हितेन्द्र शर्मा, कुमारसैन
कुमारसैन उपमंडल के अंतर्गत सांगरी क्षेत्र में बड़ागांव का सीएचसी अस्पताल बिना डॉक्टर और नर्सों के ही चल रहा हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग दो वर्षों से बड़ागांव सीएचसी में डॉक्टर, नर्स सहित कई पद खाली पड़े हैं। यहां न बीमारी की जांच हो पाती है और ना दवाइयां मिल पाती हैं। डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ की कमी होने की वजह से मरीजों और तीमारदारों को इलाज के लिए कुमारसैन, रामपुर और शिमला के अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिसकी वजह से उन्हें काफी परेशानी भी होती है।
हिमाचल प्रदेश की सरकारें जनता से कई वादे करती और गारंटीयां बांटती फिरती हैं, जिनमें अक्सर भाजपा और कांग्रेस द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने का भी वादा किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाए तो कुमारसैन उपमंडल क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

बडागांव में सरकार ने एक अस्पताल भवन जरूर बनाया है, लेकिन इस भवन के भीतर न डॉक्टर हैं, न नर्सें हैं और न ही दूसरे मेडिकल स्टाफ मौजूद हैं। ऐसे में मरीजों को प्राथमिक उपचार और दवाइयों के लिए भी 20 किलोमीटर दूर कुमारसैन के धक्के खाने पड़ते हैं। कुमारसैन अस्पताल अक्सर मरीज़ों को शिमला रेफर करता है, इसलिए 100-120 किलोमीटर दूर शिमला पहुंचना लोगों की मजबूरी है।
डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ न होने की वजह से गरीब आदमी को बिना इलाज कराए निराश होकर वापस लौटना पड़ता है। यहां का सरकारी तंत्र भी स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को लेकर कितना गंभीर है, यह क्षेत्र के अस्पतालों के हालात देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है।

हालांकि बड़ागांव क्षेत्र के लोग बार-बार यहां डॉक्टर, नर्स, मेडिकल स्टाफ और दवाइओं के लिए मांग करते रहते हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने यहां की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई, ऐसे में सबसे ज्यादा समस्या गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगों को होती है कि वे इलाज के लिए कैसे जाएं। सरकारें घर-घर जाकर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने की बात तो अवश्य करती है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत कुछ ही बयां करती है।