✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का को रविंद्र संगीत शांति निकेतन और समाज सुधार के लिए जाना जाता है उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ उनके विचार उनके चिंतन दृष्टि जनमानस को प्रभावित करती है और बंगाल में तू आज भी उनको बड़े सम्मान के साथ स्वर्ण किया जाता है उनके द्वारा प्रवर्तित संगीत और शिक्षा को आधार मानकर के प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है इसलिए रविंद्र संगीत कि आज भी अपनी अलग पहचान है और शिक्षा के क्षेत्र में शांति निकेतन दुनिया भर में प्रसिद्ध है रविंद्र नाथ टैगोर शिमला में भी आए उस दिन यहां रहे और अपने इस प्रवास के दौरान उन्होंने कुछ कविताओं की भी रचना की
1893 के अक्तूबर और नवंबर महीने में रबींद्रनाथ टैगोर शिमला आकर रहे थे। एडवांस स्टडीज़ से ठीक नीचे की सड़क पर बना हुआ था “वुडफील्ड हाउस”। वही घर जहां रविन्द्र नाथ टैगोर आकर रूके थे। वहाँ पर शिलालेख मिलेगा उसी में नीचे जाकर मिलेगा ऐतिहासिक “वुड फील्ड हाउस”

1893-94 में उनके बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इस घर को तक़रीबन आठ महीने के लिए किराये पर लिया था। उनकी पत्नी नंदिनी देवी और उनकी बेटी इंदिरा भी उनके साथ रहीं। इस मकान में रबींद्रनाथ टैगोर ने आठ कविताएं लिखीं। ये कविताएँ उनके संग्रह ‘सोनार तारी’ में प्रकाशित हैं।
आकाशवाणी शिमला के समीप चौड़ा मैदान से बालूगंज की ओर जाने वाली सड़क के साथ ही नीचे को एक तिरछी पंगडडी पर ज़रज़र हालत में दिखता है सदी के महानायक का घर।
एकदम एकांत और दूर तक फैली शांति और आसपास कोई घर नहीं। इस मकान के पासएक बुजुर्ग महिला अपने बेटे के साथ कई दशकों से यहाँ रह रही है। यह घर अंदर से ख़ाली है और कभी कभी मालिक रहने आते हैं। जंगल के बीचोंबीच, चिड़ियों के शोर में भी ऐतिहासिक भवन मूक रहकर अपनी कहानी कह रहा था।
मिट्टी और पत्थर की दीवारें,तिरछी टीन की छत,तीन सीढ़ी चढ़ कर पुराने दौर का दरवाज़ा…
एक सौ तीस साल पुराना वक़्त उस गुजरे जमाने का इतिहास का साक्षी यह खंडहर मकान। घर में अपने शिमला प्रवास के दौरान रहते हुए, यहीं चलते हुए,कभी आसमान को ग़ौर से देखते हुए रविन्द्र ठाकुर नज़र आ रहे थे । यह दुखद है कि दुनियाभर में देश का नाम रोशन करने वाले अनोखे कवि का एक घर सहेज नहीं पाए। हालाँकि तसल्ली कि बात ये भी थी कि घर की बनावट से कोई छेड़खानी नहीं हुई। वहीं सीढ़ीनुमा चौखट , बडी बड़ी खिड़कियाँ और बंगाली कॉटन के आधी ऊँचाई वाले नेट के सफ़ेद पर्दे, बिल्कुल ठाकुर बाड़ा की तरह।

इतनी बड़ी शख़्सियत के इस ऐतिहासिक धरोहर की संभावना होना एक दुखद पहलू है। इस घर के कई मालिक हैं और कभी कभी यहां रहने भी आते हैं उनके साथ संपर्क करके इस भवन की मरम्मत करके यहीं पर गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की स्मृति में एक संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना की जा सकती है ताकि लोग इस स्थान पर आ सके जहां उन्हें रविंद्र नाथ टैगोर की कृतियां देखने पढ़ने को सुलभ हो सके। शिमला में आने वाले पर्यटकों तथा बंगाली सैलानियों के लिए यह स्थान एक आकर्षण का केंद्र हो सकता है। इस इतिहास का साक्षी सड़क पर मौजूद शिलालेख में हिंदी और अंग्रेजी में टैगोर के यहां आने और रहने की पूरी जानकारी देता है धुंधला होने लगा है, इसके शब्द अब साफ़ नहीं रह गए हैं। बंगाल में शांतिनिकेतन सोसाइटी जो लोग शिमला घूमने और ऐतिहासिक इमारतें देखने आते हैं वो जब शिमला समझौते वाली इमारत देखने जाते हैं उन्हें अंग्रेजी काल की इमारतें दिखाई जाती हैं और उसी को अपना गौरव पूर्ण इतिहास बताया जाता है जबकि भारत के एक प्रख्यात शिक्षाविद संगीतज्ञ और महान यशस्वी लेखक रविंद्र नाथ टैगोर की स्मृति में कुछ अधिक नहीं किया जा सका है और उनकी स्मृतियों को संजोए हुए उस भवन की भी उपेक्षा हो रही है स्थान आकाशवाणी दूरदर्शन केंद्र और भारतीय उच्च संस्थान के बहुत ही समीप और सड़क से जुड़ा हुआ है। अनेकों पुस्तकालयों कार्यालयों तथा एडवांस स्टडी में तो गुरुदेव कीबड़ी बड़ी तस्वीरें टंगीं, परन्तु जहां वे कुछ महीने तक रहे और साहित्य सीन किया उस स्थान को विकसित नहीं किया जा सका है ।
वास्तव में गुरु रविंद्र नाथ टैगोर ने शिक्षा और संगीत के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। प्रेम और जीवन का जो दर्शन गुरुदेव ने दुनिया को दिया,वो उनसे पहले और उनके बाद किसी से ना हुआ।
वो विलक्षण प्रेमी के साथ साथ अपने वक़्त से बहुत आगे के इंसान थे। अपने विचारों एवं लेखनी से पूरे देश में नवचेतना जागृत करने वाले, महान कवि, साहित्यकार, दार्शनिक एवं नोबेल पुरस्कार से सम्मानित, राष्ट्रगान के रचयिता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जी की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन। गुरुवार रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती पर उनका स्मरण करते हुए उनकी चिंतन दृष्टि को अपनाने तथा उनके भवन को एक स्मारक के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिए जाने की आवश्यकता है।
- डॉ. कर्म सिंह आर्य