Himalayan Digital Media

Himalayan Digital Media

Editorial/सम्पादकीय News धर्म-संस्कृति साहित्य

संस्कृत संस्कृति के अनन्य उपासक आचार्य दिवाकर दत्त शर्मा

✍️ आचार्य डा कर्म सिंह

बात उस समय की है जब राजा श्री वीरभद्र सिंह जी हिमाचल प्रदेश की लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे और श्री प्रेम शर्मा जी निदेशक भाषा संस्कृति विभाग । उसी समय में हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी में अनुसंधान अधिकारी के पद पर कार्यरत था ।निदेशक होने के नाते श्री प्रेम शर्मा जी से अक्सर अकादमी के संबंध में परिचर्चा होती रहती थी। एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और बड़े आत्मीय भाव से बोले -देखो कारम ,राजा साहब चाहते हैं कि अकादमी में कोई योजना ऐसी शुरू की जाए जो साहित्यकारों द्वारा लंबे समय तक याद की जाए । मैंने उनसे निवेदन किया कि एक दिन में सोच कर आपको बताता हूं। फिर मैंने कुछ संस्कृत के विद्वानों के साथ परामर्श किया और अगले ही दिन आचार्य दिवाकर दत्त शर्मा जयंती का आयोजन अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष उनकी जन्म तिथि पर किए जाने का प्रसव रखा। प्रेम शर्मा जी स्वयं भी आचार्य दिवाकर जी के प्रति श्रद्धा रखते थे क्योंकि वे संस्कृत संस्कृति के महान निर्विपद विद्वान धे और राजा श्री वीरभद्र सिंह जी भी उनका बहुत सम्मान करते थे। उसी शाम को प्रेम शर्मा जी फाइल लेकर माननीय मुख्यमंत्री महोदय के पास गए और उन्होंने स्वीकृति प्रदान कर दी । तब से हर वर्ष 28 अक्टूबर को आचार्य दिवाकर दत्त जयंती का आयोजन अकादमी द्वारा प्रांतीय सर पर किया जाता है। इस अवसर पर संस्कृत सेमिनार, परिचर्चा और कवि सम्मेलन तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें प्रांत के विभिन्न भागों से प्रतिभागी संस्कृतज्ञ भाग लेते हैं‌।

आचार्य दिवाकर दत्त जी के मानस पुत्र आचार्य केशव राम शर्मा द्वारा श्रीमद् आचार्य दिवाकर दत्त चरितम् एक मोनोग्राफ भी अकादमी द्वारा प्रकाशित किया गया, जो अब उपलब्ध नहीं है।

आचार्य दिवाकर दत्त जी ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव धामी में प्राप्त करके प्रदेश से बाहर संस्कृत का गहन अध्ययन करने के पश्चात् हिमाचल प्रदेश को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। प्रारंभ में गंज बाजार में एक छोटे से भवन में सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय का भिक्षा मांग कर संचालन करते रहे। अनेक वर्षों तक न कोई वेतन, न कोई सुविधा , न धन न, वैभव केवल संस्कृत और संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग और निस्वार्थ सेवा का भाव उनके व्यक्तित्व का आकर्षण बना बना । भागवत कथा, ज्योतिष, कर्मकांड के माध्यम से भी वे संस्कृत संस्कृति का प्रचार प्रसार करते रहे। आचार्य दिवाकर दत्त के कई वर्षों के संघर्ष के बाद राजकीय नेहरू संस्कृत महाविद्यालय फागली में स्थापित हुआ।आज यह महाविद्यालय सरकार द्वारा निर्मित एक भव्य भवन में स्थापित किया गया है जिसका एकमात्र श्रेय आचार्य दिवाकर दत्त जी की साधना को जाता है।

