✍️ हितेन्द्र शर्मा
21वीं सदी का विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, ऐसा प्राय कहा और सुना जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने से सदियों पुराने ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठने लगा है। पहाड़ धीरे-धीरे बौने होते जा रहे हैं । जंगलों की हरियाली गायब होने लगी है। बर्फ, बारिश और गर्मी के मौसम का मिजाज बदल रहा है। कहीं बर्फ कहीं बारिश कहीं गर्मी बहुत अधिक पड़ रही है, कहीं बिल्कुल भी नहीं, प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ता जा रहा है। ऐसे में अनेकों प्राणियों का जीवन समाप्त हो रहा हैं और धरती पर बच्चे शेष प्राणियों का जीवन भी चुनौतियों का सामना करता जा रहा है।
यह सभी मानते हैं कि इस धरती पर एक तिहाई भाग जल और एक भाग भूमि का है। जल की मात्रा अत्यधिक है। उसके बाद भी जल की कमी का रोना धोना समझ से परे है। सृष्टि का जन्म ही जल से होता है। प्रलय की अवस्था में केवल जल ही जल होता है। धीरे-धीरे जल सूखता जाता है और फिर पहाड़, जमीन सामने आने लगती है। इसी जमीन पर प्रकृति की गोद में असंख्य जीव जंतु पक्षी और मनुष्य पैदा होते हैं। सभी अपने-अपने गुण कर्म स्वभाव के अनुसार अपना अपना जीवन व्यतीत करते हैं परंतु मनुष्य क्योंकि बुद्धिबल से विभिन्न प्रकार के आविष्कारों को करने में सक्षम होता है इसलिए वह अपने जीवन में सुख सुविधाओं की निरंतर खोज करता रहता है। किसी समय यह स्वार्थी होकर अन्य प्राणियों के दुख दर्द को न समझता हुआ केवल अपना और अपने परिवार का हित चाहने लगता है। यही से प्रकृति के दोहन और विनाश की कथा शुरू होती है।

विकास के बहाने धीरे-धीरे प्रकृति का क्षरण होने लगता है। जल और मिट्टी का संतुलन बनता बिगड़ता रहता है। पहाड़ों से बारिश और बर्फ के कारण मिट्टी का क्षरण होता है। पेड़ पौधे नष्ट होते हैं, कुछ पेड़ पौधों को विकास के नाम पर अंधाधुंध काट लिया जाता है। इन्हीं परिस्थितियों में पर्यावरण प्रदूषित होने लगता है। यही से शासन प्रशासन के नए-नए प्रयोग शुरू होते हैं। बुद्धिजीवी इंजीनियर और समाजसेवी नेता सक्रिय होने लगते हैं। पानी को बचाना, पानी का सही उपयोग करना, पानी से किसी प्रकार की हानि न हो, इन विषयों पर पर चिंतन मनन होने लगता है। बेतहाशा पैसा पानी की तरह बहाया जाता है परंतु पानी की समस्या वही की वहीं खड़ी रहती है। कई तरह के उपाय भी अमल में लाने पर भी हमें लाभ नहीं हो पाता है। अब भविष्य में पीने के लिए जल उपलब्ध हो सकेगा या नहीं यह चिंता विश्व स्तर पर भी की जाने लगी है। भारत में भी जल को अत्यंत महत्वपूर्ण मानकर जल शक्ति मिशन को प्राथमिकता दी जा रही है जिससे सोच बदली है कुछ जागरूकता होने लगी है परंतु अभी तक बहुत कुछ करने के लिए बाकी है।
पहाड़ों पर हर साल बर्फ पड़ती है, बरसात में बारिश होती है, जिसका सारा पानी बूंद बूंद बह करके व्यर्थ चला जाता है। नाला, खड्ड, नदी, पानी को बहा करके समुद्र के हवाले कर देती है। सूर्य की गर्मी से समुद्र का जल भाप बनकर उड़ता है बादल बनाकर बरसता है प्रकृति का संतुलन ठीक हो तो बरसात भी ठीक होती है और संतुलन बिगड़ने पर बादलों का फटना और प्रलयंकारी बाढ़ का आना अब आम बात होने लगी है। गर्मियां आने पर फिर पानी की कमी होने लगती है। पानी के लिए हाहाकार मचता है। फिर नए-नए प्रयोग होने लगते हैं। पानी को टैंकों में भरकर बेचना और उसमें भी होटल व्यवसायों को प्राथमिकता देना समाज में असंतोष पैदा करता है। इस सारी कवायद के बावजूद भी पानी की शुद्धता के प्रति शंका बनी रहती है और गर्मियों में पीलिया जैसे रोग फैलने लगते हैं। इसीलिए पानी की सप्लाई एक अच्छा खासा व्यपार बन जाता है।
