आबकारी कमिश्नर एन सी बैकटा ने डॉ. हिमेन्द्र बाली के मण्डी पर शोधात्मक कार्य को सराहा
आबकारी विभाग में कमीश्नर रहे एन सी बैकटा ने डॉ. हिमेन्द्र बाली “हिम”की मण्डी जिले पर आधारित शोधपूर्ण पुस्तक “हिमालय गरिमा : मण्डी का सांस्कृतिक वैभव” पुस्तक में किये गये श्रमसाध्य कार्य को सराहा। डॉ. हिमेन्द्र बाली “हिम”की मण्डी जिले पर आधारित इस पुस्तक में इनके पीएचडी शोध प्रबंध (2004)पर किये गये कार्य को परिवर्द्धित रूप में प्रकाशित किया गया है। पुस्तक में प्राक्वैदिक,वैदिक, पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भों के साथ -साथ लेखक ने लोक साहित्य व लोकमान्यताओं को आधार बनाकर यहां की नदियों, सरिताओं, पर्वतों,कन्दराओं, सरोवरों व स्थान विशेष के महत्व को दर्शाया है। सुकेत व मण्डी का वैदिक व महाभारतकालीन नाम पर पुस्तक में विस्तृत व प्रमाणिक जानकारी को पाठको को सुलभ किया गया है।सुकेत का पौराणिक व महाभारतकालीन नाम सुकुट् था जहां द्वैपायन व्यास पुत्र शुकदेव की तपोभूमि थी।सुकेत का नामकरण मुनि शुकदेव के तपोस्थल से सुख क्षेत्र से सुकेत पड़ने का भाषाविज्ञान सम्मत उल्लेख रोचक तथ्यों के साथ पुस्तक में किया गया है। सुकेत से उद्भूत मण्डी का प्राचीन नाम माडव्य नगर था।पुस्तक में पौराणिक व महाभारतकालीन संदर्भों के माध्यम से यह प्रमाणित किया गया है कि कैसे माडव्य ऋषि का सम्बन्ध वेद व्यास से रहा और कैसे अणि माडव्य ने धर्मराज को यह नीति की शिक्षा दी कि बचपन मेंअनजाने में किया गया पाप प्रायश्चित की श्रेणी में नहीं आता। आज भी मण्डी शहर के समीप व्यास नदी में माडव्य ऋषि की तप शिलाखण्ड को देखा जा सकता है।पुस्तक में ऋग्वैदिक नदी आर्जीकिया अर्थात् व्यास के अनेकानेक साक्ष्यों को पुस्तक में उद्धृत कर इसे संग्रहणीय बनाया गया है।मण्डी के राजनैतिक इतिहास की पृष्ठभूमि को लेखक, इतिहाकार,शिक्षाविद और सुकेत संस्कृति साहित्य एवम् जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉ. हिमेन्द्र बाली ने संदर्भों सहित उद्घाटित किया है।सुकेत की नींव 765 ई. में सेन वंशज वीरसेन ने स्थानीय ठाकुरों को पराजित कर पांगणा में रखी।पुस्तक में अद्यतन अन्वेषण के आधार पर उन स्थानीय घटनाओं को भी स्थान दिया गया है जिनका पूर्ववर्ती पुस्तक में कहीं उल्लेख नहीं है. फरवरी 1948 में हिमाचल की रियासतों को भारत संघ में विलय के लिये चलाये गये पहले सत्याग्रह का नई घटनाओं के उद्धरण के साथ वर्णन सचमुच पाठकों को शोधार्थियों के लिये य पुस्तक असीमित सूचनाओं से भरपूर हैसुकेत व मण्डी के समाज,जाति समूह,रहन सहन,वेशभूषा,खानपान, विश्वास व बोली पर विशद व प्रमाणिक जानकारी संग्रहणीय है।यहां के पहरावे पर परिवर्तन,खानपान की पारम्परिक व्यवस्था व जातियों का यहां स्थापित होने की तथ्यपूर्ण जानकारी पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिये पर्याप्त है।यहां के धर्म व संस्कृति के अनेक अनछुए पहलुओं को पुस्तक में समाविष्ट किया गया हैनाग,शैव,शाक्त,सिद्ध-नाथ,वैष्णव व बौद्ध मत के यहां प्रसार एवम् लोकप्रियता को प्रमाण सहित व्याख्यायित किया गया है। यहां मुख्यत: नागों को प्राक् ऐतिहासिक काल से प्रभुत्व रहा है। कालान्तर में शिव महादेव रूप में यहां धार्मिक सत्ता के शीर्ष पर विराजित हुए यां देखा जा सकता है। पांगणा के अम्बरनाथ मंदिर से भीम व हिडिम्बा का परिणय संस्कार का जुड़ाव,करसोग के ममेल में ममलेश्वर महादेव की भृगु ऋषि, भार्गव परशुराम व पाण्डवों द्वारा स्तवन सुकेत-मण्डी की प्रचीनता का परिचायक है।