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Editorial/सम्पादकीय News

…और मानसी शिव के मानस में समा गई

✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य

आज सावन का अंतिम सोमवार था इस मौके पर समरहिल के शिव मंदिर में सोमवार की पूजा और विशेष रुद्राभिषेक में शामिल होकर भक्ति में लीन रहना मानसी को बहुत प्रिय था। आज मानसी के मकान मालिक के यहां भी कोई उत्सव था और उन्हें भी शिव मंदिर में विशेष पूजा अर्चना के लिए जाना था। इसलिए सभी ने सामूहिक रूप से पूजा अर्चना करने का मन बनाया और अपनी अपनी तैयारियां शुरू की।

आज मानसी ने सुबह ब्रह्म बेला में उठकर नहा धोकर पूजा की सामग्री तैयार की और अपने पति देव को भी मंदिर में पूजा करने के लिए साथ चलने के लिए तैयार किया। मानसी ने लगभग 8 वर्ष की बेटी को समझाते हुए कहा- हम मंदिर में पूजा के लिए जा रहे हैं। जैसे ही पूजा संपन्न होगी हम तुरंत घर वापस आएंगे और तुम्हारे लिए प्रसाद भी लेकर आएंगे। देखो, अपना ध्यान रखना और घर पर ही रहना। अपनी बेटी को यह सब कहते कहते मानसी अपने पति और मकान मालिक के परिवार संग खुशी खुशी मंदिर के लिए चल पड़ी।

वह पूजा का थाल हाथ में लेकर के मंदिर की ओर जाते हुए शिवजी से अपनी-अपने परिवार अपने बंधु बांधों के लिए धन-धान्य की संपन्नता और खुशी के लिए प्रार्थना कर रही थी। उसके मन में आने एक अरमान हिलोरे ले रहे थे वह यह सोच रही थी कि आज वह शिव जी को अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए जरूर खुश कर पाएगी और भगवान शिव से आशीर्वाद देंगे हमेशा की तरह।

मानसी गर्भवती थी, लगभग 7-8 माह का बच्चा उसके पेट में सांसे ले रहा था। मानसी अपने पेट पर धीरे से हाथ रखते हुए बच्चे की आवाज चतुर्थी और पेट में होने वाले बच्चे की उछल कूद को महसूस करके खुश होती। वह मन ही मन चाहा उठती। बस, थोड़ा सा इंतजार करो अगली बार तुम भी मंदिर में श्रवण की पूजा के लिए हमारे साथ चलोगे। तुम्हें भी गोदी में उठा करके शिव पूजा के लिए अपने साथ ले चलूंगी जैसे गौरी अपने गणेश को।

मानसी पूजा का थाल दोनों हाथों में लिए शिवस्वरूप अपने पति के संग ऐसे लग रही थी जैसे आज साक्षात पार्वती शिव की पूजा के लिए धरती पर उतर आई हो। जैसे ही मानस मंदिर में पहुंची, पूजा की सब तैयारी हो चुकी थी। रुद्राभिषेक होने लगा। मानसी ने भी अपने पति के साथ दोनों हाथ जोड़कर महाकाल के सामने भक्तिपूर्ण भावना से पवित्र मन से अपने गर्भ में पल रहे बच्चे और अपने परिवार ,समाज और राष्ट्र के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।

इधर शिव की पूजा हो रही थी। मंत्रों की पवित्र ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। उधर बिगड़ैल मौसम का रंग रूप बदलता जा रहा था। सुबह के समय भी काले बादलों की गर्जना में अंधेरा दिखाई देने लगा था। आसमान में चमकते बिजलियां घनघोर काली घटाएं शिव के तांडव का आभास दिल रही थी। आसमान में समरहिल की पहाड़ी पर काले बादल ऊपर की ओर ऐसे भाग्य जा रहे थे जैसे बहुत जल्दी में हों। डीजे पर शिव जी के भजनों का शोर का पास पड़ोस तक की सुनाई पड रहा था । सारा माहौल शिवमय था, भक्ति से ओतप्रोत।

