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Editorial/सम्पादकीय धर्म-संस्कृति

चौपाल क्षेत्र में संक्रान्ति पर्व का धार्मिक महत्व

✍️ सरला शर्मा

जिला शिमला की तहसील चौपाल में संक्रान्ति पर्व का अलग-अलग धार्मिक महत्त्व है। हिन्दू शास्त्रानुसार मान्यता है कि प्रति माह होने वाला सूर्य का राशि परिवर्तन (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण) संक्रान्ति कहलाता है। बारह संक्रान्तियों का माह अनुसार अपना-अपना धार्मिक महत्त्व है। संक्रान्तियों को चौपाल क्षेत्र में ‘साजी’ कहा जाता है। इनमें से कुछ संक्रान्तियों का चौपाल क्षेत्र में विशेष धार्मिक महत्त्व है, जिनमें मकर, बैसाख तथा भादो संक्रान्ति प्रमुख हैं।

मकर संक्रान्ति-चौपाल क्षेत्र में वर्षभर की बारह संक्रान्तियों में से मकर संक्रान्ति पर्व का एक अलग महत्त्व है। माघ महीने का पहला दिन संक्रान्ति कहलाता है। सम्पूर्ण चौपाल क्षेत्र में माघ मास को अत्यन्त पवित्र और धार्मिक माना जाता है। इसे स्थानीय बोली में ‘माघ रो साजो’ कहा जाता है। पौराणिक समय से इसका विशेष महत्त्व रहा है। मान्यता है कि इस दिन देव धरती पर अवतरित होते हैं। इस दिन आत्मा को मोक्ष प्राप्त और प्रकाश का आगमन तथा अंधकार का नाश होता है। इस दिन दान-पुण्य, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व होता है। मकर संक्रान्ति के दिन चौपाल क्षेत्र के लोग सुबह के समय जल्दी उठकर स्नान आदि से पवित्र होकर, धुले वस्त्र धारण कर अपने स्थानीय देवी-देवता के मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं। देवी-देवता की पूजा से पहले ही सभी ग्रामीणवासी दर्शन और आशीर्वाद लेकर घर लौट आते हैं। चौपाल के कई गाँवों में देवी-देवता का पूजा करने का पात्र जिसे स्थानीय बोली में ‘धनारा’ कहा जाता है से सभी के घरों में पूजा के कमरे एवं चूल्हा जलने वाले स्थान पर पूजा की जाती है। धनारा में पाजा व छाम्बरके पत्ते और अग्नि डाले जाते हैं। यह धार्मिक प्रथा पौराणिक समय से प्रचलित है। इस दिन सभी के घरों में चौपाल क्षेत्र का विशेष भोजन ‘सिड्डू’ बनाया जाता है। कई घरों में खिचड़ी भी बनाई जाती है।

बैसाख संक्रान्ति- बैसाख माह के पहले दिन चौपाल क्षेत्र में संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। इस संक्रान्ति पर्व का चौपाल क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्व है। इस दिन सरांह नामक स्थान पर एक धार्मिक पर्व का आयोजन किया जाता है। यह पर्व पौराणिक समय से लेकर आज तक मनाया जा रहा है। सरांह नामक स्थान उपमण्डल चौपाल से लगभग 24किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सरांह में बिजट देवता महाराज का मन्दिर स्थित है। बिजट देवता हामल व आस-पास के कई परगनांे के अराध्य देवता है। मान्यता है कि यह मन्दिर 1600ई. से पूर्व का बना है। बिजट देवता के मन्दिर में संक्रान्ति के दिन सुबह चार बजे से हर घर के स्थानीय देवा और पंडित बिरादरी के पुरुष जमा होने शुरू हो जाते हैं। वहां पहुँच कर एक विशेष प्रकार की घास जो पूजा के लिए पवित्र मानी जाती है, इसे स्थानीय बोली में ‘मंूजी’ कहा जाता है से लम्बी-लम्बी रस्सियाँ बनानी आरम्भ करते हैं। बहुत लम्बी-लम्बी फूल मालाएं बनाकर मन्दिर के विशेष द्वारा तथा चारों ओर लगाई जाती हैं। इन मालाओं से सजा मन्दिर अत्यन्त शोभनीय नज़र आता है। उस दिन बीते वर्ष की संक्रान्ति में लगाई गई फूल मालाएं मन्दिर से उतारी और नई लगाई जाती हैं। यह परम्परा पौराणिक है। इसका पालन पौराणिक समय से लेकर आज तक किया जा रहा है। इस विषय में मन्दिर के विशेष पुजारी आदणीय श्री सन्तराम भण्डारी का कहना है कि यह परम्परा कई पुश्तों से चली आ रही है और देवता के गूर आदरणीय श्री हरिलाल शर्मा ने भी बताया कि बैसाख की संक्रान्ति के दिन जो बुरांस के फूलों से मालाएं बनाकर मन्दिर में लगाई जाती है यह परम्परा द्वापर युग से लेकर चली आ रही है। संक्रान्ति का यह पर्व वर्षभर का महापर्व माना जाता है। फूल मालाएं बनाने के लिए जो घास (मूंजी) का उपयोग किया जाता है इसे भगवान् के द्वारा शुद्ध किया माना गया है तब से लेकर इस घास को पवित्र माना जाता है।

