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सतलुज घाटी में हरितालिका तीज पर चिड़त्री पर्व परम्परा

✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली

शैलेन्द्र हिमालय के पश्चिम के अंचल में बसा हिमाचल मानव सृष्टि का उद्गम स्थल रहा है. यहीं जलप्लावन के बाद मनु की सप्तर्षियों सहित नाव रूकी थी. जल प्लावन के क्षीण होने पर मनु ने शतरूपा के साथ यहां मैथुनी मानव सृष्टि का आविर्भाव किया था. अत: हिमाचल प्रदेश मानव सृष्टि के उपरान्त मानव सभ्यता व संस्कृति का आदि क्षेत्र रहा है. यही कारण है कि हिमाचल अनार्य व आर्य संस्कृति के सयोजित रूप का रंगमंच है. यहां की देव परम्पराएं, देवसमुदाय व पर्व अनार्य व आर्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करतीं हैं. हिमाचल प्रदेश में वर्ष के बारह महीनों की संक्रांतियों, तिथियों व प्रविष्टों में अनेकानेक पर्व, त्यौहार व मेले किसी न किसी पूर्ववर्ती घटनाक्रम के साक्ष्य रहे हैं. यहां प्रचलित आर्य व अनार्य संस्कृति की यह विशिष्टता रही है कि यहां की जन भावनाएं व पर्व-त्यौहार प्रकृति के प्रति अंतरंग सम्बन्धों व सम्मान के द्योतक रहे हैं. अनार्य व आर्य संस्कृति का संगम ही हिन्दू संस्कृति के विराट व उदात्त स्वरूप का परिचायक है. यह संस्कृति जीवन के चरम ध्येय को आध्यात्मिक व लौकिक दृष्टि के संयोजन से परिभाषित करती है. पर्व व त्यौहार हिमाचल के लोकमानस की प्रकृति से अभिन्न रूप से जुड़े हैं. आश्विन मास की शुक्ल तृतीया को हिमाचल में विवाहित महिलाएं अखण्ड सौभाग्य व अविवाहिताएं उत्तम वर प्राप्ति के लिये हरितालिका तीज का व्रत धारण करतीं हैं. इसके अतिरिक्त पुरूष भी अभीष्ट फल की प्राप्ति के निमित इस वर्त को धारण करते हैं।

सतलुज घाटी के अंतर्गत सुकेत क्षेत्र में हरियाली तीज अर्थात् हरितालिका का पर्व चिड़त्री पर्व के रूप में मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है. चिड़त्री दो शब्द चिड़ व त्री के संयोजन से बना है. चिड़ का स्थानीय बोली में अभिप्राय: चीड़िया व त्री का अर्थ तृतीया तिथि से है. अर्थात् चिड़त्री का अभिप्राय: चिड़ियों, वन्यजीवों व जगत नियंता के पूजन का पर्व है. अत: सुकेत में हरितालिका पर्व को चिड़त्री रूप में मनाने की परम्परा रही है. हरितालिका व्रत के आरम्भ व महत्व के विषय में व्रतराज ग्रन्थ में पार्वती व महादेव के बीच व्रत के महत्व पर संवाद का वर्ण सन्निहित है. इस प्रसंग के अनुसार माता पार्वती महादेव से पूछती है कि आश्विन शुक्ल तृतीया को मनाये जाने वाले पर्व का माहात्म्य क्या है? महादेव कहते हैं कि हे गिरिराज नंदिनी ! पूर्व जन्म में तुम शैलेन्द्र हिमवान (हिमालय) की पुत्री थी. तुमने मुझे प्राप्त करने के लिये घोर तप किया. तुम बारह वर्षों तक सिर धरती पर रख तप किया. 64 वर्षों तक पत्ते खाकर तप किया. तुमने माघ मास में जल व वैशाख मास में केवल अग्नि का सेवन किया. तुम श्रावण मास में अन्न त्याग कर घर से बाहर रही. पिता हिमवान पुत्री की इस घोर तपस्या से चिंतित हो उठे. तभी ब्रह्मापुत्र नारद आये और उन्होने वासुदेव के साथ शैलेन्द्र की कन्या के विवाह का प्रस्ताव रखा. हिमवान धर्मसंकट में पड़ गये.पार्वती नारद जी के इस प्रस्ताव में पीड़ित हो उठी. पार्वती अपनू सखी से बोली कि वह महादेव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प ले चुकी हूं. अत: पार्वती सखी सहित ऐसे निर्जन वन में चली गई जिसका ज्ञान हिमवान को भी नहीं था।

पार्वती नदी के किनारे सुरम्य स्थान पर एक गुफा में महादेव को पाने के लिये अन्न त्याग कर व बालू का लिमग विग्रह कर तप करने लगी. पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में व्रतादि कर व रात्रि में जागरण कर महादेव को प्रसन्न किया.पार्वती के भीषण व्रत धारण से शिवजी का सिंहासन डोलने लगा. उसी समय शिव प्रसन्न मुद्रा में वहां प्रकट हुए. शिव द्वारा पार्वती को वर मांगने के आग्रह पर माता पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने का वर मांगा. शिव ने ऐवमास्तु कहकर पार्वती को वर प्रदान किया. तभी हिमवान् वहां आ गये. उन्होने बेटी को घर चलने का आग्रह किया. पार्वती ने कहा कि वह घर तभी आऊंगी यदि आप मेरा विवाह महादेव से करेंगे. पिता ने बेटी के आग्रह को स्वीकार कर लिया. शिव बोले-हे पार्वती! इस प्रकार आश्विन शुक्ल तृतीया के व्रत के करने से तुमने अक्षय फल को प्राप्त किया. आश्विन शुक्ल तृतीया का नाम इसलिये पड़ा चूंकि उस जन्म में तुम्हारा हरण सखी ने मुझे पाने के लिये किया और तुमने सघन वन में जाकर गुफा में घोर तप किया.अत: इस शुक्ल तृतीया का नाम हरितालिका पड़ा।

उपरोक्त पौराणिक घटना के फलस्वरूप हरितालिका का यह अभीष्ट फल प्राप्ति का व्रत सर्वत्र प्रचलित हुआ. हरितालिका पर्व पर्व पर मनाये जाने वाले इस पर्व को सुकेत में चिड़त्री के नाम से पारम्परिक रूप से मनाने की परम्परा रही है. इस दिन सुकेत में प्रात: उठकर सुहागिन महिलायें, कन्याएं व पुरूष स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय से पूर्व घर के अग्रभाग में आंगन में प्रतिष्ठित मांदला या चौकी को लाल रंग परानण से आलेपित कर उस पर देवदार के परागकण ‘पठावा’ से सुन्दर ज्यामित्कीय रेखाएं अंकित की जाती हैं. देहरी के बाहर तीन सांप मकोल की सफेद मूर्तियों के साथ प्रदर्शन वंश वृद्धि व संरक्षण किस प्रकार आम ल्घर के भीतर पूजा कक्ष में चौकोर मण्डप गोबर व( गोमूत्र से आलेपित कर पठावे से ज्यामितीय चित्र बनाकर सुसज्जित किया जाता है.मण्डप पर माह,धान व अपामार की एक एक पौध को मण्डप पर समूल प्रतिष्ठित किया जाता है. कुछ विशेष परिवारों में चिड़त्री पर कृष्णजन्माष्टमी के दिवस या एक सप्ताह पूर्व लाल मिट्टी से पक्षी,पशु व माता पार्वती व शिव की सुन्दर मूर्तियां बनाई जातीं हैं. दो-तीन दिन इन मूर्तियों को सूख जाने के बाद मकोल की सफेद मिट्टी से रंगा जाता है. तदोपरान्त मूर्तियों को अन्य रंगों से रंग कर आकर्षक व सजीव बनाया जाता है. चिड़त्री के दिन सुहागिनें धूप-दीप व द्रुवा से मांदला व देहरी पूजन कर पवित्र मण्डप पर इन मृदा मूर्तियों कों प्रतिष्ठित किया जाता है. मण्डप पर गणेश की मूर्ति को भी प्रतिष्ठित किया जाता है. किसी पवित्र स्थान पर एक सप्ताह पूर्व जौ को बीजा जाता है।

चिड़त्री पूजा के समय लोगों को जौ की बालियां आबंटित की जातीं हैं.अत: चिड़त्री के दिन उगी हुई जौ के मध्य सूखी टहनी को रंग कर उर्ध्वमुखी रखकर उसकी शाखाओं पर मृदा के तीन या पांच बन्दरों को ऊपर चढ़ते हुए दर्शाया जाता है. जिन परिवारों में चिड़त्री पर मृदा की मूर्तियां बनाने का विधान है वह पीढ़ियों से चला आ रहा है. यदि घर पर चिड़त्री पर परिजन का निधन हो जाए तो चिड़त्री पर मृदा मूर्तियों का पूजा विधान टूट जाता है. यदि अगामी समय में घर संयोग से चिड़त्री पर संतानोत्पति या गाय का प्रसव हो जाये तो इसे शुभ समय मानकर चिड़त्री का पारम्परिक विधान की प्रकिया पुन: प्रारम्भ की जाती है।

चिड़त्री के दिन जहां मृदा मूर्तियों को प्रतिष्ठित किया गया है, वहां गांव के सभी लोग रात्रि एकत्रित होकर भजन-कीर्तन करते हैं जैसे माता पार्वती ने शिव को पाने के लिये किया था. चिड़त्री के दिन महिलाएं उपवास रखती हैं और केवल सागूदाना में मीठा मिलाकर फलाहार कर चिड़त्री के अगामी दिवस अन्न ग्रहण करतीं हैं. चिड़त्री की पूजा को चतुर्थी के दिन वर्जित है. यदि चिड़त्री के दिन चतुर्थी आरम्भ हो जाये तो पूजा इससे पूर्व करने का विधान है. चिड़त्री पर रात्रि पर्यंत जागरण के बाद प्रात: पशु-पक्षियों की बनी मूर्तियों को बच्चों में आबंटित किया जाता है. बच्चे भी इन मूर्तियों को घरों में पवित्र स्थान पर रखते हैं. मण्डप पर रखी पूजा सामग्री का जल में विसर्जन किया जाता है. माह, जौ, अपामार्ग व धान की समूल पौध को बावड़ी या तालाब के किनारे रखा जाता है. हरितालिका तीज पर आयोजित चिड़त्री का सुकेत क्षेत्र में आयोदन के पीछे पैराणिक घटनायें जुड़ीं हैं. चिड़त्री पर आयोजित अनुष्ठान में जहां महिलायें अभीष्ट फल प्राप्ति का संकल्प धारण करतीं है वहीं इस पर्व पर प्रकृति व वन्य जीवों के प्रति सम्मान व स्नेह की परम्परा भी जुड़ी है।

✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली, कुमारसैन

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