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पांगणा के देहरी में दुर्गाष्टमी पर देव मिलन

सुकेत की आदि राजधानी पांगणा में शिशर नवरात्र की अष्टमी देहरी में अवस्थित कालकूट देवी को समर्पित है. हिमाचल के शक्तिस्थलों पर पूर्व में देवी के निमित भैसे की बलि का विधान था.परन्तु आज भैसे की बलि की परम्परा लगभग समाप्त है. पांगणा के पश्चिम में देहरी नामक स्थान पर कालकूट की देवी ने साईबेरिया की डुंगर जाति को नष्ट कर सेन वंशज वीरसेन को यहां का शासक बनाया. अष्टमी के दिन ही काली नें डुंगर जाति पर वज्रपात कर नष्ट किया था. यही देहरी में सैंकड़ों डुंगरों की अंत्येष्टि की गई थी.अत: देवी यहां देहरी में श्मशानवासिनी है.इन्हीं की स्मृति में शिशर नवरात्र की अष्टमी को पूर्व में देवी को भैसे की बलि देने की परम्परा रही है।

देहरी में पूर्व में सप्तमी को को भेढ़ परम्परा थी. मनौति पूर्ण होने पर लोग सप्तमी को देहरी देवी के मंदिर ले आते थे. सप्तमी को सात लगते खेत में भैसों की लड़ाई आयोजित होती थी. विजेता भैसे को पुरस्कृत किया जाता था.रात्रि को अनिष्टकारी शक्तियों के शमन के लिये भैसों को पूरे गांव के चहुंओर ले जाकर दिग्बंधन किया जाता था।

अष्टमी के दिन महामाया पांगणा श्रृंगारित होकर देहरी पहुंचती है जहां महामाया की छोटी बहन देवी छण्डियारा से उनका मिलन होता है. पूर्व में चिण्डी के समीप भलैर गांव केे व्यक्ति विषेष रूप में आमंत्रित होते हैं. इन्ही में देव की शक्ति का आह्वान कर आवेशित किया जाता है.आवेशित व्यक्ति के अचेतन होने पर उसकी गांव में परिक्रमा की जाती है.परन्त आज भलैहर के व्यक्ति में दैवीय शक्ति का आह्वान तो किया जाता है.परन्तु देवी की अनुकम्पा नहीं होती है. वास्तवमें अष्टमी के फेर के माध्यम से गांव का दिग्बंधन कर अरिष्टकारी शक्तियों का शमन किया जाता है।

आज के बदलते परिदृश्य में महिष भैसे की बलि का प्रचलन कुछ चिंतनशील लोगों की पहल के कारण बन्द हो गया है. यह समय की मांग भी है कि ऐसी धार्मिक परम्पराएं जनमें भौतिक सुख की कामना के लिये किसी निरीह जीव की बलि की परम्परा हो उसे प्रतिबन्धित किया जाना उचित है. हालांकि ऋग्वैदिक काल में नरमेधी यज्ञ, अश्वमेधी यज्ञ, अजमेधी यज्ञ व गोमेधी यज्ञ का उल्लेख मिलता है. शिशिर नवरात्रि की अष्टमी को महिषासुर मर्दिनी के वध के कारण महिष की बलि का विधान हिमालयी संस्कृति में प्रचलित है. इस बार अष्टमी के दिन महामाया के मुख्य विग्रह रथारूढ़ होकर श्रृंगारित होता है. छण्डियारा से देवी रथारूढ़ होकर पांगणा पहुंचती है. दोनों बहनों का वाद्य यंत्रों की सुमधुर धुन पर दिव्य मिलन होता है. अपराह्न देवगणों की आवेशित अवस्था में दोनों रथ जुलूस के साथ देहरी की ओर प्रस्थान करते हैं. दोनों देवियों ने देहरी में देहरी की देवी से दिव्य मिलन किया. तीनों देवियों के मिलन के बाद निश्चित स्थान पर कुष्माण्ड व नारियल की नैमितिक बलि दी गई. कुष्माण्ड के चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में प्रक्षेपित कर क्षेत्र का अनिष्टकारी शक्तियों से अभिरक्षण किया गया. तदोपरान्त नारियल की बलि देकर दसों दिशाओं में जल छिड़ककर सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया।

पूर्व में भैसे की बलि की प्रथा का निर्वहन इसी स्थान पर किया जाता था. बलि के लिये अर्पित महिष को विशेष परिवार के व्यक्ति द्वारा काली को अर्पित किया जाता था. यदि भैसा जीवित बच कर पांगणा सरिता को पार कर जाता तो उसे मारा नहीं जाता था.बल्कि उसे उन्मुक्त कर दिया जाता था।

परन्तु बदलते परिवेश में भैसे की बलि के विकल्प के रूप में कुष्माण्ड व नारियल की बलि देकर देवी को प्रसन्न किया जाता है।सुकेत संस्कृति साहित्य और जन-कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाॅक्टर हिमेंद्र बाली “हिम” का कहना है कि वास्तव में इष्ट देव के प्रति अटूट श्रद्धा ही सभी सुफल प्रदायी है. सम्भवत: इसलिये समय के साथ बलि के स्थान पर नैमितिक बलि का प्रचलन सुखद घटना है.परन्तु दुखद यह है कि नवरात्र की अष्टमी से जुड़ी सौम्य परम्पराएं भी अब धूमिल हो चलीं हैं.यहीं शिष्ट व नम्र परम्पराएं सनातन संस्कृति की नींव है.पूर्व में पांगणा के देहरी में अष्टमी (आठी) पर्वदो दिन तक चलता है.दूरस्थ क्षेत्रों के लोग आकर शाक्त परम्परा के इस पर्व का हिस्सा बनते थे.परन्तु आज आठी के मेले की परम्परा कुछ घण्टों तक सिमटकर रह गई है. बहरहाल नवरात्रि का अष्टमी दिवस देवी को अर्पित है जो अनिष्टकारी शक्तियों से भक्तों का रक्षण करतीं हैं।

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