या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
नवरात्रि महोत्सव का महत्व
भारत में शक्ति का महत्व आदिकाल से ही माना गया है। चाहे धर्म हो, अर्थ हो, काम हो और चाहे मोक्ष हो, इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति शक्ति के बिना संभव नहीं। शक्तिहीन पुरुष या राष्ट्र अपनी न अपने सम्मान की रक्षा कर सकता है और न कोई उन्नति कर सकता है। कमजोरी के क्षणों में ही मनुष्य संयम खोता है, पाप करता है और असफल होकर संताप करता है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार जिस समय मनुष्य में बल होता है तभी वह कर्म करता है, द्रष्टा और श्रोता होता है। बल से पृथ्वी, अंतरिक्ष, आकाश, पर्वत, देव और मनुष्य संचालित होते हैं। सौ विज्ञानवानों को एक बलवान कंपायमान कर देता है। इसलिए तुम बल की उपासना करो। एक अन्य उपनिषद के अनुसार बलहीन व प्रमादी व्यक्ति आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता।
पशुओं की भांति हमें भी कुछ शक्तियां स्वाभाविक रूप से प्राप्त हैं, परंतु मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक बल के बगैर उनसे अधिक लाभ नहीं होता। इसलिए व्यायाम द्वारा अध्ययन व मनन द्वारा बौद्धिक व मानसिक और ध्यान के जरिये दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मिक बल का विकास कर मनुष्य दुर्लभ लौकिक और अलौकिक उपलब्धियां प्राप्त करता है। यह शक्ति सत्व, राजस और तामस तीन प्रकार की होती है। सत्व से ज्ञान, भक्ति, साधना, राजस से निर्माण और कर्म और तामस शक्ति से विध्वंस होता है। इसलिए हमें तामस शक्ति की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। शक्ति का सकारात्मक प्रयोग ही अच्छा होता है। शक्ति की साधना सर्वप्रथम हम ऋग्वेद की एक ऋचा में पाते हैं जिसमें शक्ति की अधिष्ठात्री देवी कहती हैं कि यह समस्त संसार उन्हीं से उत्पन्न और संचालित है। देश में वर्ष में मुख्य रूप से दो नवरात्र शारदीय और वासंतिक दिनों में सभी शक्ति की ही उपासना करते हैं। भगवान राम ने भी युद्ध से पहले शक्ति की उपासना की थी। दुर्गासप्तशती के अनुसार देवता भी बार-बार शक्ति की ही शरण में जाते हैं। भारत भर में शक्ति के 51 पीठ हमें शक्ति की ही महत्ता की याद दिलाते हैं, परंतु एक दौर में हम शक्ति के महत्व को भूल गए थे, जिसके कारण हम अपना गौरव और ज्ञान-विज्ञान खोकर गुलाम हुए। हम सब मिलकर शक्ति की साधना करें, स्वयं और राष्ट्र को शक्तिशाली बनाएं।
हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों प्रकार के गुण व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है।
इन 9 दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है। नवरात्रि के समय, सर्वप्रथम मन की अशुद्धियों को दूर करने के लिये माँ दुर्गा का आह्वान किया जाता है। इस प्रकार, पहला कदम लालसा, द्वेष, दम्भ, लोभ आदि प्रवृत्तियों पर विजय पाना है। एक बार, जब हम नकारात्मक आदतों और प्रवृत्तियों को छोड़ देते हैं, तो अध्यात्मिक मार्ग पर अगला कदम अपने सकारात्मक गुणों को बढ़ाने व बलशाली बनाने का होता है। इसके पश्चात्, उत्कृष्ट मूल्यों एवं गुणों और समृद्धि को विकसित करने के लिये माँ लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। अपनी सभी नकारात्मक प्रवृत्तियों के त्याग कर लेने और सभी भौतिक व आध्यात्मिक संपन्नता की प्राप्ति के पश्चात्, आत्म के सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हेतु माँ सरस्वती का आह्वान किया जाता हैं।
