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भारत में विवाह की मान्यताएँ

✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य

प्राचीन भारत में नीति शास्त्र के आधार पर आठ प्रकार के विवाह का उल्लेख है जिसमें सबसे अच्छा ब्रह्म विवाह को माना जाता है जिसमें लड़का और लड़की दोनों पक्षों के माता-पिता आपसी सहमति से विवाह का प्रस्ताव करते हैं और सामाजिक रस्मों रिवाजों के अनुसार धूमधाम से विवाह किया जाता है। यह विवाह सात जन्मों के बंधन की भावना से सुदृढ़ रहता है। विवाह का एक ग्रुप स्वयंवर प्रथा पर ही है जिसमें शिक्षा संपन्न होने के बाद कन्या अथवा उसके माता-पिता योग्य वर की तलाश के लिए बुद्धि कौशल बल की परीक्षा के लिए कोई शर्त रखा करते थे जिसे पूरा करने वाले योग्य वर के साथ उस कन्या का विधिवत विवाह किया जाता था इसके अलावा लड़की को भगाकर ले जाना अनमेल विवाह दान दहेज की कुप्रथा को अपनाते हुए बलपूर्वक विवाह कर देना आदि को प्रथम भी समाज में प्रचलित रही हैं जिनका समय समय पर विरोध होता रहा और उनमें सुधार भी हुआ। भारतीय परंपरा में पतिव्रता होना और एक पत्नी के साथ गृहस्थ के दायित्व का निर्वाह करना वंश को आगे बढ़ाना धर्म अर्थ काम मोक्ष की भावना से जीवन यापन करना सर्वोपरि रहा है।

कालांतर में विदेशी आक्रमणों के आतंक से जब कन्याओं की सुरक्षा की चिंता होने लगी तो माता-पिता को मजबूरन छोटी अवस्था में ही विवाह का सहारा लेना पड़ा। युवा अवस्था में पति का युद्ध मैं वीरगति को प्राप्त हो जाने पर विधवा पत्नी उसी की चिता में सती होने लगी। किसी अन्य कारण से पति की मृत्यु हो जाने पर विधवा को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता और कई तरह की पाबंदियां उस पर लगाई जाती। भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन में स्वामी दयानंद, राजा राममोहन राय तथा अन्य समाज सुधारकों ने सामाजिक कुरीतियों से छुटकारा दिलाने के लिए अनेक सामाजिक सुधारो की क्रांति का सूत्रपात किया जिन्हें स्वतंत्रता के पश्चात भी किसी न किसी रूप में आगे बढ़ाए जाने का प्रयास होता रहा।

महिलाओं पर मत मजहबों के अनुसार भी कई तरह की बंदिशें रही हैं । कहीं उन्हें मात्र भोग की वस्तु माना जाता है, कहीं उन्हें उचित सम्मान भी दिया जाता है। यह सामाजिक खींचतान पुरुष प्रधान समाज में आज भी किसी न किसी रूप में चलन में है। पहले युद्ध काल में भी महिलाओं के शादी के प्रस्ताव या बलपूर्वक उठाकर अथवा राज्य को जीतकर के शादी कर लेना राज्य के विस्तार तथा राजनीति का हिस्सा रहा है। किसी राजा के पराजित हो जाने पर विजयी राजा उसकी कन्याओं को अपने पत्नी स्वीकार कर लेता था। इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि महिला किसी न किसी रूप में पारिवारिक सामाजिक तौर पर संघर्ष के केंद्र में रही है। आधुनिक काल में महिला परिवार पर भुजा ना रहे इसलिए उसे पढ़ने लिखने और नौकरी करने के अधिक अवसर प्रदान किए जाने पर जोर दिया जाता रहा है।

