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Editorial/सम्पादकीय

लाल चंद प्रार्थी की चिंतन दृष्टि

✍️ डॉ कर्म सिंह
संपादक, हिमालयन डिजिटल मीडिया

श्री लालचंद प्रार्थी हिमाचल प्रदेश के एक ऐसे राजनेता, समाजसेवी और साहित्यकार हुए जिन्होंने हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए अपने रीति-रिवाजों को जन जन तक पहुंचाने के लिए सफल प्रयास किए। हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व वाली सरकार में लालचंद प्रार्थी भाषा संस्कृति और आयुर्वेद मंत्री रहे । वह स्वयं एक कलाकार और लेखक थे इसलिए कलाकारों और लेखकों के बीच में रहना, उनके साथ बतियाना और देर रात तक मुशायरों में अपनी गजलों, गीतों को सुनाना तथा अपने समकालीन कवियों की रचनाओं को सुनना, उन्हें बहुत पसंद रहा। एक समय में जब महिलाएं। के लिए घर से बाहर सार्वजनिक तौर पर नाच गान अच्छा नहीं माना जाता था, तब लाल चंद प्रार्थी ने सांस्कृतिक विरासत को लोकप्रिय बनाने के लिए महिलाओं को नृत्य नाटी गीत संगीत के लिए प्रेरित किया और इसकी शुरुआत उन्होंने अपने ही घर से की ।धीरे-धीरे नाचने गाने का यह चलन बढ़ता गया और वर्तमान में पूरे हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक लोक संगीत नृत्य गायन और वादन को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। विगत वर्षों में कुल्लू में नाटी के आयोजन का एक विश्व रिकॉर्ड भी कायम हुआ। वास्तव में प्रार्थी यह जानते थे कि लोक संगीत के माध्यम से हम अपने इतिहास, संस्कृति,धर्म, दर्शन रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था की जानकारी को जान सकते हैं। उसमें प्रचलित विसंगतियों को समझ कर उनका निराकरण कर सकते हैं और देश के अन्य भागों में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को पहचान दिला सकते हैं ।लाल चंद प्रार्थी ने वजूद ओ अदम पुस्तक लिख करके अपनी गजलों का संग्रह प्रकाशित करवाया। कुलूत देश की कहानी उनकी एक लोकप्रिय पुस्तक है जिसमें हिमालय क्षेत्र के इतिहास, परंपरा, लोकजीवन को प्रामाणिक रूप से दर्शाया गया है ।यह पुस्तक आज भी हिमालय क्षेत्र की संस्कृति, रीति-रिवाजों और इतिहास को जानने के लिए बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण है। लाल चंद प्रार्थी हिमालय को आदि संस्कृति का स्रोत मानते हैं।उनका मत है कि सृष्टि के प्रारंभ में भगवान मनु मनाली अपनी नाव द्वारा पहुंचे और यहीं से कालांतर में सृष्टि का विस्तार हुआ। मनाली क्षेत्र में आज भी इसके जीवंत प्रमाण देखने सुनने को मिलते हैं। कुल्लू जनपद में अनेक ऋषि-मुनियों को देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता है जो पौराणिक इतिहास में प्रसिद्ध रहे हैं और जिन्होंने अपनी अलौकिक शक्तियों और चमत्कारों से उस समय जनहित के अनेकों कार्य करते हुए स्वयं की प्रतिष्ठा को स्थापित किया। श्री रघुनाथ जी के आगमन से कुल्लू रामायणकालीन संस्कृति का संवाहक बना हुआ है। दशहरे की परंपरा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। लाल चंद प्रार्थी लाहौर से संस्कृत और आयुर्वेद पढ़ कर आए थे। हिमाचल प्रदेश सरकार में भी आयुर्वेद मंत्री रहे। उन्होंने अपने इस कार्यकाल में हिमालय क्षेत्र की औषधियों वनस्पतियों जड़ी बूटियों के संरक्षण पर बल दिया और प्रदेश में आयुर्वेद की परंपरा को बढ़ावा देने के भी सफल प्रयास किए गए । लालचंद प्रार्थी एक सफल राजनेता, समाज सुधारक, लेखक, कवि ,ग़ज़लकार और संस्कृतिप्रेमी व्यक्ति थे। उन की जयंती के अवसर पर प्रतिवर्ष हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी और भाषा संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से स्मरण किया जाता है। इस बार लालचंद प्रार्थी की चिंतन दृष्टि विषय पर हिमालयन डिजिटल मीडिया द्वारा भी ऑनलाइन लाइव कार्यक्रम का प्रसारण किया गया है। अमृत महोत्सव के अवसर पर हिमाचल प्रदेश की उस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण संवर्धन प्रकाशन और प्रचार-प्रसार को महत्व दिए जाने की आवश्यकता है जिसके लिए लाल चंद प्रार्थी ने सफल प्रयास किए।

✍️ डॉ कर्म सिंह

संपादक, हिमालयन डिजिटल मीडिया

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