महादेव तेबनी की चवासी शिखर यात्रा के बाद अपने भानजे चोपड़ू नाग की कोठी महोग की ऐतिहासिक यात्रा
महादेव तेबनी ने चवासी शिखर पर 25 मई 2023 को रात्रि प्रवास के बाद 26 मई को महोग के लिये देवलुओं सहित प्रस्थान किया। प्रस्थान से पूर्व सभी देवों की विधिवत् पूजा के बाद भव्य नाटी नृत्य को आयोजन किया गया। नाटी नृत्य के बाद अपराह्न दो बजे महादेव ने देव नृत्य के बाद चौपड़ू नाग के पुण्य धाम महोग की ओर प्रस्थान किया। महोग से पूर्व मार्ग में शगाच गांव में नाग चवासी का प्राकट्य स्थल है। यहां कुई फूल की झाड़ी में बूढ़ी नागिन ने सात बच्चों को जन्म दिया। चोपड़ू नाग कालांतर में अपने चमत्कारों के सामर्थ्य से चवासी में प्रतिष्ठित हुई। अन्य नाग भ्राता पनेऊई नाग, माहूं नाग, चपलान्दु नाग, शाई नाग आदि अलग अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित हुए। शगाच में महादेव ने विश्राम कर अढाई फेरे नृत्य कर महोग के लिये प्रस्थान किया।
महोग मे लगभग छ: बजे रथ पर विभूषित नाग चवासी महादेव की अगुवाई के लिये मंदिर से बाहर वाद्ययंत्रों की धुन पर बाहर निकले। प्रागण में मामा महादेव तेबनी व भानजे नाग चोपड़ू का भावप्रवण मिलन हुआ। महादेव व नाग के गूर व सम्बंधित देव गूर भी आवेशित अवस्था में आपस में अंतरंगता से मिले। इस अनोखे देव मिलन के बाद दोनों देव मंदिर के अंदर विराजित हुए। महोग में नाग चवासी की कोठी चौकीनुमा है जिसका निर्माण अभी प्रगति पर है। चवासी मंदिर में सिद्ध बाबा का विशाल बर्तन,अन्नपूर्णा का खुडीजल द्वारा प्रदान जलकड़ाह, अंगारे उगलती करनालें, छोई देव का ढोल, बाणा व नगाढ़ा दिव्य वस्तुएं दर्शनीय है। रात्रि को प्रवास के बाद 27 मई 2023 को सुबह देव खेल में प्रजा को आशीर्वाद का वर्षण किया गया। लगभग तीन बजे महादेव तेबनी और नाग चवासी के भावपूर्ण मिलन ने सभी की आखें नम कर दीं। फिर महादेव वापस अपने धाम तेबन की ओर प्रस्थान कर गये। महादेव तेबनी की नाग चवासी से प्रथम रथारूढ़ होकर ऐतिहासिक मिलन के साक्षी पूरे चवासी गढ़ व रामगढ़ के लोग रहे। सुकेत की सीमा पर स्थित चवासी गढ़ क्षेत्र की धार्मिक व सांस्कृतिक परम्पराएं पुरातन काल से यथावत् विद्यमान है।
अपने इष्ट के प्रति सर्वस्व समर्पण यहां के लोक समूह की विशिष्टता है। नि:संदेह चवासी क्षेत्र की यह यात्रा चिरस्मरणीय रही। हितेन्द्र शर्मा के साथ ऐसे लोकसमूह के साथ मिलन हुआ जो अतिथिप्रिय और लोकसाहित्य के संरक्षक थे। सुकेत की इस यात्रा से यहां की संस्कृति का सुधापान करने का सुअवसर मिला वह स्मृति में चिरस्थाई रहेगा। चवासी यात्रा का एक सुखद स्मरण:
पोरू पड़ा चवासा, ओरू पड़ा गणेशा
हाडी हाडिया जाघड़ू थकै, कोई न बोलौ बेशा
चवासी यात्रा के दौरान रूखणू में एक महिला ने बठुरू व चाय पिलाकर इन पक्तियों के सत्य को झुठला दिया। सचमुच सुकेत के लोगों की अतिथिप्रियता का कोई सानी नहीं…चवासी यात्रा संस्मरण शीघ्र ही….अगले प्रकरण में….✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली