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शास्त्री अध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया न बने उपहास भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में बिना अधिसूचना के किया गया बदलाव तर्क संगत नहीं – हिमाचल राजकीय संस्कृत शिक्षक परिषद्

हिमाचल राजकीय संस्कृत शिक्षक परिषद् ने जारी एक संयुक्त वक्तव्य में कहा है कि प्रदेश सरकार शिक्षा को आदर्श समाज निर्माण का मुख्य आधार मानकर कार्य कर रही है। जिसके फलस्वरूप वर्तमान में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए प्राथमिकता के आधार पर कार्य किया जा रहा है। इसके लिए हिमाचल राजकीय संस्कृत शिक्षक परिषद् आपकी कृतज्ञ हैं।

परिषद् के प्रदेशाध्यक्ष डॉ मनोज शैल प्रदेश महासचिव डॉ अमित शर्मा, वित्तसचिव सोहनलाल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ सुशील शर्मा, उपाध्यक्ष डॉ जंगछुब नेगी, रजनीश कुमार, राकेश कुमार, शांता कुमार, संगठन मंत्री ललित शर्मा, प्रवक्ता डॉ योगेश अत्रि, महिला संयोजिका अर्चना शर्मा, हमीरपुर के अध्यक्ष नरेश मलोटिया, सोलन के डॉ कमलकांत गौतम, कांगड़ा के डॉ अमनदीप शर्मा, ऊना के बलवीर चन्द, मण्डी के लोकपाल, सिरमौर के अध्यक्ष वेद पराशर, शिमला के अध्यक्ष संजय शर्मा, बिलासपुर के राजेन्द्र शर्मा, कुल्लू के हेमलाल, चम्बा के अमर सेन, लाहौल के सुरेश बोध, एवं किन्नौर के अध्यक्ष फुन्चोक नेगी ने संयुक्त वक्तव्य में कहा कि दिनांक 26.09.2023 को निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय हिमाचल प्रदेश के कार्यालय की पत्र संख्या NO. EDN-H(Ele-111)-01/2023-(C&V) Apptt/2023 के अनुसार सभी जिला उपनिदेशक प्रारंभिक शिक्षा को शास्त्री/टीजीटी संस्कृत अध्यापकों की नियुक्ति हेतु रिक्त पदों का विवरण एवं भर्ती प्रक्रिया करने हेतु निर्देशित किया था। अब दिनांक 11.10.2023 को इसी संदर्भ में निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय हिमाचल प्रदेश के कार्यालय की पत्र संख्या NO. EDN-H(Ele-111)-01/2023-(C&V) Apptt/2023 अनुसार केवल C&V वर्ग में शास्त्री अध्यापकों की भर्ती को लेकर पत्र जारी किया। जिसमें शास्त्री भर्ती हेतु वर्तमान में प्रचलित भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुसार भर्ती करने और उसके साथ NCTE के नियमों को भी साथ में संलग्न कर दिया है जो कि किसी भी प्रकार से तर्क संगत नहीं है। क्योंकि जब तक नये भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में संशोधन होकर राजपत्र में उन्हें प्रकाशित नहीं किया जाता तब तक नये नियम लागू नहीं होते। इन नियमों से वर्षों से नौकरी क इन्तजार कर रहे बेरोजगार शास्त्री वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है।

परिषद् के महासचिव डॉ अमित शर्मा ने कहा कि यह सार्थक है कि NCTE का गठन विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने हेतु अध्यापकों की नियुक्ति की पात्रता के मानक एवं मानदण्ड निर्धारण करने के लिये हुआ है । जिसका ध्येय वाक्य “गुरूर्गुरूतमोधाम:” है । इसी ध्येय वाक्य को ध्यान में रखते हुये शिक्षकों की पात्रता निर्धारित की गई है । जिसमें राज्य सरकारें यदि और उत्कृष्ट एवं गुणवत्ता युक्त संशोधन करना चाहे तो NCTE की अधिसूचना 12 नवम्बर 2014 भारत के राजपत्र में प्रकाशित दिनांक 16 दिसम्बर 2014 के अनुसार पृष्ठ संख्या 2 क्रम संख्या 5 हिन्दी में तथा पृष्ठ संख्या 6 Sr. No. 5 के अनुसार स्वीकृति से कर सकती हैं।

परिषद् के प्रदेशाध्यक्ष डॉ मनोज शैल ने कहा कि विद्यालयों में शास्त्री अध्यापक वर्तमान में RTE के अनुसार टी.जी.टी. संस्कृत की भर्ती हेतु केवल शास्त्री के साथ बी.एड/शिक्षा शास्त्री/डी.एल.एड. प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थी ही पात्र होने चाहिए। क्योंकि :-

1. NCTE के अनुसार भी प्रारम्भिक शिक्षा में भर्ती हेतु बी.ए./बी.एससी के साथ दो वर्षीय प्रशिक्षण ( जो किसी भी नाम से जाना जाता हो ) या (संलग्न)बी.एड. को अर्ह माना है । यहां पर बी.एससी (BSc) की जगह बी.एससी ही पात्र है वो भी मेडीकल में मेडीकल वाला और नॉन मेडीकल में नॉन मेडीकल वाला। दोनों पदों के लिये भर्ती भी पृथक्-पृथक होती है जिससे कि गणित व विज्ञान में उच्च गुणवत्ता बनी रहे। यह उचित भी है । वैसे ही शास्त्री भर्ती में भी स्नातक उपाधि (बी.ए.) शास्त्री ही मानी जाये । क्योंकि इसमें अभ्यर्थी पारम्परिक संस्कृत का विशेष अध्ययन करके आते हैं । इससे संस्कृत अध्यापन में गुणवत्ता बढ़ेगी‌।

2. NCTE के निर्देश में बी.ए. का मतलब संस्कृत के पारम्परिक विषयों में नियमित तीन वर्षीय स्नातक उपाधि समझी जाये । क्योंकि यू.जी.सी. के अनुसार शास्त्री उपाधि को बी.ए. के समकक्ष माना गया है ।

3. शास्त्री पद के लिए बी.ए.और एम.ए. संस्कृत का पात्र होना वैसा ही है जैसे बी.एससी. पद के लिए Art’s with मैथ पढ़ा (बी.एससी न किया हुआ) अभ्यर्थी। जिस प्रकार मात्र एक विषय गणित पढ़ा BA अभ्यर्थी (Arts with मैथ) तथा केवल M.A.(मैथ ) (Bsc न किया हुआ) विद्यार्थी टी.जी.टी.नॉन मेडीकल पद के लिए पात्र नहीं होता उसी प्रकार बी.ए. में एकमात्र संस्कृत विषय पढ़ा अभ्यर्थी शास्त्री पद का पात्र नहीं हो सकता। शास्त्री भर्ती हेतु बी.ए. केवल एक विषय संस्कृत पढ़े हुये के स्थान पर पारम्परिक रूप से शास्त्री उपाधि प्राप्त स्नातक ही क्यों पात्र हो। क्योंकि:-

★ पारंपरिक विषयों के पठन-पाठन हेतु राज्य सरकार ने संस्कृत महाविद्यालय खोले हैं, यदि शास्त्री पद हेतु अर्हता डिग्री महाविद्यालयों से सिद्ध हो जाती तो संस्कृत महाविद्यालयों को खोलने की आवश्यकता क्यों पढ़ती…? इन संस्कृत महाविद्यालयों को खोलने का श्रेय भी काङ्ग्रेस सरकार को ही प्राप्त है।

★ संस्कृत महाविद्यालयों में होने वाली शास्त्री डिग्री में विद्यार्थी लगभग 5 पारम्परिक विषयों (वेद, ज्योतिष, व्याकरण, दर्शन, साहित्य) के 20 पत्र पढ़ता है जबकि डिग्री महाविद्यालयों में बी ए में सामान्य संस्कृतसाहित्य के 1-2 विषय के मात्र 3 पत्र ही तीन वर्षों में पढ़ता है। दोनों की तुलना सम्भव नही।

