Himalayan Digital Media

Himalayan Digital Media

News

बहुगुणकारी “दाड़ु” का सीजन शुरू, अनारदाना के मिल रहे अच्छे दाम

“दाड़ु” पांगणा-करसोग क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाता है। दाडु का कंटीला झाड़ीनुमा वृक्ष होता है। दाडु अनार प्रजाति का वृक्ष है। राजकीय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला पागणा के विज्ञान अध्यापक पुनीत गुप्ता का कहना है कि दाडु का अंग्रेजी नाम वाइल्ड पोमेग्रेनेट तथा बोटेनिकल नाम “पुनिका ग्रेनाटम” है। अनारदाना में कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, विटामिन ए, सी और ई भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अनार में फास्फोरस, मैग्नीशियम, पोटैशियम, कैल्शियम और लौह तत्व की प्रधानता होती है। इसके साथ ही अनार में एंटीऑक्सिडेंट और एंटीवायरल आदि गुण पाए जाते हैं जो शरीर को अनेक संक्रमणों से बचाते हैं।

अनारदाना के व्यापारी धर्मपाल गुप्ता का कहना है कि पांगणा-करसोग क्षेत्र में पज्याणुु, छण्डयारा, घाड़ी, सोरता, मशोग, परेसी, सीणी-गलयोग, पंचायत, फेगल, मैहप, मझांगण, धार-बेलर, सणस, काण्ढा, काहणु, बगसाड, साओन्गी, बाड़योग, अलसिण्डी, माहौटा, तत्तापानी, जस्सल, तलैहण, थली, शाकरा, बिन्दला, मगाण, परलोग, चैरा से नान्ज लुहरी तक के सतलुज तटीय तराई वाले न्यूल व आर-पार शिमला-कुल्लू जिला के सीमावर्ती गांव के लोगो की आर्थिकी का मजबूत साधन है। आजकल एक किलोग्राम सूर्ख लाल अनारदाना घर द्वार पर ही तीन सौ से पांच सौ रूपये तक बिक रहा है। होल सेलर से इस अनारदाना को पतंजलि, डाबर, एम डी एच, एवरेस्ट जैसी अनेक बड़ी-बड़ी कंपनिया और पांचतारा होटल ऊंचे दाम पर खरीदते है।

अनारदाना के लाल अपार औषधीय गुणो के कारण दाडु को जंगलो व चरागाह से घर लाकर इसके मणियो के समान और लाल कान्ति वाले बीजो को निकालने और जूट की बोरियो पर सूखाकर बेचने का कार्य आजकल जोर से चल रहा है। दाडु के ये सुखाए हुए लाल बीज अनारदाना के रूप मे जाने जाते है। इनका स्वाद खट्टा मीठा होता है। जहा वर्ष भर इसका प्रयोग हर घर मे चटनी के रूप मे होता है वही अनारदाना औषधी के रूप मे “दाड़ीमाष्टक चूर्ण” का मुख्य घटक है। पज्याणु गांव के रमेश शास्त्री का कहना है कि दाडु का वृक्ष धार्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र माना जाता है।पांगणा-सुकेत क्षेत्र मे सूखे दाडु का प्रयोग मासानुमासिक त्योहार मे किया जाता है।

विवाह के अवसर पर चतुर्थी क्रम (रतैई)मे पति-पत्नी दाडु के पौधे की पूजा कर सात बार इस पौधे की परिक्रमा करते है।पितृ कर्मो मे भी दाडु का प्रयोग पूजा कार्य मे किया जाता है। होम,आहुति मे दाड़ु की समिधा और लाल बीजो का प्रयोग किया जाता है।सुभाषपालेकर प्राकृतिक खेती की जिला सलाहकार लीना शर्मा का कहना है कि दाडु पूर्णतः जैविक फल है इसमे पौष्टिक व पाचक तत्वो की मात्रा अधिक होती है।

आयुर्वेद चिकित्सक डाॅक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि दाड़िमाष्टक चूर्ण के सेवन से बीमारी पास नही फटकती। आमातिसार, अग्निमान्द्य अरूचि, खांसी, हृदय की पीड़ा, पसली का दर्द,ग्रहणी और गुलाम रोग का नाश होता है। पित प्रधान रोगो मे इसका प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है। यह सौम्य शीतल रूचिबर्द्धक, पितशामक और कण्ठशोधक है। दूषित गैस की उत्पति से कण्ठ मे जलन, खट्टी डकारे, पेट भारी, दस्त की कब्जियत आदि उपद्रवो मे तीन मासा हिग्वाष्टक चूर्ण तक्र या गर्म पानी से लेने पर शीघ्र लाभ होता है। इसी प्रकार दाडिम पुटपाक आदि औषधियो मे भी इसका प्रयोग होता है।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *