अधिकतर आपने देखा होगा विवाह संस्कार में वर को एक जोगी का रूप बनाकर उससे वही समारोह में उपस्थित लोगों में भिक्षाटन करवाया जाता है। हिमाचल के निम्नपर्वतीय क्षेत्रों में यह परम्परा अधिकांश देखी जाती है। दूल्हे को धौतवस्त्र पहनाकर, कुण्डल पहनाकर, हाथ में छोटी सी छड़ी देकर, और करमण्डल या भिक्षाटन के लिए हाथ में कोई पात्र देकर या धोती के पल्लू में ही भिक्षाटन करवाया जाता है। उसी विवाह समारोह में उपस्थित कुछ लोग जो वर के सगे–संबंधी ही होते हैं वे उसे कुछ दक्षिणा भिक्षा स्वरूप देते हैं। विवाह समारोह में ही वह गुरुदीक्षा भी प्राप्त करता है। भिक्षाटन कर उसे जो कुछ प्राप्त होता है वह उसे अपने गुरु के पास सौंप देता है। उस समय लोग उस रीति को एक मनोरंजन के रूप या किसी धार्मिक रीति के रूप में देखते हैं। वास्तव में उस समय वर को एक ब्रह्मचारी का रूप धारण करवाया जाता है जो अपने गुरु के पास शिक्षा ग्रहण हेतु जाता है। वह ब्रह्मचारी भिक्षा में जो कुछ भी प्राप्त करता है उसे गुरु को समर्पित कर देता है।
अब ध्यातव्य यह है कि विवाह संस्कार से ब्रह्मचर्य का क्या संबंध? जहां एक व्यक्ति गृहस्थ में प्रवेश कर रहा है उसे ब्रह्मचारी क्यों बनाया जा रहा है? शास्त्र विधान है कि जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के सोलह संस्कार होते हैं हालांकि अब कुछ ही संस्कार शेष रह गए हैं जो समाज में प्रचलित हैं और उन्हें भी पूर्ण विधि से संपादित नहीं किया जाता। इन्हीं सोलह संस्कारों में एक है “उपनयन संस्कार” । यह संस्कार “विद्यारम्भ” अर्थात्” वेदारम्भ” संस्कार से पहले किया जाता है। उपनयन संस्कार में जातक गुरुदीक्षा प्राप्त करता है। साधारण शब्दों में कहूं तो इस संस्कार में माता पिता अपने बच्चे के लिए योग्य गुरु को चुन कर शास्त्रोक्त विधि से उस गुरु के पास शिक्षा ग्रहण हेतु बालक को छोड़ देते हैं। इसके बाद बालक का “विद्यारम्भ संस्कार” होता है और वह विद्या ग्रहण करना प्रारंभ करता है। प्राचीन समय में जब ऋषि–गुरुकुल परंपरा थी। तब माता पिता अपने बालक को शिक्षा–ग्रहण करने योग्य समझ कर उसे गुरु के आश्रम में ले जाते थे। गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व सर्वप्रथम उसका उपनयन संस्कार किया जाता था। तदोपरांत उसका विद्यारम्भ या वेदारम्भ संस्कार किया जाता था। ब्रह्मचर्य अवस्था (25 वर्ष) को पूर्ण कर फिर उसका “विवाह संस्कार” अर्थात् “गृहस्थ प्रवेश संस्कार” होता था। वह गृहस्थ आश्रम में रहकर आगे का जीवन यापन करता था तदोपरांत उसके वानप्रस्थ और सन्यास आदि अन्य संस्कार होते हैं।
लेख लिखने का अभिप्राय मात्र इतना है कि “उपनयनसंस्कार” विद्यारम्भ संस्कार से पहले होता है संस्कारों का क्रम इस तरह है” उपनयनसंस्कार, विद्यारम्भसंस्कार, विवाहसंस्कार। अत: विवाह संस्कार में इस संस्कार को करना मात्र खानापूर्ति है। इस संस्कार को अल्पायु में विद्यारम्भ करने से पूर्व ही करवाना चाहिए। हिमाचल के उच्च पर्वतीय क्षेत्र के कुछ भागों में बालक का यह संस्कार अल्पायु में ही कर दिया जाता है।
लेखक — शिवकुमार शर्मा “शिवा” (संस्कृत–हिन्दी कवि, हिमाचल प्रदेश)