एक महिला के अशिक्षित होने पर परिवार समाज और राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता है उसके विपरीत महिला के शिक्षित होने पर परिवार समाज और राष्ट्र की उन्नति के मार्ग पर विपरीत असर होता है। समाज में कुछ अवधारणाओं के चलते लव जिहाद जैसी सोच भी पनपती जा रही है जिसमें कुछ मतावलंबी लड़कियों को नाम बदलकर अपने मत मजहब की पहचान बदलकर पहले प्यार के जाल में फंसाते हैं फिर शादी करके लड़की को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है। इस तरह की कांट्रैक्ट मैरिज के बाद लड़कियों की हत्या के मामले भी सामने आए हैं। इससे भी समाज में असंतुलन बढ़ना स्वाभाविक है और मध्यकाल की तरह लड़कियों की सुरक्षा की चिंता परिवारों को सताने लगी है। वर्तमान में लड़कियों के साथ होने वाले बलात्कार, छेड़खानी और अन्य वारदातें समाज का एक खिलौना रूप प्रस्तुत करती हैं जिसमें समाज को यह सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि लड़कियों का संरक्षण, शिक्षा, व्यवसाय की व्यवस्था किस प्रकार की जाए ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे और उन्हें घर परिवार समाज और व्यवसाय के लिए अच्छा माहौल मिल पाए ताकि वे भी राष्ट्र के विकास में अपना भरपूर योगदान दे सकें।

हिंदू मैरिज एक्ट में बालिग होने पर लड़का और लड़की को अपनी पसंद से कोर्ट मैरिज करने का अधिकार है और अधिकांश युवाओं में यह चलन देखने को भी मिलता है। विदेश में पढ़ाई या नौकरी के लिए भी कांट्रैक्ट मैरिज का चलन बढ़ रहा है जो कि एक अलग तरह की तस्वीर पेश करता है क्योंकि इस तरह के विवाह को अनुबंध के तौर पर स्वीकार तो किया जाता है परंतु वैवाहिक या पारिवारिक रिश्ते की तरह उसे नहीं निभाया जाता है जिससे विवाह की पवित्रता पर ही प्रश्न सामने आते हैं। पाश्चात्य संस्कृति की देखा देखी में पढ़े-लिखे युवा वर्ग द्वारा लिव इन रिलेशनशिप को आधुनिकता की चकाचौंध में नए रिवाज के तौर पर भी स्वीकार किया जाने लगा है जिससे विवाह संस्था पर विपरीत प्रभाव हो रहा है। संयुक्त परिवार के टूटने की वजह से भी युवा कामगार लड़के लड़कियों को विवाह करने और वैवाहिक जीवन के दायित्व को निभाने में आने वाली कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है ।

इधर समलैंगिक विवाह को भी मान्यता मिलने लगी है जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। समलैंगिकता में विवाह क्यों जरूरी है और उसका पारिवारिक जीवन के लिए उद्देश्य क्या है यह समझना बहुत कठिन है लेकिन विचारों की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता के अधिकार पर इस तरह की प्रथाएं धीरे-धीरे संरक्षण प्राप्त करती जा रही है जिससे समाज एक विद्रूपता की ओर बढ़ता हुआ दिख रहा है । इन परिस्थितियों में हाल ही में गुजरात राज्य में सरकार द्वारा एक नियम बनाया गया है कि लड़का और लड़की को बालिग होने के बाद भी माता-पिता की अनुमति तथा उपस्थिति के बिना विवाह करने का अधिकार नहीं होगा । इसे भले ही स्वतंत्रता के अधिकार का हनन की दृष्टि से देखे जाने पर आलोचना का विषय बनाया जा सकता है परंतु यह निर्णय हिंदू विवाह संस्था को सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने में एक सशक्त निर्णय के रूप में सामने आएगा। इससे माता-पिता अपनी संतानों के प्रति भी अपने कर्तव्य का ठीक से निर्वाह कर सकेंगे और युवाओं को भी विवाह जैसे पवित्र बंधन में बांधने के लिए माता-पिता के आशीर्वाद और उनकी अनुमति की कानूनी आवश्यकता बनी रहेगी। यह एक स्वागत योग्य निर्णय है तथा अन्य प्रति को भी इस तरह के कानून बनाकर विवाह की पवित्र भावना को बनाए रखने का प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

✍️ डॉ. कर्म सिंह आर्य

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