संक्रान्ति के दिन सरांह में हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और पंक्तियाँ बनाकर एक-एक करके देवता के दर्शन करते हैं। बिजट देवता सभी को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पवित्र पर्व का यह दिन आस-पास के कई परगनों के लोगों के लिए अत्यन्त शुभ माना जाता है। काफी समय से यहां पर भण्डारे का आयोजन भी किया जाता है। भण्डारा बनाने व श्रद्धालुओं को भोजन कराने के लिए एक दिन पूर्व से ही तैयारी आरम्भ होती है। भण्डारे में सभी पुरुष श्रद्धा भावना से भोजन बनाते हैं। उस दिन वहां उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ भण्डारे में भोजन अवश्य प्राप्त करती है। बिजट देवता का प्रसाद अवश्य ही सभी प्राप्त करते हैं और शाम के समय देवता का आशीर्वाद लेकर घर चले जाते हैं। मान्यता है कि बैसाख संक्रान्ति के बाद चौपाल क्षेत्र में मेले (बिशू) लगने आरम्भ होते हैं।

चीड़ी संक्रान्ति-भाद्रपद मास की संक्रान्ति को ‘चीड़ी साजी’ कहा जाता है। सम्पूर्ण चौपाल क्षेत्र में इस संक्रान्ति पर्व का अलग महत्त्व है।संक्रान्ति के दिन चौपालवासी अपने घर के आँगन के एक कोने में ‘चीड़ा’ की स्थापना करते हैं। लोग लकड़ी का खम्बा गाड़कर उस पर एक पत्थर रखते हैं। पत्थर पर अपने खेतों से चार कोने वाला मिट्टी का एक टुकड़ा और कुशा रखते हैं और धूप, दीप, फूल, फल, चावल, गेहूँ, खीर, हलवा, पूरी आदि से उसकी पूजा की जाती है। संक्रान्ति से आरम्भ कर प्रतिदिन चीड़ा पर अग्नि जलाई जाती है और उसमें जल का छिड़काव किया जाता है। कुछ ही दिनों बाद उसमें डाले अनाज में अंकुर निकल जाते हैं। एक माह बीत जाने और अश्विन मास की संक्रान्ति आने से एक दिन पहले चीड़ा की पूजा करके इसे अपनी जमीन या गोबर के ढेर पर रखा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भाद्रपद मास में देवता धरती छोड़ कर लुप्त हो जाते हैं। इस अवधि में चिड़ा लोगों की रक्षा करता है। यह एक प्रकार का भूमि पूजन माना जाता है। मान्यता है कि चीड़ा की पूजा करने से धरती माता प्रसन्न होती है और सुख-समृद्धि प्रदान करती है।

चौपाल क्षेत्र में हर माह की संक्रान्ति को पवित्र माना जाता है और इस दिन लोग स्थानीय देवी-देवता के मन्दिर में माथा टेकने जाते हैं। संक्रान्ति के दिन अवश्य ही घरों मंे साफ-सफाई की जाती है। इस दिन कुछ विशेष भोजन- खीर, पटांडे, चिलड़े, सिड्डू, बाबर, दाल-भात, दाणा-भात इत्यादि बनाया जाता है। संक्रान्ति के दिन लोग दान भी करते हैं। क्षत्रीय वंश के लोग पंडित एवं गरीब लोगों को वस्त्र, भोजन एवं धन का दान करते हैं। जो भी व्यक्ति दान करने में सक्षम हो वह अवश्य ही इस दिन दान करता है। संक्रान्ति के दिनों को धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ एवं अन्य शुभकार्यों के लिए अत्यन्त शुभ माना जाता है।

विशेष तौर पर मकर एवं बैसाख की संक्रान्ति के दिन सैंकड़ों लोग तीर्थ स्थानों में स्नान करने जाते हैं। बैसाख की संक्रान्ति के दिन चौपाल क्षेत्र के अधिकतर मन्दिरों में हिमाचल के राज्य फूल बुरांस के फूलों की मालाएं बनाकर मन्दिर के चारों तरफ लगाई जाती है। यह मालाएं रस्सी तथा पवित्र घास (मूंजी) से बनाई जाती है। इस संक्रान्ति पर्व के दिन या एक दिन पूर्व कई लोग चूड़धार स्थित शिर्गुल देवता एवं भगवान् शिव के मन्दिर दर्शन करने जाते हैं। सभी लोग चूड़धार स्थित मन्दिर के पास बनी बावड़ी के निर्मल जल से स्नान करते हैं। बावड़ी के पवित्र जल का एक लोटा सभी श्रद्धालुओं के सिर पर गिराया जाता है। इसे अत्यन्त पवित्र माना जाता है। मान्यतानुसार इस बावड़ी के पवित्र जल से किया स्नान किसी बड़े तीर्थ से कम नहीं है।

✍️ सरला शर्मा
(लेखिका)
गांव हनल, डाकघर नकौड़ापुल
तहसील चौपाल, जिला शिमला (हि.प्र.)
ईमेल : sharmasarla87@gmail.com

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