आकाश अर्थात शून्य,, अर्थात नहीं होना,,, ये नहीं होना ही होना है,, अगर शून्य न हो, स्पेस न हो, तो होने वाली वस्तु, या ख़्याल, या कल्पना,, या जो अस्तित्व में है नहीं हो सकता,, शून्य का भी अस्तित्व है,, कुछ भी नहीं है तो ही तो शून्य है,, इस शून्य में जो बिखरा हुआ है,, उसका भी अस्तित्व है,, होने वाली इकाई में ही दूसरी होने वाली इकाइयाँ हो सकती हैं,,
वायु भी एक ऐसा न होने वाली,, है वस्तु है,, वायु का लक्षण है गति, अर्थात गति जहाँ है वहाँ वायु है,, वायु के लिए शून्य और जिसका अस्तित्व है दोनों का अस्तित्व आवश्यक है,, वायु न शून्य है,, न केवल तत्व, वायु शून्य एवं किसी तत्व का गतिमान सम्मिश्रण है,, जब यह सम्मिश्रण स्थिर है, तो वायु वहाँ नहीं है,,
सरल अर्थ में समझने के लिए हम इसे शून्य अर्थात नहीं अर्थात नैगेटिव, और है अर्थात तत्व अर्थात पॉज़िटिव अर्थात अस्तित्व मान लेते हैं,, तो इसका अर्थ यह हुआ कि गति के लिए नैगेटिव और पॉज़िटिव दोनों का होना आवश्यक है,, यह नैगेटिव और पॉज़िटिव ही गति में कारण है,, और गति में होने के लिए जो कारण है वही वायु है,, अर्थात यह गति जहाँ भी है वहाँ वायु है,, वायु गैस का पर्यायवाची नहीं है, गति का पर्यायवाची है,, जो धकेलने वाली शक्ति है वह वायु है, जो स्थान परिवर्तन करवाती है वह वायु है,, और जिसका स्थान परिवर्तन होता है वह भी वायु है,, जिसे हम पवन या वायु कहते हैं वह स्थूल वायु है,, और जिस वायु के कारण यह स्मस्त सृष्टि गतिमान है सूक्ष्म वायु है,, यह सूक्ष्म वायु स्मस्त ग्रह नक्षत्रों निहारिकाओं ब्लैक होल्ज़ एवं जो भी गतिमान है, उनको नियन्त्रित करती है,, अर्थात वह सृष्टि का प्राण है, अर्थात, परमात्म है अर्थात जो है या जो नहीं है उस समष्टि को परमात्मा कहते हैं इसमें सूक्ष्म और महत दोनों शामिल हैं,, जो महत वायु है उसे हम पृथ्वी पर दबाव के रूप में बहता हुआ देख पाते हैं,, शरीर में सांस में मुख नाक से चलता हुआ , फुफ्फुसों में बहता हुआ अनुभव कर पाते हैं,, इसे ही प्राण वायु कहते हैं,, व्यान वायु, अपान वायु, समान वायु, उदान वायु भी, महत वायु ही है,, शरीर के जितने गतिमान कर्म हैं वह यह वायु ही करता है, चाहे वो शारीरिक अव्यव हों या इंट्रासैल्यूलर हों या एक्स्टासैल्यूलर हों , मन और आत्म की गति भी इसी वायु के कारण है,, विद्युत व शेष शक्तियां भी इसी वायु के कारण गतिमान हैं, जल थल अंतरिक्ष की सभी गतियाँ वायु के आधीन हैं,,
हमारी स्थूल दृष्टि या हमारी कर्मेंद्रियां या ज्ञानेंद्रियाँ, सूक्ष्म एवं स्थूल वायु में भेद नहीं कर पातीं,, और न इनमें कोई भेद है ही,, यह अवस्था भेद है और एक ही समय में यह सूक्ष्म वायु और स्थूल वायु के रूप में कार्य कर पाती है,,
वायु,, आकाश के बाद दूसरा पंचमहाभूत है,, और यह भी महान है ईश्वर रूप ही है।
✍️ डॉ. जयनारायण कश्यप
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