आचार्य दिवाकर दत्त जी ने यह सफर अकेले शुरू किया परंतु शिष्य उनके पीछे जुडते गए और उन्होंने भी अपने शिष्यों को पुत्रवत् आत्मीयता एवं वात्सल्य और शिक्षा प्रदान करते हुए अपना वर्धस्त सदैव उनके सिर पर बनाए रखा। आज आचार्य दिवाकर दत्त जी के हजारों शिष्य उनके प्रति नतमस्तक होकर उनका स्मरण करते हैं । शुद्ध एवं सात्विक आचार विचार के धनी आचार्य दिवाकर दत्त अनेक वर्षों तक हिमाचल अकादमी की सामान्य तथा कार्यकारी परिषद के भी सदस्य रहे जहां निष्पक्षता एवं वेबाकी से अपना विचार और सुझाव प्रस्तुत करते थे। एक बार अकादमी की सामान्य परिषद की बैठक थी, जहां उनका आचार्यत्व प्रत्यक्ष देखने को मिला। बैठक में बहुत सारे लेखक विद्वान हिमाचल के उपस्थित थे जिममें आचार्य दिवाकर दत्त की भी मौजूद थे। वे निश्चित समय पर आए और अपने स्थान पर उपस्थित हुए। सभी ने उनका अभिवादन किया। बैठक की अध्यक्षता के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह जी जैसे ही सभास्थल पर पधारे , सभी उनकी ओर दौड़े और उनका उत्सुकता से अभिवादन किया परंतु आचार्य दिवाकर दत्त जी अपने स्थान पर शांतचित्त होकर बैठे रहे वे , तनिक भी विचलित नहीं हुए। जैसे ही माननीय मुख्यमंत्री ने देखा कि सामने आचार्य श्री दिवाकर दत्त जी विराजमान है, वे उनके पास आए ,उनका अभिवादन किया , उनसे आशीर्वाद लिया और उनका कुशलक्षेम पूछा । फिर अध्यक्ष के आसन पर स्वयं भी विराजमान हो गए।

ऐसा प्रखर व्यक्तित्व था आचार्य दिवाकर दत्त का जिन्हें आज भी हम श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।आचार्य दिवाकर दत्त जी ने अनेक वर्षों तक संस्कृत की मासिक पत्रिका दिव्या ज्योति का संपादन एवं प्रकाशन किया। एक समय में यह पत्रिका देश के विभिन्न कोनों में संस्कृत विद्वानों तक पहुंचती थी और उनकी रचनाएं भी इसमें प्रकाशित होती थी अब यह पत्रिका संस्कृत अकादमी हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रकाशित की जा रही है पत्रिका तथा अन्य संस्कृत ग के प्रकाशन के लिए उन्होंने शिमला के मशोबरा में अपने आवास स्थल पर ही मुद्रणालय की स्थापना की। प्रोफेसर केशव शर्मा ने आचार्य दिवाकर दत्त जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अपना सारा जीवन आचार्यश्री के चरणों में अर्पित कर दिया। वे जीवनपर्यंत भारती मुद्रणालय मशोबरा में रहे और दिव्य ज्योति तथा संस्कृत की पुस्तकों का संपादन तथा प्रकाशन करते रहे ।हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी में द्वारा प्रकाशित की जाने वाली संस्कृत पत्रिका श्यामला भी उन्हीं की देन है , जो अब तक निरंतर प्रकाशित हो रही है।

आचार्य दिवाकर दत्त ने ज्योतिष , कर्मकांड, संस्कृत साहित्य, महापुरुषों के व्यक्तित्व एवं सुभाषित, हिमाचल वाड़मय आदि अनेक पुस्तकों की रचना की जिन्हें आज भी प्रमाणिकता के तौर पर स्वीकार किया जाता है। आचार्य दिवाकर दत्त शर्मा ने भागवत कथाओं के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति के प्रचार में प्रसिद्धि प्राप्त की है ।आचार्य दिवाकर दत्त ने प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति अर्जित की उसी के फलस्वरूप आज भी उनका यशोगान संस्कृत संस्कृति जगत में बना हुआ है और वे एक आदर्श प्राध्यापक, शिक्षक , गुरु , आचार्य ,भागवत प्रवक्ता और संस्कृत संस्कृति सेवी महान विद्वान के रूप में पूजनीय है।

✍️ आचार्य डा कर्म सिंह

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *