…..यात्रा संस्मरण…..
सुकेत क्षेत्र प्राकृतिक, ऐतिहासिक, वैदिक व पौराणिक प्रमाण व आख्यान की वह थाती है जिसकी अनुभूति के सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन में सहज ही होती है। सुकेत का नामकरण आबाल ब्रह्मचारी व व्यासपुत्र शुकदेव की साधनास्थली से व्युत्पन्न हुआ माना जाता है. अन्य परम्परा में सुकेत की अतुलनीय प्राकृतिक सुषमा के कारण सुखक्षेत्र या सुक्षेत्र से सुकेत शब्द की व्युत्पति मानी जाती है. सुकेत का उत्तरी भाग व्यास घाटी व दक्षिणी भाग सतलुज घाटी के अंतर्गत है. सतलुजघाटी के अंतर्गत करसोग उपमण्डल में स्थित पांगणा सुकेत की आरम्भिक राजधानी है यहां आदि राजपुरूष वीरसेन की कुलदेवी महामाया पांगणा का अद्भुत दुर्ग मंदिर शोभायमान है.सतयुगीय इतिहास की प्राचीन नगरी ममेल (करसोग) में महादेव ममलेश्वर विराजित है.यहीं भार्गव वंश के जनक भृगु ऋषि की साधना की दैवीय आभा विद्यमान है.सप्तर्षियों में एक ऋचीक पुत्र जमदग्नि व उनके पुत्र परशुराम ने सुकेत क्षेत्र में आर्य संस्कृति का विस्तार किया जिसके अनगिनत चिन्ह लोकसंस्कृति व परम्परा में गहरे समाए हैं. पाण्डवों की क्रीड़स्थली व उनका दैवीकरण सुकेत की पावन भूमि की विशिष्टता है.महाबलि कर्ण माहूनांग, गंगापुत्र भीष्म पोखी नाग, बकासुर देव दवाहड़ी, द्रोणाचार्य देव बड़ेओगी व बर्बरीक कमरूनाग रूप में आराधित हैं. यहां शैव,शाक्त,नाग मत के साथ साथ वेताल,यक्ष, गंधर्व,योगिनियों व चराचर जगत के विविध रूपों की देव रूप में पूजा की जाती है.महादेव सुकेत की धार्मिक व्यवस्था के शार्ष पर है.ममलेश्वर महादेव,तेबनी महादेव,बैंशी महादेव व सोमेश्वर महादेव सुकेत की शैव परम्परा के आधार हैं.शक्ति रूप में कामाख्या देवी, राज राजेश्वरी महामाया पांगणा, चिण्डी देवी, देवी छण्डियारा व छिबरी देवी प्रसिद्ध हैं.सुकेत नागों की मूल भूमि रही है.नाग माहूं,धमूनी नाग,ढैंशरी नाग,शुशनी नाग,हुंगलू नाग,कशोई नाग,सुनानी नाग, कजौणी नाग व शुशनी नाग आदि स्थान स्थान पर पूजित है.इनके अतिरिक्त ऋषि वशिष्ट,कश्यप व विमल आदि आर्य संस्कृति के आधार स्तम्भ है।

25 व 26 मई को सुकेत के चवासी गढ़ के इतिहास में लगभग 45 वर्ष बाद एक दु्लर्भ देव घटना घटित होने वाले थी. पाण्डवों द्वारा आराधित तेबनी महादेव का चवासी गढ़पति अपने भानजे नाग चवासी की तप:स्थली चवासी व फिर 26 मई को नाग के पावन धाम महोग की यात्रा प्रस्तावित थी. यह पहला अवसर था जब दोनों देवों का रथों में साक्षातकार होना था. तेबनी महादेव के गूर किशोरीलाल मेहता जी हमारे घनिष्ट रहे हैं. उन्होने कहा कि मैं चाहता हूं कि आप और हितेन्द्र शर्मा जी जो हिमालयन डिजिटल मीडिया के प्रमुख हैं यहां आएं और इस ऐतिहासिक घटना को चैंनल के माध्यम से जनता को प्रेषित करे. मैंने भी हितेन्द्र शर्मा से इस विषय पर बात की, हितेन्द्र शर्मा ने भी अनिश्चित से भाव से हामी भरी, मेरा भी लगभग हितेन्द्र शर्मा की तरह इस सांस्कृतिक यात्रा में जाने का अनिश्चित सा भाव था। कारण यही कि कुछ कार्यालय की व्यस्तता और कुछ पारिवारक बाध्यता. खैर अभी दिन शेष थे. जब कभी देवकृपा बनती है तो रास्ते स्वयम् खुल जाते हैं. 25 मई 2023 को तेबनी महादेव व नाग चवासी सिद्ध की दैवीय प्रेरणा से अचानक ही लगभग पूर्वाह्न ग्यारह बजे मेरा व हितेन्द्र शर्मा का यकायक चवासी गढ़ जाने का कार्यक्रम बन गया. मैंने कोई तीन बजे अपराह्न गाड़ी लेकर किंगल की ओर चला हितेन्द्र जी अपने बैग व ट्राईपॉड को लेकर कार में बैठ गये. मन में चवासी गढ़ के उतुंग शिखर पर महादेव तेबन व नाग चवासी के दिव्य मिलन की उत्कण्ठा थी. किंगल से चलते ही हितेन्द्र शर्मा ने अपने परिवार के उतार चढ़ाव की कहानी शुरू कर दी। विषय रोचक था, आसमान पर सतलुज के दायीं ओर सुकेत पर भयानक काले बादल उमड़ आये थे। हितेन्द्र जी तो आप बीती को बड़ी रोचकता से सुना रहे थे। किंगल से खेखर होते कब कुल्लू सराज के प्रवेश द्वार लुहरी पहुंचे पता ही नहीं चला। महज एक किमी आगे निकले थे लुहरी से तो भयंकर वर्षा ने हमारा स्वागत किया। नौबत यहां तक आ गई कि दो किमी आगे कार रोकनी पड़ी. सड़क तो जैसे नदी बन गई. खैर आधा घण्टे मे मौसम कुछ सामान्य सा हुआ. हमारे मेजवान नाग चवासी के कारदार टीसी ठाकुर ने हमें सुझाव दिया कि आप लोगों को केलोधार होते कताण्डा गली से वाया पोखी आना सुगम रहेगा. अत: हम भी कोटलू होते केलोधार की ओर बढ़े. केलोधार से कढार गली होते आगे बढ़े।

रास्ते में एक युवा ने हाथ देकर कार रोकी. हमने भी दया कर गाड़ी रोक दी. बैठते ही जैसे हमने परिचय पूछा तो वह व्यक्ति धारा प्रवाह अपना परिचय और प्रयोजन उडेल दिया. वह बोला कि सर जी मैं भी चवासी गढ़ जा रहा हूं. तेबनी महादेव की शवाठी से हूं. चलो हमें भी कोई ऐसा व्यक्ति मिल गया जिससे हम संवाद कर सके. उसने कहा कि सर जी चिंता न करो, गाड़ी का पूरा रास्ता देखा है मैंने बम उसकी बात से आश्वस्त हुए–चलो कोई रास्ता बताने वाला तो मिला. कढार गली से आगे कताण्डा गली से पहले एक मार्ग पोखी की ओर जाता है। टी सी ठाकुर ने बताया था कि पोखी से पहले एक मार्ग चवासी की ओर आता है. हालांकि मार्ग चवासी चोटी तक नहीं है. फिर भी चोटी से थोड़ा नीचे नाहवीधार तक मार्ग है. जैसे ही हम पोखी के जाने के मार्ग पर पहुंचे तो दो गाड़ियां खड़ीं थी. दोनों के चालकों ने बताया कि आज इतनी वर्षा हुई कि चवासी का मार्ग नाला ही बन गया. आपको बेहतर यही होगा कि आप कताण्डा में गाड़ी खड़ी कर वहां से पैदल चवासी जाओ. समय यही कोई दो घण्टे लगेंगे. हमने भी कताण्डा पहुंचकर थोड़ा आगे जाकर वन विभाग के गार्ड क्वाटर के आगे गाड़ी खड़ी कर पैदल चलना आरम्भ किया. जैसे ही हम आगे बढ़ने लगे तो तीन महिलायें भी चवासी यात्रा की सहचरी मिली. मैंने पूछा आप कहा से? एक बोली हम रामगढ़ के अंतर्गत ठाकुरठाणा की हैं. हम भी तेबनी महादेव की चवासी में दर्शनाभिलाषी हैं. चलो कुछ ओर साथी तो मिल गये.समय कोई पांच बजे का हो चला।
