अखबारों और सोशल मीडिया पर आजकल एक चर्चा जोर पकड़ रही है कि शिमला में अंग्रेजों के समय के लगे देवदार, शिमला शहर के लिए खतरा बने हुए हैं और अब ये देवदार के पेड़ कुछ बुद्धिजीवियों की नजरों में भी खटकने लगे हैं। कुछ लोगों को जहां कंक्रीट का जंगल अच्छा लगने लगा है वहीं पर देवदार के पेड़ क्यों कर खटकने लगे हैं इस पर भी विचार तो होना ही चाहिए।
अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के अनुसार भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए जो शिमला में विभिन्न भवन बनाए वे तब उनकी आवश्यकता के अनुरूप सही थे परंतु यह भी साथ में महत्वपूर्ण है कि तब भी काम करने वाले भारत के मजदूर थे। कुछ एक भवन तो हमें अंग्रेजों से विरासत में मिले हैं जिनकी बहुत तारीफ की जाती है परंतु उसके साथ साथ जो हिमाचल की पारंपरिक काष्ठ कला के नमूने सदियों पुराने मंदिर हैं, उनको नजरअंदाज कर दिया जाता है। हां, इतना जरूर है कि तब काम ईमानदारी से होता था। गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं किया जाता था। कमीशन और भ्रष्टाचार का चलन नहीं था इसलिए मिलावट नहीं थी। प्रकृति का पूरा ख्याल रखा जाता था । पानी के निकास को ढलान बनाकर ठीक से बहते हुए निकल जाने के लिए जगह दी जाती थी पानी को रोका नहीं जाता था।

सड़कों और भवनों के डंगे प्राचीन शैली से पत्थरों से ही लगाए जाते रहे जिसमें पानी रच रच कर जमीन में समा जाता है और सड़क या भवन का कोई नुकसान नहीं होता। अब पहले की डंगे वाली तकनीक को छोड़कर आरसीसी के भारी भरकम डंगे लगाए जा रहे हैं जो कच्ची मिट्टी पर टिकते नहीं और कुछ वक्त के बाद गिर जाते हैं।
पहले पहाड़ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार बहुत ऊंचे बहुमंजिला मकान नहीं बनाए जाते थे जिसकी अब शिमला में ही नहीं पूरे हिमालय क्षेत्र में भरमार है। कच्ची और भुरभुरी मिट्टी पर सड़कों की ढलान पर बहुमंजिला भारी-भरकम इमारतें बन गई हैं और इस बार उनको गिरते हुए हमने अपनी आंखों से देखा भी है।
अंग्रेजों ने सुरंगें बनाई तो उनके ऊपर ढलान बनाकर पानी को रुकने, टिकने नहीं दिया परंतु अब उन सुरंगों के ऊपर बहुमंजिला इमारतें शिमला की शोभा बढ़ा रही हैं ऐसे में सुरंगे कब तक यह बोझ सहन कर पाएंगे पता नहीं।
ढलानों में कच्ची मिट्टी पर बने भवन भारी बारिश के कारण जब उनके नीचे की मिट्टी कमजोर हो जाती है , उसमें पानी भर जाता है तो उसे गिरने से बचाया नहीं जा सकता है।
इधर हार्वेस्टिंग टैंक छत के पानी के निकास का और घरों में शौचालय आदि के लिए पानी को उपयोग में लाए जाने का एक अच्छा विकल्प था परंतु उस पानी का उपयोग ना के बराबर है होता है हां वह गड्ढा पानी से भर कर मकान के नीचे रिसता हुआ मकान के लिए खतरा जरूर बन जाता है। यह भी इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं का एक बहुत बड़ा कारण हो सकता है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हां, यह भविष्य के लिए चेतावनी जरूर है परंतु कुछ दिनों बाद ही आदतन सब कुछ भुला दिया जाएगा, हमेशा की तरह।
रेलवे लाइन का सर्वेक्षण करने वाले बाबा भलकु जैसा अनपढ़ कहे जाने वाला एक पहाड़ी व्यक्ति था। इसमें दो राय नहीं कि बाबा भलकु जैसे लोगों ने जो काम किया वह बड़े-बड़े इंजीनियर भी नहीं कर पाए और आज के इंजीनियर जो कुछ कर पा रहे हैं उसका बनना बिगड़ना, टूटना, बिखरना हर रोज कहीं ना कहीं अलग-अलग घटनाओं के माध्यम से गवाही देता है।
