अब भाषा का व्याकरण एवं स्वयं भाषा राजनीति की शिकार हो रही है, राजनैतिक वैय्याकरणी उभर रहे हैं, यद्यपि विशुद्धता स्वर्णिम है, तथापि विशुद्धता सदैव ठहराव पैदा करती है , जो उसकी मृत्यु का कारण हो जाती है, भाषा में नयापन विकास है, नये शब्दों के बिना भाषा में आकर्षण समाप्त हो जाता है,, आजकल शब्दों को भी विरल किया जा रहा है,, यह शब्द संस्कृत से है तो हिंदी में यह उर्दू शब्द के साथ नहीं प्रयोग हो सकता,, या यह शब्द उर्दू का है हिंदी के उर्दू के साथ आये शब्द के साथ प्रयोग नहीं हो सकता,, जबकि हिंदी तो स्वयं कोई अकेली संस्कृत की पुत्री नहीं है, न ही उर्दू केवल फारसी का पुत्र,, अंग्रेजी इसी कारण लगातार लोकप्रिय हुई और होगी कि वहाँ कोई राजनीति नहीं है, वहाँ हर विकास का स्वागत होता है, हर भाषा का लोकप्रिय शब्द बिना भेदभाव अपना लिया जाता है ,, यह फैसला हिंदी भाषियों को करना है कि वो जन जन की भाषा बनना चाहते हैं या हिंदी को मृत्यु की ओर ले जाना चाहते हैं,, स्वयं को मुख्यधारा से पृथक करना, नदी को सागर में ले जाने के स्थान पर कूहल में परिवर्तित करना है,, हमें भाषा की विशिष्टता बनाये रखने के साथ साथ उसके विकासक्रम को भी चलायमान रखना चाहिए,, भाषा में जितने अधिक शब्द होंगे लेखन व लेखक उतने ही समृद्ध होंगे,, वाणिज्य को वैश्विक बनाने के लिए केवल रुपये में व्यापार नहीं किया जा सकता,, प्रत्येक समृद्ध देश का सिक्का स्वीकारना पड़ता है,, इसे ही हाइब्रिडाईज़ेशन कहते हैं जो नयापन लाती है विकास करती है चाहे बात कृषि की हो विज्ञान की या कलाओं की।
विश्व इसलिए विकास कर रहा है कि नये प्रयोग हो रहे हैं, धारणाएँ टूट रही हैं और नयी सृष्टि हो रही है, कूपमण्डूक बने रहना स्वीकार हो तो अलग बात है,,
हिंदी के लेखकों साहित्यकारों में यह चिंता रहती है कि हम बिकते क्यों नहीं? हमारी पहुंच वैश्विक क्यों नहीं? जो सागर को पार करना पाप में शामिल करते रहे हों, अस्पृश्य घोषित किये जाते रहे हों ऐसी संस्कृति या उनकी भाषा वैश्विक कैसे हो सकती है,, किसी समय की लोकप्रिय भाषा संस्कृत विलुप्ति के कगार पर पहुँच गयी, अगर हिंदी को भी अस्पृश्य बना दिया गया तो वह भविष्य में विलुप्ति की ओर जायेगी इसमें कोई संदेह नहीं,, ईश्वर ऐसे भाषा विज्ञानियों को सद्बुद्धि दें।
✍️ डॉ. जयनारायण कश्यप
मकान नंबर 120, रौड़ा सैक्टर 2, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश