✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य
परमात्मा ने इस धरती पर असंख्य प्राणियों के जीवन यापन, प्राण रक्षा एवं भोग के लिए विभिन्न प्रकार के अन्न औषधियां वनस्पतियां तथा अन्य पदार्थ बनाए हैं जिनका भोग करता हुआ यह मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह जीवन व्यतीत करता है। अंतर केवल इतना है कि जहां असंख्य प्राणी अपने गुण कर्म स्वभाव के अनुसार प्रकृति का भोग करते हैं, जरूरत से ज्यादा संग्रह नहीं करते और अपना पेट भरने के लिए दूसरों की बस्तियां नहीं उजाड़ते। वास्तव में पशु पक्षी जानवर सभी प्रकृति के नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं। दुर्भाग्य से मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो लोभ लालच स्वार्थ में अंधा होकर धन-संपत्ति वर्षों लिए, कई कई पीढ़ियों तक के लिए जोड़ करके रखना चाहता है और उसके लिए ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ छल कपट का प्रयोग करता है। मनुष्य औरों की संपत्ति को हडपने के लिए कई तरह के दांव आजमाता है। वह मर जाता है लेकिन उसकी भूख नहीं मरती जबकि शास्त्रों ने मनुष्य को चौरासी लाख योनियों में सबसे श्रेष्ठ प्राणी का दर्जा दिया है। उसे सत्य का आचरण करने तथा धर्म के मार्ग पर चलने के लिए सद्बुद्धि प्रदान की है।
प्राय देखा जाता है कि वर्तमान में मनुष्य वनों को उजाड़ रहा है, पेड़ों को काट रहा है। पशु पक्षियों के रहने के स्थान को नष्ट भ्रष्ट कर रहा है नदी नालों में घुसकर घर बना रहा है। होटल बनाकर व्यवसाय चला रहा है। वह प्रकृति को नकारता है। स्वयं को ताकतवर, अत्यंत शक्तिशाली समझता है लेकिन वह यह भूल जाता है कि प्रकृति कब रौद्र रूप दिखा दे, किसे क्या मालूम ।और जब बाढ़ आंधी तूफान के साथ सामना होता है तो मनुष्य अपने आप को असहाय महसूस करता है । किस नदी नाले खड्ड का रुख कब किस दिशा में नया मोड़ ले ले, कोई नहीं जानता। सदियों , सालों पहले जो नदी का रास्ता था उस पर हम जितने चाहे बांध बना लें नगर बसा लें लेकिन कभी न कभी वह पानी अपने मार्ग को ढूंढता हुआ कई बस्तियां उजाड़ देता है और यही मंजर आजकल देखने को मिल रहा है।
जब द्वापर में द्वारका जी समुद्र में समाने लगी ,वह भी तो एक प्रकृति की अद्भुत घटना थी। तब योगेश्वर श्री कृष्ण जी को इसका आभास हो गया और उन्होंने द्वारिका को उस स्थान से निर्वासित करके अन्य स्थान पर बसाकर प्रजा तथा जान माल की रक्षा की। परंतु हमने भगवान श्री कृष्ण के इस अद्भुत कृत्य को चमत्कार मान लिया लेकिन कृष्ण के द्वारा प्रवर्तित उस वैज्ञानिक रहस्य को नहीं समझा जिस सूझबूझ से उन्होंने एक महान नगर को डूबने से बचाया। मनुष्यों पशुओं की रक्षा की । वास्तव में इसका अनुकरण किया जाना चाहिए था परंतु हम यह सब भूल गए और बस कृष्ण की भक्ति को एक चमत्कारी रूप देने में लगे रहे।वर्तमान में भी अगर ध्यान से देखा जाए तो पानी बस्तियों में नहीं आ रहा है इसके विपरीत पानी के बहने की जगह पर हमने बस्तियां बसा ली है । हमारे स्वार्थवश प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है और उसके दुष्परिणाम हमारे सामने है।
पहाड़ों पर जहां छोटे-छोटे एक तरफा सड़क मार्ग बनाकर परिवहन की व्यवस्था को अच्छा बनाया जा सकता है। पहाड़ों को अंदर तक तोड़कर खोखला करके चौड़ी चौड़ी सड़कें बनाकर पर्यटन और विकास के नाम पर दुहाई देना भारी पड़ता जा रहा है । इस भारी विनाश के बाद भी कोई अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है । बस मुआवजे की प्रक्रिया पूरी होगी। आनन-फानन में कुछ लोगों को चंद रुपए देकर के मामला सुलझा लिया जाएगा परंतु नदियों के किनारे पर, गांव के नालों में मकान बनते रहेंगे जबकि इस संबंध में कठोर कानून बनाए जाने की जरूरत है ताकि हर साल बरसात में होने वाले नुकसान से बचा जा सके। अन्यथा हर साल बारिश होगी, बाढ़ आएगी, नुकसान होता रहेगा और सरकार मुआवजा बांटती रहेगी और यह सिलसिला कभी कहीं भी रुकता हुआ नहीं दिख रहा है क्योंकि हम सभी पत्थर की लकीर बन गए हैं। हम समस्या होने के बाद फौरी तौर पर उसका उपचार तलाशते हैं ,उसका हमेशा के लिए इलाज करना कभी हमारी सोच में नहीं रहा। शायद कुछ दिनों बाद पहाड़ों को चीर कर सड़कें बनाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा और उसके दुष्परिणाम भी सामने आते रहेंगे हां विकास के लिए सड़के बनाना जरूरी है परंतु इसके लिए किस स्थान पर मिट्टी चट्टान कमजोर है मजबूत है इसकी पार्क किए बिना भारी भरकम और चौड़ी सड़क बनाने से परहेज किया जा सकता है।