अचानक ही शिव मंदिर से काफी दूर ऊपर पहाड़ी पहाड़ी की ओट में जंगल में जोर का शोर सुनाई दिया और देखते ही देखते पानी का सैलाब नीचे की ओर बढ़ने लगा। पहले पानी के तेज बहाव की रेलवे की लाइन से मुठभेड़ हुई और उसने काफी हद तक पानी के बहाव को रोके रखा तथा धीमा कर दिया। थोड़ी देर बाद फिर एक जोर का धमाका हुआ । अब बहुत सारा पानी पेड़ों पत्थरों को बहाकर लाता हुआ बाढ़ का विकराल रूप धारण करके सीधा शिव मंदिर की ओर काल बना करके आ रहा था।

इस पानी के भयानक सैलाब ने शिव मंदिर की ओर रुख किया और देखते ही देखते मंदिर को अपनी चपेट में ले लिया। इस समय काफी लोग मंदिर में मौजूद थे पूजा अर्चना हो रही थी लोगों का आना-जाना बराबर लगा हुआ था जिसने भी नीचे की ओर आते हुए सैलाब को देखा वह भाग निकला चीख पुकार मच गई ऐसे में मंदिर के भीतर की शिव भक्तों को ना कुछ सोचने का मौका मिला और ना ही वे बाहर निकाल पाए। मौत के इस भयंकर तांडव को सामने देखकर किसी का भी बचपन संभव नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात शिवा का तांडव हो रहा है और शिव भक्तों के सिर पर मौत नाच रही है।

पलक झपकते ही पानी का सैलाब मंदिर को कब बहा करके ले गया पता ही ना चला। मंदिर में मौजूद लोग कब पानी के भंवर में गिरकर मौत की आगोश में समा गए कोई नहीं जा पाया। बस पीछे कुछ प्रश्न गूंज रहे थे -मंदिर में कितने लोग थे। कौन-कौन थे। कौन निकल पाया। कौन बच पाया और कौन इस भयंकर आपदा का शिकार हो गया। कुछ ही देर बाद वहां से गुजरते हुए और साथ के घरों में रहने वाले लोगों ने जब इस भयंकर हादसे को देखा तो पल भर में शोर मच गया।

लोगों ने मोबाइल से रील बनाई और यह हादसा देखते ही देखते सोशल मीडिया की सुर्खियां बन गया। सरकारी तंत्र, समाज सेवक, लोग जान हथेली पर लेकर लोगों को बचाने के लिए दलदल में कूद पड़े परंतु यह हादसा इतना बड़ा और इतने कम समय में हुआ कि किसी के बचने और जिंदा रहने की कोई उम्मीद बहुत कम थी। फिर भी एनडीआरएफ, युवा संगठनों और सरकारी मशीनरी की दिन-रात की मेहनत से एक दो शव हर रोज निकलने लगे और यह सिलसिला लगातार कुछ दिनों तक लगातार चलता रहा।

दरअसल सैलाब का मलवा नाले में दो-तीन किलोमीटर दूर तक फैला हुआ था। इस संकरे और ऊबड खबर नाले में सैलाब की दलदल के बीच में लाशों को खोज निकालना आसान नहीं था। फिर भी एनडीआरफ, युवाओं और अन्य संगठनों ने शवों को खोज कर निकालने का मोर्चा संभाल लिया। शिव मंदिर से लेकर के बहुत नीचे तक तलाश जारी रही और जब कोई शव क्षत-विक्षत हालत में मिलता उसे उसके परिजनों को सौंप दिया जाता और अगले ही क्षण बचाव दल दूसरी दबी कुचली लाशों को तलाशने में जुट जाता। बचाव दल के रात दिन के प्रयास से जो कोई शब बरामद होता या किसी के के शरीर का कोई अंग कहीं मिल जाता तो उसे उसके परिजनों को सौंप दिया जाता और उसकी शिनाथ करके उसके अंतिम संस्कार के लिए चल पड़ते।