सुकेत क्षेत्र की यह विशेषता है कि यहां के लोग मिलनसार और आत्मीय हैं. थोड़े ही समय में तीनों महिलायें आत्मीय रूप में गपशप करने लगी. अपने जिज्ञासु भाव के कारण कई सवाल हमने लोक साहित्य से जुड़े उनपर जड़ दिये. मैंने पूछा कि आप को माड़ गीत तो आते होगे. चूंकि सुकेत में माड़ गीत व माड़ त्यौहार बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है. एक महिला ने कहा कि उसे माड़ के सारे गीत आते हैं. वैसे इन तीन महिलाओं में आपसी रिश्ते में दो पचास ऊपर महिलायें थी. दोनों तीसरी महिला की रिश्ते में सासें थी. परन्तु सास बहू में जो स्वछंदता थी उस आधार पर तो वो सभी सहेलियां थी. मैंने भी सुकेत की परम्पराओं को सांजा किया तो एक महिला हमारे ज्ञान से प्रभावित हुई. उलके मुंह से एक पहाड़ी मुहावरा फूट पड़ा:
तुम्है खाई छावणी
हामै खाई कावणी
अर्थात् आपने तो हर क्षेत्र की खाक छानी है. हम बेचारों ने तो घर से बाहर कुछ देखा नहीं. बस घर में कमाते रहे और स्थानीय उत्पाद काऊंणी को खाते रहे. हमारे पास आप की तरह भला भारी भरकम ज्ञान कहां हो सकता है. मैं उन लोक साहित्य मे सिद्धहस्त महिलाओं की बात बात कर लोकोक्तियों व बखाण को मोबाईल में लिखता रहा. रास्ता चढ़ाई का था। हितेन्द्र जी उस चढ़ाई को प्रयास के साथ सबसे पीछे चलते हुए पार कर रहे थे. सुकेत के ग्रामीण क्षेत्र की उन महिलाओं में लेशमात्र भी हीनता का भाव नहीं था. जीवन की डगर उनकी कठिन ही सही परन्तु चुनौतियों को हंसते हंसते आपस में हास परिहास से पार कर लेना ने बखूबी जानती थीं. मैंने सोचा— देखिये गांव के ये निपट भोले लोग अपनी वंचनाओं को मुस्कराहट में ढक लेते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह कि दूसरों से व्यवहार करते लेशमात्र भी बनावटीपन नहीं. बस हंसी हंसी में बात को करते दूसरों के चेहरे पर हंसी की सौगात बिखेर देना. यूंही चलते चलते हम कताण्डा से थोड़ा ऊपर चल कर ऐसे सुन्दर स्थान पर पहुंचे जिसकी सुन्दरता आंखों में भी न समाती. एक खुला घास का मैदान और साथ में पहाड़ी शैली का लघु मंदिर, महिलाओं से पूछने पर पता चला कि यह मंदिर नाग चवासी के साथ प्रतिष्छित हुंगलु नाग का है. मंदिर के बाहर काष्ठ की एक मुण्डली भी स्थापित है. महिलाओं ने बताया कि यहां नाग के सम्मान में यहां वैशाख मास में ठिरशू मेले का आयोदन होता है. नाग देवता रथारूढ़ होकर यहां आकर लोगों को दैवीय सौख्य प्रदान करते हैं. नाग हुंगलु नाग चवासी के साथ प्रतिष्ठित है. साथ ही बडौण गांव के ठीक समानांतर उत्तर पश्चिम की ओर खन्योल में इनका मंदिर भी है. हुंगलु नाग को झाड़ी से उत्पन्न नाग झाकड़ु नाग भी कहा जाता है. शायद झाड़ी से प्रकट होने के कारण झाकड़ु नाम पड़ा लगता है। नाग का सम्बंध पंद्रहबीश के सरपारा से उत्पन्न नौ नागों में एक झाकड़ु ही यहां आये हो. वास्तव में हिमाचल में नाग आर्येतर जाति थी। कुल्लू के अठारह नाग व नौ नागों की प्रतिष्ठा यहां है ही. जबकि चवासी क्षेत्र के अंतर्गत शगाण में अठारह व नौ नागों की माता बूढ़ी नागिन के सात नागों की उत्पत्ति का संदर्भ भी सर्व प्रचलित है जिसका संदर्भ आगे देंगे. जैसे जैसे हम चवासी शिखर की ओर बढ़ने लगे प्राकृतिक छटा भी हमें सम्मोहित करने लगी. कताण्डा में हुगलु नाग के उस सुन्दर मैदान में मैंने व हितेन्द्र शर्मा ने कुछ दृश्य कैमरे में कैद किये. मैंने हितेन्द्र जी से कहा कि यहां एक वीडियो बना लें. परन्तु मन में तो चवासी में महादेव के पहुंचने से पहले वहां की ऐतिहासिक उस घटना को कवर करने की थी जो चालीस पैंतालीस साल बाद घट रही थी।

कताण्डा के बेहद खूबसूरत मैदान से आगे मार्ग हल्की चढ़ाई का था.परन्तु मार्ग में चलते सुकेत के अनेक क्षेत्रों का मनोरम दृश्य विमोहित करने वाला था.यहां से रामगढ़ के सोमाकोठी व ठाकिरठाणा का हरितिमा लिये क्षेत्र बड़ा आकर्षक लग रहा था.ये सहचरी महिलाओं से ही पड़ोसी क्षेत्र का परिचय हमें मिलता रहा. महिलाओं ने बताया कि हमारे ठाकुरठाणा में नाग सुंदलु के मंदिर में जून में प्रतिष्ठा है. आप जरूर आएं. सुन्दलु नाग भी सोमेश्वर महादेव के साथ सोमाकोठी में विराजित हैं. सोमाकाठी व ठाकुरठाणा साथ साथ ही है. सोमाकोठी के सुमू देव महादेव तेबनी के भ्राता माने जाते हैं.वर्षा व आंधी-तूफान जैसी आपदा को टालने व लाने के कारक माने जाते हैं।

कताण्डा गली से चवासी तक का रास्ता हल्की चढ़ाई का है. रास्ते में कैल, देवदार, बान व मौरू के वृक्षों की शीतलता द्ल में आह्लाद भर देते हैं.जैसे जैसे हम चवासी की बढ़ते जा रहे थे हमारे सामने सोमाकोठी, ठाकुरठाणा, माहूंनाग व धमुनी नाग की नयनाभिराम चोटियों व स्थलाकृति का नयनाभराम दृश्य उभर रहे थे.आंखें विशाल व सुन्दर भूदृश्यों को बरबस समेटना चाहती थी. रास्ते में चलते महिलाओं की आत्मीयता से सुकेती की कई कहावतें मुंह से फूट रहीं थी। हालांकि मैैंने सुकेत के कई संदर्भ उनके सामने रखे. वे सुनकर पुलक्त हो उठी, हितेन्द्र शर्मा चढ़ाई से निबटते कुछ पीछे थे.जब कोई पहाड़ी ढकोसला महिलायें सामने रखती तो मैं हितेन्द्र को बता देता. हमारी सुकेत की जानकारी पर एक महिला ने पहाड़ी कहावत कही:
जब थिये जबान तब थे गड़ी गड़ी के भेती
ऐबै हुऐ हुऐ पड़ुऐ शेती…
अर्थात् जब हम जवान थे तो भ्रमण कर स्थान स्थान की खाक छानते थे. अब बूढ़े हुए तो घर में सिमटकर रह गये हैं. कितना अनुभव जुड़ा है हमारे ग्राम्य क्षेत्र के जनमानस में! पहाड़ से जीवन के अनुभव से जन्मे वाक्यांश हर काल में प्रासंगिक है. समय फिसलता जा रहा था. हमारा ध्येय महादेव तेबनी का साढ़े चार दशक बाद चवासी गढ़ शिखर पर पहुंचने के ऐतिहासिक क्षणों का साक्षी होना था. छ: बज चुके थे.उधर तेबनी महादेव के गूर किशोरीलाल जी बार बार फोन कर जल्दी आने का आग्रह कर रहे थे. चूंकि कहीं सात बजे महादेव चवासी पहुंचने वाले थे.चलते चलते हम ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां सेब के बागीचे में एक दो घर थे. हमारे साथ चलती एक महिला ने कहा कि यहां हम बैठेंगे. चूंकि यहां मेरी बहन रहती है. वर्षा हुई थी.अत: पानी से सनी घास में घर तक पहुंचते हमारा निचला हिस्सा भीग गया. उस सहचर महिला की बहन अपने कच्चे मकान के बरामदे में बैठकर हम सब का सम्मान करने के लिये आतुर थी. उसके चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान बिखरी पड़ी थी. जैसे ही हम घर के प्रागण में पहुंचे तो हमारी थकावट को देखकर एक पहाड़ी उक्ति उस मेजबान महिला के मुख से फूट पड़ी:
पौरू पड़ौ चवासी,
औरू पड़ौ गणेशा..
हाडी हाडिया जांगड़ू थकै,
कोई न बौलो बेशा…
हमें लगा कि चवासी के इस दूरस्थ क्षेत्र में लोकसाहित्य तो बोलचाल में रचा बसा है. यहां दो घर बने थे. जो ठाकुरठाणा की तीन महिलायें हमारे साथ थी उनके करीबी ही ये घर वाले थे. घर सेब के स्वस्थ बागीचे के बीच में था. हमें कमरे में आदर सहित बिठाया गया. हमें भी चढ़ाई के सफर के बाद चाय की दरकार थी. थोड़ी भूख भी लग पड़ी थी. इतने अतिथिप्रिय थी इस घर की महिला कि उसने पहाड़ी लोकप्रिय रोटियां बटूरू बनाकर रखे थे. चाय के साथ बटूरू का पहाड़ी खेतों में मिलने वाले नमक के साथ हमने मजा लिया. सांय अब इस आव-भगत में हो चली थी. अभी चवासी शिखर की यात्रा का कठिनतम् पड़ाव सामने था. रात की चवासी क्षेत्र में भारी ओलावृष्टि व बारिश से चढ़ाई का मार्ग फिसलन भरा था. हम अंधेरे में चवासी के दृश्यमान शिखर को लक्ष्य कर आगे बढ़ते जा रहे थे. चलते हुए एक स्थान पर गीले मार्ग में मेरा संतुलन बिगड़ा और धड़ाम से रास्ते में ही कीचड़ में गिर पड़ा. च्वासी की यहां से शुरूआत थी. खैर मंजिल की ओर कदम बढ़ते जा रहे थे. अब हम दो ही चले जा रहे थे. शेष वो महिलायें पीछे से चली आ रहीं थीं. चलते हुए हम बानीधार पहुंचे जहां कताण्डा गली से वाया पोखी सड़क पहुंची थी. गाड़ियां भी विशेषकर पिक अप यहां कीचड़ से सनी खड़ीं थीं. चवासी क्षेत्र में सड़कों की दुर्गति यहां की त्रासदी रही है.सरकार भी चवासी की ओर इस लिहाज से उदासीन ही रही हैं. बानीधार तक थोड़ा ऊपर चवासी गढ़ जाते हुए सड़क है.जोखिम भरा मार्ग…सीधी चढ़ाई.अपने ही दम पर ये मार्ग लोगों ने सेब की ढुलाई के लिये बनाये है. बानीधार से चनासी गढ़ तक का मार्ग कोई बीस-पच्चीस मिनट का है. बानीधार में किनौरी माता का लघु मंदिर है. बानीधार से कीचड़ भरे मार्ग से हम लोगों के काफिले के साथ चवासी गढ़ के उतुंग शिखर पर पहुंचे. समय कोई आठ बजे का था. हजारों की संख्या में लोग सुकेत के सबसे ऊंचे शिखर पर तेबनी महादेव व उनके प्रिय भानजे चवासी नाग चोपड़ू के महामिलन को देखने उमड़े थे. चनासी टिब्बे से शिमला, बाहरी सराज, सुकेत व शिमला के दूरस्थ क्षेत्र की टिमटिमाती रोशनी से ऐसा आभास हो रहा था मानो तारामण्डल ही धरती पर उतर आया हो।

चवासी गढ़ पर नव निर्मित पगोडा शैली का मंदिर चवासी सिद्ध को समर्पित है. यह मंद्र नाग चवासी के ठी पार्श्व भाग में है. सिद्ध के नाग देवता के पीछे होने का कारण यह है कि सिद्ध भाग का सेवन करते हैं जबकि नाग शुद्ध-सात्विक है.वे भांग सेवन को बुरा मानते हैं. इसलिये नाग देव के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए सिद्ध का मंदिर उनके पीछे है. आज भी यह परम्परा है कि जब सिद्ध का गूर देवावेश में आते है तो वह भांग का सेवन करता है. उस समय भी नाग के रथ पर पर्दा डाल दिया जाता है. सिद्ध के मंदिर में एक विशालकाय शिला है. यही सिद्ध की तप:स्थली है. गर्भ गृह भी इसी शिला पर अधिष्ठित है. चौरासी सिद्धों का यहां आगमन नवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक माना जाता है. चवासी का नामकरण ही नाथ-योगी परम्परा के चौरासी सिद्धों का विकृत रूप है. बौद्ध धर्म की बज्रयान परम्परा से ही यागी-नाथ, वाम मार्ग व कापालिक मत की तंत्र परम्परायें उभरी. योगी नाथ परम्परा ने विशुद्ध योग परम्परा का प्रतिपादन कर दक्षिण व उत्तर भारत में प्रचार किया. भरमौर में साहिल वर्मन के समय में सिद्ध नाथ परम्परा लोकप्रिय हुई. चम्बा के साथ सुकेत के मूषन वर्मन काल से सम्बन्धों के चलते सम्भव है सुकेत में नाथ योगियों का आवागमन रहा होगा. चवासी में प्रतिष्ठित सिद्ध के विषय में इनके गूर के अनुसार ये सिद्ध चौरासी सिद्धों में चौरासिवें सिद्ध थे..यह सिद्ध मानतलाई में अपने गुरू गुरू गोरखनाथ के साथ रहते थे. गोरखनाथ ने सिद्ध को हिमालय में ऐसे स्थान स्थापित होने का आदेश दिया जहां विस्तृत रमण स्थान हो.अत: यह सिद्ध बाहरी सराज के देव खुडीजल पहुंचा. इसने स्वयम् के लिये खुडीजल से स्थान मांगा. खुडीजल ने कहा कि मेरे पास तुम्हे देने के लिये इतना बड़ा क्षेत्र नहीं है जितना तुम्हे चाहिये।

अत: आगे बढ़ते हुए सिद्ध चवासी शिखर की ओर बड़े मार्ग में सिद्ध को नाग चोपड़ू का गण छोई मिला। छोई ने कहा कि में चवासी नाग का सेवक हूं. तुम नाग के पावन धाम चलो. यह स्थान ध्यान साधना के लिये उपयुक्त है. छोई के कहने पर सिद्ध का चवासी शिखर पर नाग से मिलन हुआ और नाग ने इसे अपना सेवक बनाकर यही अपने क्षेत्र में सदा के लिये स्थान दिया. चवासी सिद्ध नाग चोपड़ू के रथ में नाथ योगी के चिन्ह चिमटा रूप में विराजित है.चवासी सुकेत रियासत के पहाड़ी सर्कल करसोग के सोलह गढ़ों में एक था.यहीं सन् 1862 में रियासती सरकार की दमनकारी नीतियों व भ्रष्ट प्रशासन के विरूद्ध सत्याग्रह ‘दुम्ह’ की उत्ताल लहर भड़क उठी थी.