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Editorial/सम्पादकीय

संक्रमण काल में प्रकृति से शिक्षा

✍️ हितेन्द्र शर्मा

प्रकृति हमें अनेक प्रकार से शिक्षा प्रदान करती है कभी पशु-पक्षियों के द्वारा, कभी औषधि, वनस्पतियों के माध्यम से, बात प्रकृति को समझने की है और उससे सीख लेने की है। हम देखते हैं कि हमारे आस-पड़ोस के परिवेश में, वनों में कुछ ऐसी बेलें होती हैं जो पहले तो किसी बड़े वृक्ष का सहारा पाकर उस पर धीरे-धीरे चढ़ जाती हैं फिर उस पेड़ पर पूरी तरह से फ़ैल कर उसे जकड़ लेती है। धीरे-धीरे पेड़ का अपना रंग रूप बदलने लगता है और कुछ समय बाद वह बेल ही दिखाई देने लगती है। एक समय ऐसा आता है जब उस वृक्ष का तना और मोटी शाखाएं उसके अपने रह जाते हैं बाकी टहनियों और पत्तों पर वह बेल पूरी तरह से अपनी मजबूत पकड़ बना लेती है। पेड़ का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है और उस पर पनप जाती है एक छोटी सी बेल। 

ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है छोटे-छोटे पौधों का जिसे जलकुंभी कहा जाता है जो पानी के बीच में कहीं भी तालाब, पोखर के किनारे उगता है। जलकुंभी एक ऐसा पौधा होता है जो पहले किसी तालाब, पोखर मे दिखाई देता है। फिर धीरे धीरे कुछ हफ्तों में तालाब के सब कोनों में एक-दो पौधे तैरते दिखाई देने लगते हैं, बड़े ही सुंदर दिखते है, फिर अचानक कुछ महीने या सालों में पानी दिखाई देना बंद हो जाता है… सारे तालाब के ऊपर सिर्फ हरा हरा ही दिखाई देता है। पानी की आक्सीजन खत्म होने लगती है…. अंदर का जीवन, मछलियां मरने लगती हैं, धीरे धीरे पानी सड़ने लगता है। सड़ांध किलोमीटर दूर से महसूस होनी शुरू हो जाती है और बाकी प्राणियों का जीवन मुश्किल होना शुरू हो जाता है। जिस-जस तलाब में ये जलकुंभी पहुंचती है, सब खत्म कर देती है।

इसका इलाज यही है कि अगर शुरू में ही एक दो पौधों को बाहर निकाल कर फेंक दिया जाए तो वो धूप से सूखकर नष्ट हो जाते हैं। अगर पूरा तालाब भर गया हो तो सारी जलकुंभी फैल जाती है। तालाब की मछलियां और अन्य जीव मर जाते हैं। जलकुंभी को समाप्त करने के लिए पहले उसको बाहर निकाल कर सुखाया जाता है और सूखने के बाद आग लगा कर उसका बीज तक नाश कर दिया जाता है ताकि दुबारा ना पनप सके। संभव है आपके घर के पास के तालाब में एक दो पौधे दिखाई दें। शुरू में आपको ये सुंदर दिखाई देंगे… लेकिन अगर आप अभी इलाज नहीं करेंगे तो धीरे धीरे ये पूरे तालाब पर कब्जा कर लेंगे। फिर तालाब के बाकी जीवों के पास दो में से एक रास्ता चुनने को बचता है या तो वो उनके हिसाब से जीयें या अपना अस्तित्व ही खत्म कर लें।

ऐसा ही कुछ समाज में भी घटता रहता है, कभी परिवार में, कभी समाज में, कभी राष्ट्र में, कभी पूरे विश्व में, ऐसा देखने में आता है कि कोई एक समुदाय कभी अपने विचार के बल पर, कभी तलवार के बल पर, किसी दूसरे समुदाय के बीच में घुसकर धीरे-धीरे अपना संख्या बल बढ़ा करके अपनी जड़ें जमा लेता है और उस समाज एवं राष्ट्र को अपने जाल में फंसा लेता है। फिर एक समय ऐसा आता है की पेड़ की तरह देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है और बेल तथा जलकुंभी की तरह वह संप्रदाय अपना असली रंग दिखाने लगता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और मजबूरन पेड़ को मात्र जिंदा रहने के लिए धरती में बने रहना होता है। उसकी जड़ें अपनी होती हैं लेकिन उसका जीवन, उसका आकार और उसका स्वभाव सब कुछ बदल जाता है, पराधीनता को स्वीकार कर लेता है। क्योंकि अब वह पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर चुका होता है।

वर्तमान में राष्ट्रीय परिदृश्य में कुछ सामाजिक एवं अराजक तत्व जलकुंभी की तरह धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ाते जा रहे हैं और उसका दुष्प्रभाव समाज एवं राष्ट्र में भी देखने को मिलने लगा है अगर समय रहते इस को रोका नहीं गया तो एक दिन जलकुंभी की तरह सारा तालाब प्रदूषित हो जाएगा। उसमें जीवन पाने वाले प्राणियों का जीवन नष्ट हो जाएगा और उस तालाब का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए सत्य सनातन सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने तथा उसके प्रति आस्था और श्रद्धा मजबूत करने का यह संक्रमण काल है ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन चिंतन दृष्टि को बनाए रखा जा सके।

✍️ हितेन्द्र शर्मा, 

कुमारसैन, जिला शिमला, हि.प्र.

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