✍️ डाॅ. कर्म सिंह आर्य
जिस भूमि पर हम जन्म लेते हैं वह राष्ट्र हमारी मातृभूमि कहलाता है और जिस मातृभूमि पर बहती जल धाराओं से हमें जीवन मिलता है, हमारे शरीर में प्राणवायु संचालित होता है, जिससे देश की माटी में उपजे अन्न, वनस्पतियों , औषधियों से हमारा जीवन होता है, जिस मिट्टी में उपजने वाले अन्न को खाकर हम जिंदा रहते है वह मातृभूमि हमारी जन्म देने वाली, पालन करने वाली और जीवन की रक्षा करने वाली हमारी जननी होती है। इसीलिए भारतीय परंपरा में देश की मिट्टी को, अपने राष्ट्र को, मातृभूमि को जननी कहा जाता है। वास्तव में भारत वर्ष प्राचीन काल में चक्रवर्ती साम्राज्य रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा अपने राष्ट्र को भारत माता कहकर पुकारती है।
माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या। यह वेद का मंत्र है जिसमें परमात्मा ने ऋषियों के माध्यम से यह उपदेश दिया है कि यह मातृभूमि हमारी माता है और हम इसकी संतान हैं । जिस तरह से जन्म देने वाली मां की सेवा और सुरक्षा करना एक पुत्र का कर्तव्य है उसी तरह से मातृभूमि की रक्षा करना थी प्रत्येक नागरिक एवं देशभक्त व्यक्ति का परम कर्तव्य है। यही भावना है जो हमें भारत माता की जय कहने की प्रेरणा देती है और इस नारे को बुलंद करते हुए हम भारत माता के प्रति अपने समर्पण की भावना को दोहराते हैं।
भारतीय परंपरा में प्रतिदिन प्रात काल उठते ही भूमि पर अपने पांव रखने से पहले भूमि माता की पूजा करते हुए मातृभूमि से प्रार्थना की जाती है कि वह मिट्टी पर पांव रखने एवं व्यवहार के लिए मुझे क्षमा करें। यदि मनुष्य अपने जीवन व्यवहार का गंभीरता से चिंतन करें तो मल मूत्र तथा जीवन के अन्य क्रियाकलापों में सांसारिक व्यवहार का प्रयोग करके अपने जीवन की रक्षा करना यह सब कुछ हमें मातृभूमि की बदौलत ही मिल पाता है। इसीलिए हिंदू संस्कृत में मातृभूमि को स्वच्छ, निर्मल, पवित्र बनाए रखने के लिए प्रार्थना एवं संकल्प किया जाता है ताकि हमें जन्म देने वाली, हमारा पालन पोषण करके जीवन प्रदान करने वाली मेरी मिट्टी, मेरा देश स्वच्छ, पवित्र बना रहे किसी भी शत्रु की बुरी दृष्टि को कुचलने का संकल्प इसी भावना में निहित है। इस सृष्टि पर रहने वाले समस्त प्राणियों के लिए ईश्वर ने प्रकृति की रचना की है और उनके जीवन यापन के लिए जलवायु, अन्न,औषधियां, वनस्पतियां पैदा की हैं जिनके बिना जीवन की कभी कल्पना नहीं की जा सकती है।
वेद के मंत्र में उपदेश करते हुए परमात्मा ने कहा है इमाम् भूमिं अददाम आर्याय – मैं यह भूमि आर्य अर्थात् श्रेष्ठ मनुष्यों को प्रदान करता हूं। इस सृष्टि की संरचना से प्रकृति में मनुष्य और जलचर थलचर, नभचर सभी प्राणियों को पृथ्वी, गगन और समुद्र में असंख्य भोग्य पदार्थ प्राप्त होते हैं । जिस पवित्र और उदात्त भावना से परमात्मा ने सभी के जीवन के कल्याण के लिए सृष्टि की रचना की है उसी पवित्र भावना से इस सृष्टि को बनाए रखना हम जीवों का भी कर्तव्य है और विशेषकर मनुष्यों का, क्योंकि मनुष्य सभी जीवो में श्रेष्ठ है। अगर वह अपने आचरण एवं व्यवहार से प्रकृति को नुकसान पहुंचता है। जल, वायु,भूमि का संतुलन बिगड़ता है। भौगोलिक संरचना के आधार पर विश्व के अलग- अलग स्थान विभिन्न वर्ग, समुदाय, छातियों के अधीन रहते हैं और वहां की जलवायु, प्राकृतिक एवं भौगोलिक स्थिति के अंतर्गत ही वहां की लोक संस्कृति, जनजीवन और रीति रिवाज भी पनपते रहते हैं। समय-समय पर होने वाले धार्मिक,सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों से भी भौगोलिक परिस्थितियों में बदलाव होता रहता है। कुछ भाग मिलकर एक बड़ा देश बन जाते हैं तो कहीं किसी बड़े देश का भूभाग अलग-अलग भागों में बंटकर अलग देश बन जाते हैं । उसके बाद जो व्यक्ति जहां कहीं,जिस मिट्टी में, जिस देश में जन्म लेता है वह उसी को अपनी मातृभूमि मानकर उसी के प्रति अपना समर्पण भी व्यक्त करता है। इस दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक नागरिक अपने देश की अस्मिता एवं सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहता है।