पाण्डवों का पांगणा में प्रवास कर स्थान का नाम “पांगवागण” हो जाना रोचक प्रसंग है।सप्तर्षियों में एक ऋचीक पुत्र जमदग्नि का सनातन संस्कृति का हिमालयी क्षेत्र में विस्तार के लिये सुकेत के तत्तापानी में आश्रम स्थापित करना क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व का परिचायक है। पुस्तक में नाग शिरोमणि कमरूनाग, माहूंनाग, गीहनाग, चवासीनाग व पोखी नाग आदि महाभारत के विख्यात योद्धाओं से नाग रूप में अवतरित होने की रोचक जानकारी यहां के इतिहास की प्रतिष्ठा को गौरवान्तित करती है. सुकेत-मण्डी के प्रख्यात शक्तिस्थल कामाक्षा देवी, महामाया पांगणा, श्यामा काली,मुरारी देवी व चिण्डी देवी आदि का विशद निरूपण पुस्तक में किया गया है।सुकेत-मण्डी के अर्द्ध देव गण- जल देव यक्षिणी,वताल,राक्षस मशाण व वीरों का सविस्तार वर्णन पुस्तक में किया गया है।पुस्तक में मंदिर व भवन शैली का वर्णन कर यहां की स्थानीय व विदेशी शैली की विशेषताओं को निर्माण के काल खण्ड का भी आकलन किया गया है।सुकेत-मण्डी में खश शैली, पैगोडा शैली,शिखर शैली, मुगल शैली व सतलुज शिखर शैली के मंदिरों के वास्तुशिल्प को पुस्तक में संदर्भों सहित विश्लेषित किया गया है। डॉ. हिमेन्द्र बाली ने मण्डी के पंचवक्त्र मंदिर, त्रिलोकीनाथ मंदिर, अर्धनारीश्वर मंदिर, करसोग के ममलेश्वर महादेव मदिर, छतरी के मगरू महादेव मंदिर, तेबन के तेबनी महादेव मंदिर, काओ के कामाक्षा मंदिर व पांगणा के महामाया मंदिर की उत्कृष्ट शैलियों का सांगोपांग वर्णन पुस्तक में कर इसे रोचक व ग्राह्य बनाया है।पुस्तक में सुकेती व मण्डियाली बोलियों में उपलब्ध लोक साहित्य पर पूरा अध्याय समर्पित है।दोनों ही बोलियों में प्रचलित लोकगीत, लोकगाथाएं,लोककथाएं,कहावतें, पहेलियां व मुहावरें आज भी यहां के सामाजिक जीवन के चिंतन के परिचायक हैं। बांठड़ा लोक नाट्य, माला नृत्य नाटी व लुड्डी आदि लोकानुरंजनात्मक विधाओं के स्वरूप को पुस्तक में सुन्दर ढंग से निरूपित किया गया है।पुस्तक के हर अध्याय [के अंत में संदर्भ गन्थों का उद्धरण पाठकों को सूचना स्रोत के विषय में जानकारी कराता है। पुस्तक के अंत में विशाल ग्रंथसूची से पुस्तक की गरिमा का परिचय मिलता है।समग्रत: मण्डी के इतिहास, संस्कृति, भूगोल व साहित्य पर आधारित यह पुस्तक शोधार्थियों,संस्कृति-इतिहास अनुरागी,जिज्ञासुओं व यायावरों को बहुपयोगी सिद्ध होगी। ऐन सी वैकटा ने कहा कि डॉ. बाली का मण्डी के इतिहास व संस्कृति पर किया गया यह कार्य प्रशंसनीय है. ऐसी पुस्तकें हमें अपने इतिहास,संस्कृति व समाज के मौलिक स्वरूप का बोध कराती है। इतिहास, संस्कृति व समृद्ध परंपराओ के ज्ञान से भरपूर यह पुस्तक साहित्यकार, इतिहासकार, शिक्षाविद डाॅक्टर हिमेंद्र बाली की ओर से सुकेत संस्कृति साहित्य और जन-कल्याण मंच पांगणा के संयोजक डाॅक्टर जगदीश शर्मा ने एन सी बैकटा को भेट की।इस अवसर पर कान्ता बैकटा,अधिवक्ता शौर्य बैकटा, आशा शर्मा और ज्योति शर्मा उपस्थित थी।