमक मिर्च लगा कर घंटों प्रसारित करने लगे। जनता 1 से 2 मिनट के समाचार को कई कई घंटे बस इसी इंतजार में देखने लगी की आगे बड़ी अपडेट आने वाली है।
बहुत से चैनल समाचार के बाजार में आ चुके थे और जनता भी आधुनिक होती चली गई। बहुत से चैनल 2 से 5 मिनट की खबर को प्रसारित करके 10 से 15 मिनट का विज्ञापन चिपका देते तो जनता भी विज्ञापन शुरू होते ही चैनल बदल लेती और यह प्रथा अभी भी जारी है। इतने ज्यादा चैनल टेलीविजन पर दिखने लगे और यह निर्णय लेना मुश्किल होता चला गया की सर्वश्रेष्ठ चैनल कौन सा है। मीडिया चैनल वाले अपने आपको कुछ भी कहें लेकिन प्रत्येक जनमानस का पसंदीदा चैनल अलग अलग होता चला गया जो कि सिर्फ कभी दूरदर्शन ही होता था।
घटनाओं को लाइव दिखाने का नुकसान हमने 26/11 मुंबई हमले में झेला जिसमें हमनें कई बहादुर सैनिकों को खो दिया और सिर्फ एक आधुनिक गलती जो कि खबरों को बड़ी अपडेट के साथ सबसे जल्दी जनता तक पहुंचाने की थी। जब तक पता चला की लाइव दिखाई जाने वाली खबर दुश्मन भी देख रहा है और वो सब बड़ी बड़ी अपडेट अपने दहशतगर्दों तक पहुंचा रहे हैं, तब तक काफी नुकसान हम झेल चुके थे।
ऐसे ही बहुत नुकसान कश्मीर में भी हमने उठाया। हालांकि अब सुरक्षा की दृष्टि को मद्यनजर रखते हुए ऐसे लाइव प्रसारणों पर रोक लगा दी गई है। इस चौथे स्तंभ के अंदर भी बहुत से छोटे बड़े स्तंभ है जो कि समाचारों को प्रसारित करने का या ना करने का माद्दा रखते हैं। अब जैसे हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य की बात करें तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया महत्वपूर्ण पहलुओं पर नदारद मिलता है। आज जब भयंकर तबाही हिमाचल प्रदेश में हुई है तो इस आपदा में सब मीडिया चैनल वालों ने आपदा में अवसर ढूंढ लिया। जोर शोर से प्रदेश की तबाही की खबर दिखाई जाने लगी, अपने ही स्तर पर तबाही के कारणों का विश्लेषण किया जाने लगा।
लेकिन सिर्फ आपदा के समय पर ही पहाड़ों की तरफ अपने न्यूज़ चैनल के कैमरे का रुख करना सरासर गलत है। होना तो यह चाहिए की आम दिनों में भी प्रदेश की भौगोलिक परिस्थिति को समझा जाए और विश्व को दिखाया जाए, कि अभी भी कितना कठिन जीवन है पहाड़ों पर। सिर्फ अटल टनल और कीरतपुर मनाली हाईवे बन जाने से लोगों की दिनचर्या आसान नहीं हुई है, और यह बात प्रकृति ने भी सिद्ध करके दिखा दी। बेशक जितनी मर्जी तरक्की हम कर लें लेकिन पहाड़ों का जीवन हमेशा कठिन ही था, कठिन ही है और रहेगा भी।
उन क्षेत्रों की तरफ कैमरे की नजर कभी नही पड़ती जहां आजादी के कई दशकों बाद तक सड़क उपलब्ध नहीं है। लोगों को कई मील दूर चलकर अपने घरों तक जाना पड़ता है। घर पर कोई बीमार पड़ जाए तो दूर दूर तक उपचार नही मिलता, किसी गांव में आग लग जाए तो सारा का सारा गांव सर्दियों में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो जाता है। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने हेतु, रोजगार पाने हेतु गांव से लोगों के पालन को नही दिखाया जाता, सरकारों द्वारा कैसे किसी प्रदेश को खोखला किया जाता है नही दिखाया जाता।
कैमरे में सिर्फ कुल्लू मनाली और शिमला दिखता है वो भी जब यह शहर पर्यटकों से सराबोर होते हैं। चैनलों पर दिखाई जाने वाली खबरों का जनमानस पर बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है। जैसे "अब चंडीगढ़ से मनाली सिर्फ 4 घंटों में पहुंचें" तो जनता भी विश्वास कर के इन पर्यटक स्थलों की तरफ टूट पड़ती है। फिर उसके बाद जो मंजर होता है उस से तो सब वाकिफ ही हैं। चारों तरफ जाम हो जाम कूड़ा कचरा, गंदगी के ढेर लगते चले जाते हैं। लेकिन आपदा की स्थिति में मदद के हाथ बढ़ाने के बजाए अपने चैनल की टी०आर०पी० को बढ़ाते हैं और लोगों में भय और चिंता का माहौल बना दिया जाता है। कहते हैं ना की भीड़ बुरी नही है, भगदड़ बुरी होती है, हां बस उसी परिस्थिति का सामना जनता को न चाहते हुए भी करना पड़ जाता है।
✍️ अनुराग शर्मा
शिमला हि०प्र०