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Editorial/सम्पादकीय News राजनीति

ईडी के रिमांड में कट्टर ईमानदार और सबसे ज्यादा पढ़े लिखे राजनेता अरविंद केजरीवाल

✍️ डॉ कर्म सिंह

अन्ना का मुन्ना लोकपाल आंदोलन की देन है, जिसका जन्म एक पहले एक सामाजिक आंदोलन के रूप में और पालन पोषण एक राजनीतिक दल आप के रूप में हुआ। इस आंदोलन में कुछ सामाजिक संस्थाओं का सक्रिय योगदान रहा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के नेतृत्व में खूब प्रसिद्ध भी मिली। इस मंथन में एक नायाब तोहफा मिला अरविंद केजरीवाल। जिसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर के एक राजनैतिक दल आप का गठन किया। तब यह व्यक्ति हाथों में कागज लिए जनसभाओं में भ्रष्टाचारियों की सूची गिनाता राजनेताओं को नाम लेकर कोसता था और ईमानदारी की बात करता रहा।

कुछ भ्रष्टाचार को रोकने की हवा में और कुछ मुफ्तखोरी एवं रेवड़ियां बांटने की कवायद में इनको दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई । फिर पंजाब में भी राजनीति सफल हो गई और वहां एक कठपुतली मुख्यमंत्री बना दिया गया। शुरू में इस आंदोलन में कुछ बुद्धिजीवी भी जुड़े थे जिन्हें धीरे-धीरे एक-एक करके बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और आप पार्टी पर पूरा कब्ज हो गया बतौर संयोजक मफलर मैन अरविंद केजरीवाल का। जिसने उनकी सत्ता को स्वीकार कर लिया वह पार्टी में बना रहा। जिसने न नुकर की उसको निकाल दिया गया।

राजनीति पैसों और महत्वाकांक्षाओं का खेल है इसलिए मुख्यमंत्री के बाद प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं केजरीवाल की हिलोरें लेने लगीं और विभिन्न प्रदेशों में आप के उम्मीदवार भी काफी संख्या में चुनावी मैदान में उतरे। भले ही अधिकांश की जमानत जप्त हो गई।

केजरीवाल ने राजनीति में शॉर्टकट मारते हुए प्रधानमंत्री होने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए कई तरह के हथकंडे भी अपनाने लगे ।क्योंकि राजनीति के लिए पैसों की जरूरत होती है और चुनाव तो पैसों के बल पर ही लड़े जाते हैं इसलिए शराब नीति के सहारे उन्होंने पैसा इकट्ठा करने की मुहिम चलाई और गोवा के चुनाव में खूब पैसा बहाया परंतु सफलता फिर भी नहीं मिली। शाहीन बाग, किसान आंदोलन के जरिए किसानों और मजदूरों के बहाने खालीस्तान का हिमायती होने के भी आरोप लगाते रहे है। वह अक्सर अपनी सभाओं में खुद को सबसे अधिक पढ़ा लिखा और कट्टर इमानदार राजनेता होने का दम भरते हैं और अन्य राजनेताओं को नाम ले लेकर उनको कोसते हैं। भाजपा कांग्रेस किसी भी दल को उन्होंने छोड़ा नहीं। वे स्वयं को आदर्श राजनेता और महान समाज सुधारक मानते हैं।

शराब नीति के माध्यम से पैसा कमाने के चक्कर में घूस लेने के आरोपों में घिरते नजर आ रहे हैं। पहले उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री फिर मंत्री कुछ और राजनेता संगी साथी जेल गए। उन्हें बहुत कोशिश करने के बाद भी जमानते नहीं मिलीं और अब उनके संयोजक एवं पार्टी के आका केजरीवाल भी ईडी की गिरफ्त में आ चुके हैं। 9 बार सम्मन दिए जाने के बाद भी वह पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं हुए तो ईडी ने उनको घर से दबोच लिया। काफी होहल्ला होने के बाद उनके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में भी अर्जी लगाई कि उन्हें गिरफ्तार न किया जाए परंतु एक ही दिन में इस अर्जी को वापस ले लिया गया। फिर लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट के आदेश के अनुसार केजरीवाल को 6 दिन की ईडी की हिरासत में भेजने की स्वीकृति प्राप्त हो गई। अब जबकि इस भ्रष्टाचार में शामिल बताए जाने वाले कुछ उनके सहयोगी सरकारी गवाह बन चुके हैं, ऐसे में केजरीवाल के लिए भी यह मामला काफी उलझता जा रहा है। ईडी की हिरासत में रहते हुए उनसे विभिन्न पक्षों को लेकर पूछताछ होगी और इस जांच के बाद जो तथ्य सामने आएंगे वह कोर्ट में पेश किए जाएंगे। न्यायालय का निर्णय आने पर ही बाद की तस्वीर साफ हो सकेगी। भले ही आप पार्टी यह अहंकारपूर्ण घोषणा कर रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अरविंद केजरीवाल की बढ़ती हुई ताकत को देखकर डर गए हैं और इसलिए उनको राजनीतिक आधार पर गिरफ्तार किया गया है।

उन्हें किसी भी न्यायालय से जमानत नहीं मिल सकी है इससे यही प्रतीत होता है कि न्यायालय के पास कुछ ऐसे सबूत अवश्य पेश किए गए होंगे जिसके आधार पर उनको जमानत नहीं मिल पा रही है। इस सिलसिले में केजरीवाल से पूछताछ होने पर जब अन्य उनके साथियों को भी आमने-सामने बिठाकर के पूछताछ के बाद ही इस प्रकरण में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। छानबीन के बाद क्या तथ्य सामने आते हैं। किस तरह की कार्यवाही कानून के अंतर्गत अम्ल में लाई जाती है ।यह सब तोभविष्य ही बताएगा परंतु लोकतंत्र और संविधान के नाम पर दुहाई देना मात्र ही बेगुनाही का एकमात्र प्रमाण नहीं कहा जा सकता है इसके लिए आचरण भी में स्वच्छता का होना भी अनिवार्य है। तभी राजनीति के दलदल में रहते हुए अपनी साख बचाई जा सकती है।

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