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साहित्य

जो बात शुरू हुई थी : गणेश गनी

गणेश गनी …एक ऐसा कवि लेखक और इंसान जो एक साथ बहुत सी बातों या कथाओं या अक्षर युद्ध के लिए जाना जाता है…..जैसे खूबसूरत कविता के लिए, कुल्लू के लिए, पांगी के लिए, घुमक्कड़ी के लिए, एक बेहतरीन स्कूल चलाने के लिए, दोस्ती के लिए, फेस बुक भिडंत के लिए, लेखकों के मान सम्मान के लिए, संपादन के लिए, नवोदित युवाओं को बहुत स्नेह से मंच देने के लिए और बेबाक टिप्पणियों के लिए। विश्व पुस्तक मेले में पहली किताब गनी जी की ही खरीदी थी, बिम्ब प्रतिबिंब प्रकाशन से…..थोड़ा समय निकाल कर। इससे पूर्व उनके दो कविता “संग्रह वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता” और “थोड़ा समय निकाल लेना” प्रकाशित और चर्चित हुए हैं। अपने संपादन, स्कूल और लेखन के साथ वे जो महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं वह साहित्य संवाद का काम है जिस पर भी दो पुस्तकें छप चुकी हैं। हिमाचल में गनी अकेले लेखक है जिन्होंने नवोदित, युवा और वरिष्ठ पीढ़ी के साथ एक साहित्य संवाद शुरू किया है। उनकी कविताओं पर लिखा ही नहीं, अपनी किताबों में स्थान भी दिया है। नवोदित और युवा कवियों के लिए उन्होंने एक ऐसी जमीन तैयार की है जिस पर वे अच्छा घर, मकान या आलीशान बंगलों निर्मित कर सकते हैं। गनी ने ढूंढ ढूंढ कर नवोदित कवियों को लाया है जिनकी अभी किताब तो दूर, पांच दस कविताएं ही हैं।उपरोक्त पुस्तक साहित्य संवाद की तीसरी पुस्तक है जिसमें मदन कश्यप, कुमार कृष्ण सहित विजय विशाल, निरंजन श्रोत्रिय, माया मृग, शिरीष कुमार मौर्य, गीता डोगरा, निर्मल असो, रोहित कौशिक, इंदु भारद्वाज, अरुण चंद्र राय, संजय शेफर्ड, कमलजीत चौधरी, नितेश मिश्र, नवनीत पांडेय, विक्रम गथानिया, रश्मि रवि, मिथिलेश कुमार राय और रवि शंकर सिंह की कविताओं पर डूब कर लिखा है। आलोचना, समीक्षा की सुंदर नई भाषा है, परंपरागत धरोही शब्दों से सराबोर जिसका प्रवाह कविता की बहती नदी जैसा है, प्रकृति के उठने जागने जैसा है…..पांगी जैसी सुदूर धारों से नदी घाटी कुल्लू जो बसे हैं…..कुल्लू आप पांगी से विश्व के सबसे खतरनाक दर्रा रोहतांग को लांघ कर ही आ सकते थे। अब तो अटल टनल है, रोहतांग को चुनौती देती, ब्यास और चंद्रभागा को न्यू इंडिया की परिभाषा समझाती…..प्रकृति से दो चार होती….। कभी ब्यास कुंड जाइएगा गनी के साथ…..एक विशाल नदी को आप कैसे अंजुरी में भर कर कई पल प्यार कर सकते हैं…..जैसे साल भर की बिटिया को आप गोद के पालने में झुला रहे हो।गणेश गनी जी को इस पुस्तक और निरंतर सक्रियता से “बहुत कुछ” करते रहने के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

✍️ एस. आर. हरनोट

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