मानसी और उसके पति का शव मिलने पर 17 अगस्त को कांगड़ा जिला के नूरपुर तहसील के समीप लोधवां गांव में अंतिम संस्कार कर दिया गया। मानसी का पूरा शरीर नहीं मिला। दोनों बाजू गायब थे । शायद मानसी का पेट भी फट गया हुआ था और उसमें ना गर्भाशय मिला ना गर्भाशय में पलते हुए बच्चे का ही कोई नामोनिशान मिल पाया। अभी भी खोज जारी थी। अन्य शवों की भी और मानसी के मृत शरीर के बाकी अंगों की भी।

रात दिन की मेहनत के बाद बचाव दल को मानसी की दोनों बाजुएं भी मिल गई । बड़ी मेहनत के बाद बारीकी से छानबीन करने पर मिल पाया मानसी का गर्भाशय। यूट्रस के मिलने पर टुकड़ों में बिखरा हुआ मानसी का शेष मृत शरीर अब मिल गया था । शिनाख्त होने के बाद जब यह निश्चय हो गया कि यह भुजाएं और यूट्रस मानसी का है तो इसे मानसी के परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया गया।

आज 20 अगस्त को मुक्तिधाम संजौली में मानसी के परिजनों द्वारा उसके अवशिष्ट मृत देह का हिंदू रीति रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार संपन्न किया गया। आज इस अंतिम संस्कार में उपस्थिति रही। शायद हमारे जीवन का यह सबसे भयंकर हादसा था। इतिहास मैं यह एकमात्र ऐसी मिसाल है कि एक व्यक्ति का दो बार दाह संस्कार हुआ। मानसी की पहले पार्थिव देव को पति के संग उसके पैतृक गांव में अग्नि दी गई और बाद में मिलने वाली दो भुजाएं और युटेरस का आज का आज अंतिम संस्कार किया गया।

मानसी समाज सेवा में हमेशा अग्रणी रही। वह अपने विद्यार्थियों और सामाजिक संगठनों में सेवा करने वाले सहयोगी जनों के साथ बहुत आत्मीय संबंध बनाए हुए थी जिसकी गवाही आज संस्कार में उपस्थित कृतज्ञ बंधु जन दे रहे थे। आज उसके अंतिम संस्कार में राष्ट्रीय सेवा समिति की बहने और सामाजिक संगठन से जुड़े गणमान्य व्यक्ति उपस्थित हुए।

एक व्यक्ति ने कहा शायद यह महाकाल शिव जी की ही लीला का ही प्रकोप रहा कि यह भयंकर हादसा हुआ और शिवजी की ही कृपा रही कि पानी का सैलाब मंदिर की ओर रुख कर गया। अगर पानी मंदिर की बजाय घरों की ओर मुड़ जाता तो सैकड़ो जाने जाती और संपत्ति का भी अथाह नुकसान हो जाता। काश यह है प्रलयंकारी सैलाब मंदिर को छोड़कर थोड़ा और किनारे की ओर मुड़ जाता तो शिव भक्तों के जीवन की भी रक्षा हो जाती और उन्हें असमय में मौत को गले नहीं लगाना पड़ता।

मानसी के दाह संस्कार के बाद फूल चुनकर उसके संगठन की दीदी को सौंपते हुए पंडित जी ने कहा- यह फूल ले जाकर पहले वाले फूलों में मिला देना और उन्हें रीति रिवाज के अनुसार गंगा की पावन धारा में प्रवाहित कर देना । वहां उपस्थित सभी जनों की आंखों में आंसू थे लेकिन एक बात का मन में संतोष भी था कि आज मानसी की खंडित पार्थिव देह के सभी अंग मिलने पर उसका अंतिम संस्कार पूर्ण हुआ। -और मानसी महाकाल शिव के मानस में समा गई। अब मुक्ति के महामिलन के लिए उसके फूलों को इंतजार है शिवजी की जटाओं में शोभित मां गंगा को…

✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य, शिमला

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