यावन्न संस्कृतयुवान् प्रगतिं विधातुं
चेत्त्वं सहायकरणे रमसे कदापि।
नो योग्यतां दमयितुं च तथेह तेषां
ईर्ष्यां च न त्यजसि संस्कृतवृद्धिरेव।।
जब तक संस्कृत भाषाविद युवाओं को आगे बढ़ने में सहयोग नहीं करेंगे। उनकी योग्यता को दबाने का प्रयास नहीं करेंगे। परस्पर ईर्ष्या करना नहीं छोड़ेंगे। झण्डा ऊँचा रहे हमारा इस भाव में संशोधन नहीं करेंगे तावत् संस्कृत की विकास-यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती।
The progress of Sanskrit studies cannot happen as long as you do not rejoice in helping the young scholars to make progress, stop from suppressing the qualified scholars, and stop your jealousy for them.
वत्स-देशराज-शर्मा
संस्थापकाध्यक्षो वैदिकगणभारतम्