आज का आदमी एक मिनट के लिए अपनी कार नहीं रोकना चाहता है । वह बस यही चाहता है कि पहाड़ से पत्थर ना गिरें पानी बहे, सारी दुनिया, सारी प्रकृति, सारे पहाड़, सारे नदी नाले झरने उसके लिए रुक जाएं परंतु यह संभव नहीं है बहुत सारे हादसे पहाड़ों से पत्थर मलवा पानी गिरते हुए उसे पार करने की जिद में हुए हैं जिन्हें कम किया जा सकता है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रकृति हर बार मौका नहीं देती है हर साल बरसात का मौसम आएगा पानी बरसेगा नदी नाले तूफान पर देखे जाएंगे इस खेल में मनुष्य को अपना बचाव कैसे करना है यह उसे स्वयं सोचना होगा।
बारिश पहले भी होती थी आज भी हो रही है लेकिन बारिश का होना कुछ ना कुछ तो बदल गया है। पहले घनी धुंध पढडती थी। सतरंगी इंद्रधनुष बनाकर प्रकृति धूप छांव का खेल खेलती थी। लोग कहते थे नदी नालों से पानी भर कर के बादल ले जाता है और उंचे आसमान में जाकर धीरे-धीरे करके ऐसे बरसाता है कि फसल खराब न हो ,पशु पक्षी मनुष्य किसी भी प्राणी का कोई नुकसान ना हो लेकिन वर्तमान में बादल आते हैंं नदी नालों से पानी भरकर अभी तक पहाड़ों पर पहुंचते ही नहीं हैं कि रास्ते में ही फट जाते हैं और बादलों के फटने से बाढ़ का मंजर साक्षात देखा जा सकता है। जहां बादल फटता है वहां पानी का तेज बहाव जमीन और बस्तियों को उजाड़ देता है। रास्तों सड़कों का नामोनिशान मिट जाता है। अब सोचने की बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है। कारण भी सभी जानते हैं कि ऐसा सब कुछ इसलिए हो रहा है कि हमने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। जंगलों को काटकर घनी बस्तियां बसा ली हैं। खेतों को उजाड़ कर कंक्रीट के जंगल बसा करके नई बस्तियां बसा दी हैं । पानी के बहने का मार्ग रोक दिया है। नदियों नालों को बहने का स्थान पर भी कुछ ना कुछ बना दिया है। लेकिन जब कभी बादल फटेगा, पहाड़ चिल्लाएगा तो इस तरह का विनाश देखने को जरूर मिलेगा।
पहले गांव में मकान ऊंची धार पर बनाए जाते थे जहां धूप आती थी लेकिन पानी कभी इकट्ठा नहीं होता था और घाटी की ढलान में जहां पानी जमा होता था वहां खेत क्यार बनाए जाते थे जिसमें धान की फसल होती थी । अब खेतों में बना दिए मकान। लेकिन पानी का रास्ता तो वही है। आदमी ने सोच लिया कि दो चार फुट की दीवार बना देने से हम सुरक्षित हो गए, अब पानी वहां से नहीं आएगा तो यह उसकी भूल है। पुराने लोग भले ही अनपढ़ थे परंतु पूरे वैज्ञानिक थे, समझदार थे । वे नदियों नालों जल स्रोतों के नजदीक मकान नहीं बनाते थे। बरसात के मौसम में भारी बारिश भूस्खलन और बाढ़ के अंदेशे से अकारण यात्राएं घूमना फिरना नहीं करते थे।
आइए, फिर से बिचारे जो हमसे भूल हुई है जो हम प्रकृति का अंधाधुंध दोहन और विनाश करने में लगे हैं उसमें कुछ विराम लगाएं अन्य विकसित देशों की तरह कुछ बाहरी देशों में तेज गति से विकास हुआ है परंतु उन्होंने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ अंधाधुंध छेड़खानी नहीं की है। सड़कों और उद्योगों का निर्माण करते हुए पेड़ों को बचाया है। नए पेड़ लगाए हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया है लेकिन उसके विपरीत भारत में विकास के नाम पर विनाश को खुला आमंत्रण दिया गया है। असंख्य पेड़ काटे गए हैं। प्रकृति को नुकसान पहुंचाया गया है। विकास और विनाश का संतुलन नहीं बन पाया है विकास दिखता तो है परंतु उसकी चुनौतियां कम नहीं होती और जब कहीं-कभी आंधी तूफान बाढ़ के साथ विनाश देखने को मिलता है तो कुछ दिनों के लिए शासन तथा जनता की आदमी की सांस जरूर रुक जाती हैं लेकिन फिर भी उससे कोई वह सबक नहीं लेता है वह फिर से उसी अंधी दौड़ में शामिल हो जाता है। सब कुछ भूल जाता है फिर से तेजी के साथ दौड़ने लगता है एक अंतहीन मार्ग पर, जो उसे विकास के साथ-साथ विनाश के मार्ग पर भी धकेलता चला जाता है। अब विकास के नाम पर उस गति को थोड़ा बदलने तथा सुरक्षित होकर चलने की जरूरत है ताकि इस संतुलित प्रकृति में हमको जीवन जीने का हक मिले और हम अपने आप ही अपने विनाश का कारण न बनें।
✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य