ये नौ रातें बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनमें सूक्ष्म ऊर्जा भरी होती है और सूक्ष्म ऊर्जा का संवर्धन होता है। नवरात्रि में की जाने वाली सभी पूजाओं और रस्मों का उद्देश्य अप्रकट व अदृश्य ऊर्जा दैवीय शक्ति को प्रकट करना है; जिसकी कृपा से हम गुणातीत होकर सर्वोच्च, अविभाज्य, अदृश्य, निर्मल, अनंत चेतना की प्राप्ति कर सकते हैं। नवरात्रि की पारणा में पूर्णाहुति के दिन फिर विजयोत्सव मनाया जाता हैं क्योंकि हम तीनों गुणों के परे त्रिगुणातीत अवस्था में आ जाते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितनी भी आसुरी प्रवृत्तियां हैं उसका हनन करके विजय का उत्सव मनाया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी में जो मन फंसा रहता है उसमें से मन को हटा करके जीवन के जो उद्देश्य व आदर्श हैं उसको निखारने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है। एक तरह से समझना चाहिए कि इन दिनों में हम अपनी बैटरी को रिचार्ज कर लेते है। हर एक मनुष्य जीवनभर या वर्षभर में जो भी काम करते-करते थक जाते हैं तो इससे मुक्त होने के लिए इन 9 दिनों में शरीर की शुद्धि, मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए इस तरह का शुद्धिकरण करने का, पवित्र होने का त्यौहार नवरात्रि है।
शक्ति पूजा का मूल
पौराणिक शक्ति-पूजा का मूलाधार वैदिक है, यह इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है। दुर्गा की अष्टभुजाएं, देवों द्वारा अपना-अपना तेज प्रदान करना, शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज जैसे राक्षसों का नाश करना ये सब कथानक-देवी शक्ति के विविध आयाम हैं। शक्ति की आराधना के लिए ही व्रत उपवास किए जाते हैं। हमारे शरीर के यंत्र को स्वस्थ एवं ऊर्जावान् रहने के लिए बीच बीच में ‘शोधन’ की ज़रूरत होती है। ‘उपवास’ की भूमिका यही है।
शक्ति उपासना का ग्रन्थ दुर्गासप्तशती
दुर्गा सप्तशती हिंदू धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। इसमें भगवती के कृपा के सुंदर इतिहास के साथ बड़े बड़े गूढ़ साधन रहस्य भरे हैं। कर्म भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मंदाकिनी प्रवाहित करने वाला यह ग्रंथ भक्तों के लिए वाञछाकल्पतरु हैं।
सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिति सहज ही प्राप्त करते हैं और निष्काम भक्त परम मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं। भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है, जिस प्रकार से वेद अनादि है, उसी प्रकार सप्तशती भी अनादि है। जिस प्रकार योग का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।
सप्तशती के 13 अध्यायों के प्रमुख मंत्र- दुर्गा सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तीन भागों प्रथम चरित्र (महाकाली) मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) तथा उत्तम चरित्र (महा सरस्वती) में विभाजित किया गया है।
प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुमुखी, भुवनेश्वरी, बाला, कुब्जा, द्वितीयचरित्र में लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरुंधती, सरस्वती तथा तृतीय चरित्र में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही तथा चामुंडा (शिवा) इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग इन तीन चरित्रों में दिए गए हैं।
नंदा, शाकंभरी, भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा, रक्तदंतिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है। तंत्र में शक्ति की तीन रूप प्रतिमाए यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं। शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है। सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तेरह अध्यायों में बांटा गया है प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरा, तीसरा व चौथा अध्याय तथा शेष सभी अध्याय उत्तम चरित्र में रखे गए हैं। प्रथम चरित्र में महाकाली का बीजाक्षर रूप ॐ ‘एं ’ है।
मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) का बीजाक्षर रूप ‘ह्रीं’तथा तीसरे उत्तम चरित्र महासरस्वती का बीजाक्षर रूप ‘क्लीं’ है। अन्य तांत्रिक साधनाओं में ‘ऐं’ मंत्र सरस्वती का, ‘ह्री़ ’महालक्ष्मी का तथा ‘क्लीं’ महाकाली का बीज है। तीनों बीजाक्षर ऐं ह्रीं क्लीं किसी भी तंत्र साधना हेतु आवश्यक तथा आधार माने गए हैं।
– आचार्य मनोज शैल
विविध पुराण प्रवक्ता