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भिक्षुक || लघु कथा

✍️ शिवकुमार शर्मा “शिवा”

बरसात का मौसम था और विद्यालय में अवकाश चल रहे थे। उस समय मैं अपने पुराने शिक्षास्थल व पुराने मित्रों से मिलने चंडीगढ़ चला गया। मैं अपने एक मित्र के कमरे में ही रह रहा था। हम वहीं खाना बना लेते थे कभी-कभी बाहर भी खा लेते थे। एक दिन अचानक मेरे मित्र को फोन आया कि उसका कोई रिश्तेदार बीमार है और अस्पताल में गम्भीर परिस्थिति में है। अब वह जल्दी से अस्पताल चला गया। कुछ समय बाद उसका फोन आया कि उसके रिश्तेदार का देहावसान हो गया है और उसे गांव जाना पड़ेगा।कमरे में खाने का सामान कुछ नहीं था मुझे भी अगले दिन घर निकलना था। अब मैं कमरे में अकेला था। मेरे फोन का चार्जर भी नहीं था मैंने वहीं पड़ा एक पुराना चार्जर उठाया और फोन को लगा दिया लेकिन उस चार्जर से तो मेरा फोन बिल्कुल ही बन्द हो गया। सूर्यास्त का समय था और मैं बालकोनी में बैठा बाहर सड़क में दौड़ते वाहनों को देखकर समय व्यतीत कर रहा था। बारिश हो रही थी।तभी मुझे पास के मंदिर के बाहर एक भिखारी दिखा उसके फटे पुराने मैले कपड़े थे और बारिश में भीग रहा था लेकिन वह बिना छाते के वहीं मन्दिर के बाहर बैठा रहा। इसकी स्थिति देखकर मेरा कवि हृदय कारुणिक भावों से भर गया लेकिन मैं भी उस समय कुछ कर पाने में समर्थ नहीं था।

शाम हुई मुझे खाना खाने बाहर जाना था मैंने बारिश के रुकने की प्रतीक्षा की। अंधेरा हो चुका था। मैंने अपना बन्द फोन लिया और ATM कार्ड लेकर बाजार की ओर चला गया। सड़क के साथ-साथ मुझे लगभग 1 km चलना पड़ा। सड़कों पर तेज वाहन टीं टीं की आवाजें करते दौड़ रहे थे। गाड़ियों की रौशनी आंखों को लग रही थी। बीच बीच में जब वाहनों की आवाजाही रुक जाती तो सड़क पर एकदम अंधेरा छा जाता था। बाजार में पहुँच कर ATM से पैसे निकालने लगा लेकिन वो मशीन शायद खराब थी। अब दूसरा ATM कहाँ है मैंने एटीएम के बाहर बैठे गार्ड से पूछा। उन्होने कहा – भई अगर ये मशीन नहीं चल रही तब तो 25 सेक्टर ही जाना पड़ेगा।अब 25 सेक्टर रात को कौन जाए। मेरे पास तो जेब में एक रुपया भी नहीं था । जो पैसे थे वो सब बैंक में, ऑनलाइन भी दे सकता था लेकिन फोन का तो पहले ही देहावसान हो गया था। भूख बहुत तेज लग रही थी। बाजार में खाना व अन्य लघु कथा फास्ट फूड खाते लोग मुझसे सहन नहीं हो रहे थे।मैं फिर पैदल चलकर अपने कमरे में आया कमरे में एक दम शांति और घना अंधेरा था। मैने रौशनी जगाई और अपने पर्स में पैसे देखने लगा मुझे 3,4 सिक्के मिल गए कुल 6 रुपए अब मैंने अपने थैले में भी देखा तो 5 रुपए वहां भी मिल गए। मेरे पास कुल 11 रुपए थे। रात के साढ़े दस होने वाले थे। मैं वहां महाविद्यालय शिक्षा के समय के एक बर्गर बेचने वाले भैया को जानता था जिसका नाम क्या था मुझे नहीं पता लेकिन हम उसे यादव कहा करते थे। हम अक्सर छात्रावास से उसके पास आया करते थे। मैं 10 रुपए लेकर चल पड़ा उस स्थान की ओर जहां वो रेहड़ी लगाया करता था।गलियों में कुत्ते घूम रहे थे बीच बीच में अंधेरा तो कहीं कहीं रोशनी थी।मैं उस स्थान पर पहुंचा । मेरी भूख से हालत खराब हो रही थी।लेकिन वहां रेहड़ी तो है लेकिन बेचने वाला कोई और । खैर! मैने उससे बर्गर का मूल्य पूछा उसका जवाब 25 रुपए था। फिर टिक्की ? मैने पूछा।20 रुपए उसने कहा।मैंने बड़ी मासूमी से फिर पूछा भाई 10 की दे दोगे?

उसने कहा नहीं नहीं 10 की नहीं।अब मैंने गोलगप्पे का मूल्य पूछा।उसने कहा बीस के छ:।बाजार में इतनी महंगाई हो गई है आज मुझे अच्छे से अनुभव हो गया। मैंने गोलगप्पे खाने का ही निर्णय किया लेकिन 10 के कितने आए, तीन। मैंने उसे बड़ी दीनता दिखाकर एक गोलगप्पा और ले लिया । और दस रुपए देकर वापिस कमरे की ओर जाने लगा। मैं भूख से व्याकुल था । पैसा होते हुए भी मैं भूखा था ।कमरे में जाकर पेट के बल सो गया भूखे नींद भी नहीं आई।आज मैं उन गरीब,फुटपाथ पर भूखे सोने वाले लोगों के जीवन के कुछ पल जी रहा था। लेकिन मेरे पास रहने सोने के लिए अच्छा कमरा बिस्तर सब कुछ था, तथा सुबह की आशा थी कि सुबह होते ही मैं पेट भर भोजन कर लूंगा। सिर्फ एक रात ही मैं भूख से त्रस्त था।लेकिन उन लोगों का जीवन कैसे गुजरता होगा जो रोज इसी जीवन को जीते हैं जिनके पास न अन्न न रहने की व्यवस्था न सर्दी से बचाव के लिए कपड़े और न गर्मी से बचने के लिए पंखा, AC । और न ही आशा की किरण की यह वक्त गुजरते ही सब सही होगा। शायद उन्हें आशा होती होगी पूरे एक जन्म की कि यह जन्म जैसे कैसे बिताना है फिर सब बेहतर होगा।

लेखक -शिवकुमार शर्मा

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