★ हि प्र विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली शास्त्री की डिग्री बी कॉम., और बी.एससी. (मेडिकल, नॉन मेडिकल) की तरह एक विशिष्ट डिग्री है। इसमें छात्र विशेष विषयों को पढ़ता है। यथा:-बी. कॉम में -accountancy, business studies, maths आदि का अध्ययन होता है ।बी एस सी में -Maths, physics, chemistry, biology आदि का अध्ययन होता है ।इसी प्रकार शास्त्री में :- वेद, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, दर्शन आदि विषयों का अध्ययन होता है ।

★ बी.ए./एम.ए. संस्कृत अभ्यर्थी को मात्र इस आधार पर शास्त्री पद हेतु पात्र नही माना जा सकता कि उन्होंने स्नातक अथवा स्नातकोत्तर स्तर तक संस्कृत पढ़ी है क्योंकि यदि इस युक्ति को आधार माना जाये तो Msc(IT) को भी PGT IP पद हेतु पात्र माना जा सकता है, जबकि नियमो में MCA और बीटेक ही पात्र है। BA में एकमात्र गणित विषय पढ़ा अभ्यर्थी तथा केवल MA (मैथ )(B.sc न किया हुआ) अभ्यर्थी B.sc पद के लिए पात्र होना चाहिए। जबकि नियमों में ऐसा नही है। यदि.BA/MA (संस्कृत) के अभ्यर्थी पात्र होते हैं तो:-

■ भारत की अपनी एकमात्र मौलिकविद्या (वेद, वेदाङ्ग, शास्त्रपरम्परा) जिस पर समूचे विश्व मे नाज़ करता है,उसका ह्रास होगा। पारंपरिक शिक्षण संस्थान में पढ़ाये जाने वाले वेद, ज्योतिष, साहित्य, दर्शन जैसे विषय खत्म हो जाएंगे। क्योंकि डिग्री महाविद्यालयों में इनका पठन-पाठन नगण्य है।

■ आधारभूत संरचना व अन्य सुविधाओं में डिग्री महाविद्यालयों से पिछड़े संस्कृत महाविद्यालयों में छात्र संख्या कम होगी। शास्त्री पद हेतु अर्हता प्राप्त करने के लिए छात्र शास्त्री डिग्री की अपेक्षा बी.ए.डिग्री करना चाहेंगे, इसका प्रभाव संस्कृत महाविद्यालयों पर पड़ेगा। धीरे धीरे संस्कृत महाविद्यालय बंद होने की स्थिति में आ जायेंगे।सरकार से निवेदन एवं अपेक्षा

1. अतः हिमाचल राजकीय संस्कृत शिक्षक परिषद् का प्रदेश सरकार के माननीय मुख्यमंत्री जी एवं माननीय शिक्षा मंत्री जी से विनम्र निवेदन है कि जिस हिमाचल सरकार को पारम्परिक संस्कृत का संरक्षण करने का श्रेय प्राप्त है तथा संस्कृत को दूसरी राजभाषा बनाया गया है वहां शिक्षा विभाग में वर्तमान में शास्त्री पद हेतु जो नियम हैं उसमें उन नियमों को यथावत रख कर भर्ती प्रक्रिया करें ।

2. भविष्य में केवल उसमें शास्त्री अध्यापकों की भर्ती हेतु भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में शास्त्री उपाधि के साथ शिक्षा शास्त्री/बी.एड. अनिवार्य करने की कृपा करें तथा इस संदर्भ में शिक्षा की उच्च गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुये NCTE से प्रदेश के लिये बी.ए./स्नातक के स्थान पर शास्त्री उपाधि जो कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा स्नातक( बी.ए.) के समकक्ष है उसे अनिवार्य करवाने व टी.जी.टी.शास्त्री पदनाम दिलाने की कृपा करें ।

3. इसके साथ ऐसे शास्त्री अध्यापक जो बैच बाईज शास्त्री के पद पर नियुक्त होने के लिए वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें बैचवाइज नियुक्ति हेतु शास्त्री के बैच को ही आधार माना जाये। (जैसा कि भाषाध्यापकों को भी पूर्व में ऐसी छूट कुछ अवधि तक दी गई थी) क्योंकि कुछ पुराने शास्त्री बीएड/शिक्षाशास्त्री नहीं हैं और वर्तमान में बीएड/शिक्षाशास्त्री कर रहे हैं इसपर वो बैच आधार पर भी रोजगार से वंचित रह जायेंगे।

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