अनंत बार हम ऐसा सत्य जीवन में शब्दों में पिरो देते हैं जो हमारे ही जीवन को परिभाषित कर जाता है,
इस जिसमें दा क्या निसचा
झूठा इसदा साथ
इन्हां स्वासां रा क्या भरोसा
एह भी नी दिंदे साथ
यह पंक्तियाँ दिवंगत साहित्यकार देवराज संसालवी जी की कविता से उद्धृत हैं और भारतीय आध्यात्मिक दर्शन का सार हैं, देवराज संसालवी को साहित्य जगत में किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। मूलतः बैजनाथ उप मण्डल, जिला कांगड़ा के संसाल गाँव से सम्बंधित, देवराज संसालवी अपनी जन्मभूमि को अपनी पहचान के रूप में जीवन भर अपने नाम से संलग्न कर जीवित रहे बाद में शिमला, हिमाचल प्रदेश के पंथाघाटी नामक स्थान पर आवास निर्माण कर वहीं अवस्थित हो गये। गत दिनों अचानक उनके सीने में दर्द उठा और अस्पताल जाते समय रास्ते में ही उन्होंने प्राण त्याग दिये, साहित्य जगत एक दम सदमे का अनुभव कर रहा है।
देवराज संसालवी अनेक वर्षों तक हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी में अधीक्षक के पद पर सेवारत रहे। सबसे उनका मधुर और विनम्र व्यवहार था और किसी को कोई शिकायत का कोई अवसर वो नहीं देते थे। साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी और हिंदी, पहाड़ी दोनों भाषाओं पर अधिकार था। बहुभाषी संगोष्ठियों में वह हिंदी एवं पहाड़ी में कविता पाठ से मन मोह लेते थे।
उनके दो कविता संग्रह “असां दा हिमाचल” और “छोड़िए सुरा” प्रकाशित हो चुके हैं, इसके अतिरिक्त लोक गाथाएं, कविताएँ व लोक नाट्य भी प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने हिमाचल के सौंदर्य को उकेरती रचनाएँ, सामाजिक विसंगतियों, पर्यावरण, कन्या भ्रूण हत्या, कन्याओं के लालन पालन, नशाखोरी आदि पर भी रचनाएँ लिखी जो अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी पर भी इनके अनेक कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता था जिसे गाँव में लोग बडी़ उत्सुकता से सुनते थे।
उनकी हिंदी और पहाड़ी में दो – दो रचनाएँ अवलोकन के लिए यहाँ प्रस्तुत हैं जिनका बांकपन देखते ही बनता है |
दिले रा रोग वधाणा कैहजो
नोआं मित्तर बनाणा कैहजो
जे सोची ने कम नीं करना
फिरी पिछें पछताणा कैहजो
देव कुसी रा होई गिया तां
दूजा लारे लाणा कैहजो
प्यार करी ने सुख नी मिलदा
मानें मनें पछताणा कैहजो
प्यार करी ने भौरा मोया
बाण खाई ने हिरण बी रोया
चंद्रमें री मीत चकोरी
दीये कन्ने पतंग फकोया
फिरी प्यार प्यार ग्लाणा कैहजो
दिल अपणा दुखाणा कैहजो
जे भुल्ली प्यार होई गया ता
अपना आप बचाणा कैहजो
बणा तुहें वी सच्चे प्रेमी
नकली रूप दिखाणा कैहजो
फुलमुं रांझू लैला मजनूं
हीर रांझा रा ग्लाणा कैहजो
पर प्यार करी ने सुख नी मिलदा
देव ने झूठ ग्लाणा कैहजो ।।
2.
तुम्हें देखूँ या तुम्हारे बागवान को
देख कर उसे दुआ दूं उसे कि वह
तुम्हारी तरह ही हजारों पुष्प उगाएं
पालें और छोड़ दें वनों के उस पार
जहाँ बहार खुमार उधार और
इंतज़ार है मुझे तेरे खूबसूरत
हसीन पुष्प का बहुत देर बहुत बार
निहारता ही रहता हूँ अक्सर मैं
चाहने वालों की भीड़ रफा दफा होने तक
बड़े शहर से अधिक परेशान है छोटा शहर
और हाई वे का किनारा ट्रैफिक प्रदूषण
ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण से मानव गण
पशुधन और जीवित प्राणी जो होते थे
वर्षों से शांतमय और शांत जीवन प्रेमी
उन्हीं की दुनियाँ में है अधिक हलचल
बड़े से छोटे शहर को किनारा मिला है
हां कुछ सहारा भी मिला है बसें कारें
इसी सहारे ने तो निकम्मा कर दिया है
छः शब्द क्या क्यों कहाँ कैसे किधर कब
थे यह सच्चे व सभी निर्भर मुझको सिखाया
अब सैंकड़ों दर्द यहाँ मिलते हैं
काम के लोग भी कम मिलते हैं
जब मुसीबत का वक्त आता है
सभी के द्वार तब बंद मिलते हैं ।।
3. संभालो
आना पास मत अपने
नहीं तो जलते जाओगे
हुए हैं राख कबसे हम
नहीं बच तुम भी पाओगे
जल कर मर गए लाखों
करोड़ों जल रहे बाकी
रंजिशों से भरे जो दिल
उन्हें पहले हटा लेना
कसम है ऐ खुदा तेरी
मैं उनको माफ कर दूंगा
किए थे घात जिसने भी
उन्हें तुम खुद समझ लेना
उन्होंने खोज तक न की
उधर ही झांकते थे हम
उन्हें तू ही बख्श देना
जो हमको खाक कर बैठे
कमी कोई न थी अपनी
यही कुछ उनसे चाहते थे
उसी के वास्ते हम पर
वह गोली भी चलाते थे
संभालो तुम ही अब उनको
नहीं वह लौट कर आयें
किया हम संग भी जैसा ही
उन्हीं के पेश वह आयें ।।
4. अपना कुछ नी
कोई ग्लांदा मैं ही सबकुछ
कोई गलांदा मैं खुदा
मैं गलांदा मैं है ही क्या
मिंजो ते ता सबकुछ जुदा
इस जिसमें दा क्या निसचा
झूठा इसदा साथ
इनहां स्वासां रा क्या भरोसा
एह भी नी दिंदे साथ
झूठी जवानी रूप भी नकली
नकली है संसार
कजो गरूर करना इत्थू
नी ए जीने दा भी हकदार
वकते पर तां रिश्तेदार भी
हाख नी मिलांदे
खाने पीने को कुछ नी मिले
ता मित्तर भी नठदे जांदे
मतलबी एह दुनियां सारी
मतलब लेंदे निकाली
जाहलु तिन्हारा कम होई जांदा
ता दिंदे पिछे ते गाली
इन्हां गल्लां जो सोची सोची करि
दिल दुःखी होई जांदा
ओ देव क्या लैना इसा दुनियां ते
एह दुनियां है मोहमाया रा धंधा
कोई गलांदा मैं ही सबकुछ
कोई गलांदा मैं खुदा
मैं गलांदा मैं है ही क्या
मिंजो ते ता सबकुछ जुदा ।।
देवराज संसालवी जी के परलोक गमन से हिमाचल के साहित्य जगत में जो शून्य पैदा हुआ है वह सदैव स्मृतियों को झकझोरता रहेगा। देवराज संसालवी के आकस्मिक देहांत से पहाड़ी साहित्य एक लोकप्रिय कवि से वंचित हो गया है जिसकी कमी हमेशा खलती रहेगी। बहुभाषी कवि सम्मेलनों में पहाड़ी की रवानगी और सुंदर प्रस्तुति के लिए देवराज संसालवी को हमेशा याद किया जाता रहेगा। हम प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें अपने लोक में स्थान दें और उनकी आत्मा को परमात्मा में लीन करें, विनम्र श्रद्धांजलि।
– हितेन्द्र शर्मा
कुमारसैन, जिला शिमला,
हि.प्र. पिन-172024