वास्तव में जब भी कोई नीति बनती है राष्ट्रीय स्तर पर तो एक ही तरह के नियम कायदे कानून अमल में ले जाते हैं। सबको एक ही मीटर से नापा जाता है चाहे वह मैदान हो रेगिस्तान हो या पहाड़। पहाड़ों के लिए कोई अलग से नीति कम ही बनती है जबकि बननी चाहिए।
जब पहले सड़के बनती थी तब भी छुट पुट दुर्घटनाएं होती थी लेकिन तब सोशल मीडिया नहीं था हर आदमी के हाथ में कैमरा नहीं था। इसलिए सूचनाएं तेजी से फैलती नहीं थी अफवाहें बहुत कम होती थी उनकी तुरंत प्रतिक्रिया भी नहीं होती थी और अब सोशल मीडिया बहुत सक्रिय है किसी को भी कहने और संभालने का मौका नहीं देता है अपनी टीआरपी के लिए सब कुछ उगल देता है। सड़कों का टूटना जहां भौगोलिक स्थिति वहां की मिट्टी चट्टानों और वनों की स्थिति पर निर्भर करता है, वहां निर्माण की विधि और रखरखाव भी उसके लिए महत्वपूर्ण रहता है।
सड़क की कटिंग कितनी डिग्री पर कैसे की जानी है यह पहले मजदूर करते थे अब मशीनों द्वारा किया जाता है। अब आप एक सड़क के निर्माण के लिए कई कई वर्षों का इंतजार भी नहीं करना चाहते। परिणाम भी तुरंत चाहिए और मशीनों का भी विरोध करना है। ऐसा विरोधाभास क्यों? मशीन विकास के लिए कोई राक्षस नहीं है, प्राकृतिक आपदाओं के लिए मजदूरों का भी कोई दोष नहीं है दोष काम करवाए जाने की मानसिकता का है। मशीन बहुत उपयोगी हैं परंतु उनका कब कहां किस तरह से इस्तेमाल किया जाता है यह महत्वपूर्ण है। यह भी स्वाभाविक है कि जब मशीन चलेगी तो चट्टानें हिलेंगी, पहाड़ दरकेंगे और आने वाले समय में जब बारिश का पानी भीतर घुसेगा तो तबाही होगी जैसी अभी सामने आ रह है।
अगर हिमाचल को को देखें तो धर्मपुर से परमाणु, सुंदरनगर का हराबाग और मंडी का पंडोह क्षेत्र रेतीली मिट्टी वाला है, उसे पर आरसीसी के बड़े-बड़े डंगें टिकते नहीं है, उनके नीचे से मिट्टी बारिश में घुल जाती है और डंगा एक तरफ को लुढ़क जाता है। हां, इस त्रासदी को देखते हुए अन्य विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए, यह समय की जरूरत है। धर्मपुर से कसौली के मार्ग को अच्छा बनाया जा सकता है। धर्मपुर खंड की बाई ओर का मार्ग एक विकल्प के तौर पर बनाया जा सकता है। इसी तरह से एक राष्ट्रीय उच्च मार्ग को सौ फुट का बनाने की बजाय कम चौड़ाई वाले दो मार्ग भी बनाए जा सकते हैं जिन्हें एक तरफ आने के लिए दूसरी तरफ जाने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है और कुछ जगह इस तरह के बाईपास बनाए भी गए हैं जो काफी हद तक सफल कहे जा सकते हैं।
हमारा यह स्वभाव है कि अगर हम किसी बात में बुराई देखते हैं तो बुराई ही दिखती है और अच्छाई देखते हैं तो बुराई को भी नजरअंदाज कर देते हैं जबकि नजर में संतुलन बनाए रखने की भी जरूरत है खासकर ऐसे संवेदनशील मौकों पर। जनमानस और प्रशासन का भी संवेदनशील, जनहितकारी होना आवश्यक है। शासन के लिए यह जरूरी है कि वह जन भावनाओं को समझे और जन्मश के लिए यह जरूरी है कि वह सरकार के प्रयासों में सहयोग करें मात्र आलोचना नहीं।
अगर बात करें देवदार की तो देवदार के घने जंगल सदियों से हिमाचल की शोभा रहे हैं, आज भी हैं और शिमला की पहचान में देवदार भी अहम हैं लेकिन मकानों और सड़कों के किनारे गिरते देवदार, अपनी जड़ों को समेटते हुए देवदार दिखना अब आम बात हो गई है। देवदारों का कटान और स्मार्ट सिटी के बहाने सड़कों के किनारे आरसीसी के डंगों पर छोटे-छोटे गमलों में लगाए गए पौधे क्या इन देवदारों का अपमान नहीं?