चवासी की चोटी सुकेत रियसत की सबसे ऊंची चोटी है जिसकी ऊंचाई 8494 फुट है. त्रिकोणाकार शिखर पर नाग चवासी व सिद्ध तपश्चर्चालीन है. चवासी के उतुंग शिखर से चहंओर मनोहारी दृश्य बरबस आंखों में उतर आता है.यहां से कुल्लू के बाहरी सराज, जिला किन्नौर, शिमला व मण्डी का भूदृश्य आंखों में एक दृष्टि में ही उतर आता है.चवासी गढ़ की संरचना सामरिक दृष्टि से की गई थी.गढ़ के का पश्चिमी किनारा तीखा ढलाननुमा है. एक दृष्टि में हजारों फुट गहरी तीखी ढलाने दुश्मनों की कब्रगाह रहीं है. रियासती काल में चवासी का किला जहां सामरिक दृष्टि से अहम् था वहीं यहां मौत की सजा पाए अपराधियों को सजा भी दी जाती थी. किले के पश्चिमी भाग का ढलाननुमा स्थान इसी उद्देश्य के लिये प्रयुक्त होता था. यहां आज भी वह स्थान इंगित है जहां से फांसी की सजा के अभियुक्त को पीठ पर भारी वृताकार पथ्थर बांधकर पहाड़ी से नीचे हजारों फुट नीचे धकेल दिया जाता था.पथ्थर बांथने का प्रयोजन यही था कि वह व्यक्ति उसके बोझ से दूर तक लुढ़क कर मृत्यु को प्राप्त हो जाए।

इस मृत्यु स्थान से बच निकलने की एक अलौकिक घटना भी है. चवासी मंदिर के युवा कारदार टीसी ठाकुर के अनुसार एक बार राजा ने किसी निर्दोष व्यक्ति को मौत की सजा सुना डाली. अपनी निर्दोषता के कारण उस व्यक्ति ने चवासी सिद्ध से प्रार्थना की.यदि सिद्ध उसकी निर्दोषता सिद्ध कर दे तो वह बाबा को विशाल कड़ाह बनाकर अर्पित करेगा. जैसे ही एक विशाल पथ्थर उस व्यक्ति की पीठ में बांधकर उसे ढलान से नीचे धकेला गया वह व्यक्ति अचानक उड़कर दूर रामगढ़ क्षेत्र के गड़ा आरन स्थान पर सुरक्षित उतर गया. वही गड़ा आरन में लुहार जाति के उस निर्दोष व्यक्ति ने विशालकाय लोहे की कड़ाही का निर्माण किया और उस कड़ाही को संकल्प के अनुसार अकेले उठाकर मीलों दूर नाग चवासी सिद्ध की कोठी महोग ले गया.आज भी वह भीमकाय कड़ाही महोग कोठी के मंदिर में रखी गई है. आज भी जब चवासी नाग शाही स्नान या किसी विशेष अनसर पर क्षेत्र की यात्रा पर निकलते हैं तो उस भक्त लोहार के गाड़ा आरन स्थान पर अवश्य जाते हैं. 25 जून को चवासी गढ़ में भीषण वर्षा व ओलावृष्टि हुई थी. चवासी मेें ओलों की एक मोटी सफेद चादर बिच्छ गई थी. सेब के पेड़ों पर डाली गई जालियां ओलों के भार से टूट-फूट गईं थीं.चवासी में उस रात्रि मंदिर कमेटी की ओर से भोजन की व्यवस्था थी.रात्रि में भोजन करने के उपरान्त हम चवासी नाग के युवा कारदार टीसी ठाकुर के घर बडौण के लिये उनके पिता के साथ नीचे उतरे.बडौण गांव चवासी टिब्बे से लगभग पौने घण्टे की उतराई वाला रास्ता है. रास्ता बारिश के कारण फिसलन वाला था.थोडी सी गलती ढलान पर हमें कई मीटर नीचे धकेल सकती थी. कोई 11 बजे बडौण पहुंचकर टीसी ठाकुर की माता पहले से ही हमारी प्रतीक्षा में थीं. उन्होने फटाफट हमें चाय का प्रबंध किया.पांव धोने के लिये गर्म पानी. हमारी सारी थकान जैसे छू मंतर हो गई. टीसी ठाकुर की माता जी पहले से ही कोई पचास मेहमानों को भोजन व सोने की व्यवस्था कर चुकी थी.