कुछ सामुदायिक और विभिन्न वैज्ञानिक मतों के आधार पर संचालित देश अपने मत मजहब, भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दूसरे देश की भूमि को जीतने का भी प्रयास करते रहते हैं जिससे दो देशों की संस्कृतियों में एक संघर्ष निरंतर चलता रहता है। कभी यह संघर्ष शांत तरीके से गतिमान रहता है तो कभी धरातल पर आतंकवाद और युद्ध के रूप में भी देखा जा सकता है। वर्तमान में भारत अपनी पारंपरिक ज्ञान परंपरा के कारण विश्व में आशिक सामाजिक आधार पर वसुधैव कुटुंंबुकम् की भावना से तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है । इससे कुछ देशों एवं विचारधाराओं को बल मिल रहा है तो कुछ देश अपनी मजहबी कट्टरपंथी ताकत और न के दबाव में भारत से विद्वेष भी करने लगे है। इसी कारण से सामुदायिक दंगे और आतंकवाद की घटनाओं को देखा जा सकता है।
भारत मैं वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा संरक्षित कट्टरपंथी सोच और चीनी माओवादी साम्यवादी वामपंथी विचारों के दम पर फलने फूलने वाली विचारधारा का भारतीय ज्ञान परंपरा, धर्म ,संस्कृति एवं समाज के आधार पर टकराव होने लगा है। जब मजहबी विचारों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है तो स्थिति और भी चिंताजनक बन जाती है। भारतीय राजनीति में पिछले 70 वर्षों में इस्लाम और वामपंथी विचारधारा को राजनीतिक संतुष्टकरण के चलते फलते फूलते देखा गया है जबकि भारतीय हिंदूवादी विचारधारा का विरोध और होता रहा है जो वर्तमान में चरम पर दिखाई दे रहा है। इस्लामपरस्ती संगठित होकर हिंदुत्ववादी विचारधारा का खुला विरोध करने लगी हैं और वामपंथी विचारधारा विभिन्न संगठनों के माध्यम से देश के प्रति दुर्भावभावनाएं फैलाने में लगी हुई है जबकि हिंदू बहुसंख्यक हिंदूवादी विचारधारा जातिवाद और विभिन्न देवी देवताओं के अनुयायियों के तौर पर आपस में बंटी हुई है । इसी का लाभ उठाकर इस्लाम, ईसाइयत और वामपंथ फलता फूलता नजर आ रहा है । अगर भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों के इतिहास और गतिविधियों का जिक्र बात किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अधिकांश राजनीतिक दल हिंदुत्ववादी धर्म दर्शन और संस्कृति तथा लोकाचार के विरोधी हैं और जो दल हिंदुत्ववादी विचारधारा का पक्ष लेते हैं उन्हें संप्रदायिक कहा जाता है जबकि अन्य दल स्वयं भी कट्टरपंथी संप्रदायवाद से ग्रसित हैं । यही मजहबी और राजनीतिक विद्वेषपूर्ण विचारधारा भारत को कमजोर करने पर लगी है।
राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक आधार पर यदि कोई कार्यक्रम बनता है या सरकार के किसी पक्ष द्वारा उसको आगे बढ़ाने का प्रयास होता है तो यह कट्टरपंथी ताकतें मिलकर उसका विरोध करती हैं जो कि खुले में भारतीय ज्ञान परंपरा का ही विरोध है। स्पष्ट तौर पर यह विरोध भारत माता का है। प्रत्यक्ष रूप से भारतीय अस्मिता और परंपराओं का विरोधी भारत माता का विरोध ही कहलाता है। इसलिए इस विरोधाभास और कट्टर सोच का सामना करने तथा भारतीय लोक मानस के लिए अपने धर्म संस्कृति परंपरा समाज व्यवस्था और राष्ट्र के निर्माण एवं उत्थान में अब तक महापुरुषों द्वारा दिए जा चुके बलिदानों को पढ़ने देखने समझने की जरूरत है ताकि लोकमन भारतीयता से परिचित हो सके और हम अपने देश, अपनी माटी के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकें।
✍️ डाॅ. कर्म सिंह आर्य