जब मकान बनते हैं तो कुछ वर्षों में ही मकान के साथ सटा हुआ देवदार का सालों पुराना पेड़ धीरे-धीरे सूख जाता है फिर उसे काटने की भी अनुमति मिल जाती है । कोई यह नहीं पूछता है कि वह पेड़ क्यों सूखा, किसने सुखाया, उसकी जड़ों में क्या ऐसा डाल दिया गया है कि सौ वर्षों से हरा भरा देवदार कुछ ही वर्षों में धराशाई हो जाता है। कुछ लोगों का यह कहना है कि देवदार देवताओं का वृक्ष है, पवित्र है, पावन है और देवदार के वृक्ष में जहां सीवरेज का गंदा पानी लगता है जहां पवित्रता नहीं रहती, वहां देवदार का पौधा पनपता नहीं है और शिमला के शहर के आसपास के जंगल में जहां मकान बने हैं सीवरेज का पानी जमीन में रखता है वहां पुराने पेड़ तो जैसे कैसे टिके हुए हैं परंतु नई देवदारों की पौध उपज नहीं रही है। तो क्या कुछ वर्षों के बाद धीरे-धीरे देवदार के पौधे अदृश्य हो जाएंगे और उनकी जगह केवल ऊंचे ऊंचे मकान ही नजर आएंगे।
देवदारों और वनों की रक्षा करने वाले बान के पौधे नष्ट हो गए हैं जो मिट्टी को मजबूत पकड़ देता है। बान की कमी के कारण तेज बारिश से भूमि के कटाव को बचाना आसान नहीं है । पर्यावरण ने मौसम के मिजाज को बदला है और अब तो ऐसा भी देखने में आ रहा है कि बादल पानी बरसाने के लिए आसमान तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं बीच में ही फट जाते हैं और उसका भयंकर परिणाम प्रदेश के कई भागों में देखने को मिला है।
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और पर्यावरण संतुलन के लिए यह आवश्यक है कि सरकार और जनता मिलजुल कर पर्यावरण को संतुलन बनाए रखने के लिए प्रयास करें, केवल एक दूसरे की आलोचना करने मात्र से काम नहीं चलने वाला। अब समय है कि देवदारो को बचाने का, उनकी पवित्रता को बनाए रखने का, ताकि शिमला की पहचान देवदार के जोकि सदियों के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं के साक्षी बने हुए हैं, जिन्होंने अनेकों उतार-चढ़ाव, वर्षा आंधी तूफान धूप छांव को सहा है, जिया है, उनका अस्तित्व बना रहे। देवदार रहेंगे तो शिमला रहेगा, शिमला रहेगा तो हमारी पहचान बनी रहेगी। अन्यथा प्रकृति तो प्रकृति है, उसकी अपनी नियति है, वह समय समय पर अपना नया रंग रूप बदलती रहेगी। अपने जीवन और सभी प्राणियों के कल्याण के लिए मनुष्यों को संभलने की जरूरत है ताकि प्राणियों का अस्तित्व भी बना रहे।
✍️ हितेन्द्र शर्मा
पत्रकार एवं साहित्यकार
कुमारसैन, शिमला हि.प्र.