सिकेत के इस दुर्गम क्षेत्र के लोग बड़े अतिथिप्रिय हैं. मेहमानों के आतिथ्य में जान छिड़कते हैं. टीसी ठाकुर के पिता जी ने मेरी कीचड़ में सनी जीन्स को धोया. इतनी आत्मीयता इन सुकेत के लोगों में है कि पहाड़ से जीवन को ये हंसी-खुशी गुजार देते हैं. बडौण क्षेत्र में सेब भी काफी होता है. तीखी ढलानों पर कैसे सेबों के बागीचे लोगों तैयार किये?ये सब इन लोगों की उत्कट कर्मशीलता का प्रमाण है. रात्रि में हितेन्द्र और मैं सो गये. सुबह कब हुई पता ही नहीं चला. सुबह टीसी ठाकुर के पिताजी व माता जी ने हमें व अन्य दर्जनों मेहमानों को नहाने की फटाफट व्यवस्था की. मैंने सुबह ही चवासी की ढलान पर पसरे क्षेत्र को देखा. चूंकि रात्रि में तो कुछ अंधेरे में नजर नहीं आया. बडौण के पश्चिम में सोमाकोठी की अप्रतिम दृश्यावाली व उत्तर-पश्चिम में खन्योल क्षेत्र आंखों को सुकून दे रहा था.खन्योल में हुंगलू झाकड़ू देवता का नया मंदिर सुन्दर काष्ठ कला से निर्मित है. झाकडू नाग नाग चवासी के साथ भी आबद्ध है।
नाश्ता करने के बाद हम पुन: बडौण से कमरतोड़ चढ़ाई पार करने लगे. पूरे मार्ग से चहुंओर का दृश्य लालित्य से भरा है. मण्डी, शिमला, कुल्लू के बाहरी सराज व किन्नौर के उच्च शिखर व घाटियां किसी स्वर्गिक अनुभूति से कम नहीं हैं. हैरानी होती है कि क्यों प्रकृति के इस अनछुए क्षेत्र में सड़कों की इतनी दयनीय दशा क्यों है? पर्यटक तो खैर धार्मिक स्थानों की गरिमा का ग्रास जाते हैं. परन्तु धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व का यह चवासी क्षेत्र प्रकृतिप्रेमी व श्रद्धालुओं का स्वर्ग ही है. हमने रास्ते में कई स्थानों कैमरे में चित्र खींचे.चवासी पहुंचकर हमने कई प्राचीन प्रस्तर मूर्तियों व मंदिर काष्ठकला का अध्ययन किया. चवासीनाग के मंदिर में गर्भगृह में मुख्य मूर्ति शिव की है. लोगों ने बताया कि किसी घुमन्तु गुज्जर ने मुख्य मूर्ति को खण्डित कर दिया. मूर्ति को खण्डित करने का कारण यह था कि उसकी भैसों को देव कोप से कोई रोग लग गया. अत: क्रोधावेश में उसने मूर्ति को खण्डित कर दिया. खण्डित मूर्ति मंदिर के बायें किनारे बाहर रखी गई है.वह मूर्ति अपनी कलात्मकता के कारण सुन्दर है. मुझे लगता है कि प्रत्येक मंदिर में यदि कोई मूर्ति खण्डित हो जाये या खण्डित मूर्ति मिल जाे उसे पूजा के लिये निषिद्ध माना जाता है और उपेक्षित अवस्था में खुले में रख दिया जाता है. यही स्थिति चवासी में भी है. होना तो यह चाहिये कि इतिहास की ऐसी धरोहर मूर्तियों को संग्रहालय बनाकर सुरक्षित रखा जाये ताकि उस कलाकृति से इतिहास के छुपे रहस्यों को खोला जा सके.दोपहर बाद महादेव तेबनी मंदिर प्रांगण में विराजित हो गये. परम्परानुसार प्रांगण में नाटी नृत्य का भव्य आरम्भ हुआ. क्रमश:…
…✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली ‘हिम’