इधर जंगलों को काटकर कृषि के योग्य खेती को बर्बाद करते हुए कंक्रीट के नए-नए ऊंचे भवन बनाए जाने का चलन बढ़ता जा रहा है। सरकार भी बैंकों के माध्यम से भव्य इमारत को बनाने के लिए ऋण उपलब्ध करवाती है। कहने को तो बहुत सारे नियम कायदे कानून बनाए जाते हैं परंतु जमीनी हकीकत पर अमल में कुछ कम ही दिखता है। आलीशान दफ्तर में बैठकर कागजी कार्यवाही करके नक्शे पास हो जाते हैं और इसमें सरकारी भवनों की ऊंचाई किसी से कम नहीं रहती।
पहले लोग प्रकृति का सम्मान करते थे। बर्फ और बारिश के पानी को छोटे-छोटे तलाब बनाकर इकट्ठा कर लेते थे। जब गर्मियों में पानी की किल्लत होती थी तो उसी तालाब के पानी का उपयोग करते थे। अब जब से ठेकेदारों के माध्यम से इन गांवों के तालाबों का निर्माण होने लगा है तब से यह तालाब सूखे पड़े हैं और ना उनमें पानी भरता है और कहीं गलती से भर भी जाए तो वह किसी उपयोग का नहीं रहता है। पहले हर गांव का अपना एक जल स्रोत बावड़ी होती थी। वहां पर कुछ देवी देवताओं की मूर्तियां लगी रहती थी। पानी की शुद्धता पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता था और कुछ विशेष अवसरों पर उन जल स्रोतों की साफ सफाई भी गांव के लोगों द्वारा सामूहिक तौर पर साफ कर ली जाती थी। जब से मनरेगा शुरू हुआ तब से इस तरह के सामूहिक कार्य पूरी तरह से बंद हो गए हैं अब बिना पैसे के कोई एक पत्थर हिलाने के लिए भी राजी नहीं होता है।
हमारी परंपरा में नई बहू ब्याह कर जैसे ही घर में प्रवेश करती थी सबसे पहले उसको बावड़ी का, अपने पैतृक जल स्रोत का पूजन करके जल भर करके घर में प्रवेश करना होता था। फिर विकास की बयार चली, सड़के बनने लगी। सड़कों के किनारे जितने भी झरने जलसोत थे एक-एक करके जमीन में समा गए कुछ बंद हो गए कुछ बंद कर दिए गए। फिर विकास घर-घर में पहुंचा और आदमी घर में रसोई में आने वाले जल पर पूरी तरह से निर्भर हो गया, सप्लाई आएगी तो पीने को मिलेगा। कभी-कभी तो बर्फ और बरसात में पीने को पानी भी मुहैय्या नहीं हो पता है। गर्मियों में वैसे ही पानी कम पड़ जाता है यह खींचतान वर्ष भर चली रहती है। जनता और प्रशासन में आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है।
अब वही प्रश्न फिर सामने आता है कि क्या बर्फ और बारिश के पानी को इकट्ठा नहीं किया जा सकता है। पानी की कमी होने पर उस एकत्रित जल को घर के निर्माण और शौचालय आदि के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। हां, इसके लिए भी एक सरकारी सोच पंनपी और छत के पानी को हार्वेस्टिंग टैंक में इकट्ठा किया जाने लगा। क्योंकि अब मकान पक्के आरसीसी के पिलर्स डालकर बनाए जा रहे हैं और पिलर के नीचे की जमीन खाली रहती है उसमें गटका और मिटटी भरी रहती है जहां से पानी लगातार जमीन में रिसता रहता है। अब पानी तो ठहरा पानी, जहां-जगह मिलेगी उधर वह निकलेगा। उसका बहाव कहां किस दिशा में होगा यह तो मकान मालिक भी नहीं जानता। यह पानी भूमि के भीतर भीतर ही चुपचाप बहता रहता है। पानी कहां जाकर निकलेगा, कहां फूटेगा, किसकी जड़ों से मिट्टी बहाकर उसको खोखला कर देगा, यह सब देखने समझने के लिए कोई भी जरिया ही नहीं है। अब छत का पानी हार्वेस्टिंग टैंक में जमा होकर मकान की जमीन में निरंतर रिस रहा है। रच बस रहा है और धीरे-धीरे मिट्टी को वह खोखला, कमजोर करता जा रहा है। जब कभी कभार तेज बारिश होती है तो बारिश का पानी इस हार्वेस्टिंग टैंक के रास्ते से बहता है तो उससे नुकसान होना तो स्वाभाविक ही है।
एक और बहुत बड़ी विडंबना यह है कि एक मकान बनाने वाला अपने हार्वेस्टिंग टैंक को इस ऐसी जगह पर बनता है कि उसका पानी निकले निचली तरफ को रिसता रहे। फिर नीचे वाला मकान नीचे की ओर धकेल देता है। उसके नीचे वाला और नीचे की ओर धकेल देता है। ऐसे करते करते पूरी पहाड़ी पर एक श्रृंखला बन जाती है पानी की, या यूं कह सकते हैं की जमीन के नीचे नीचे पूरी एक पानी की सुरंग बनती जा रही है। एक दूसरे का पानी मकान के नीचे बहने वाली धारा आपस में मिलती जुड़ती बहती रहती है और जब कभी भारी बारिश का पानी वहां तक भारी मात्रा में पहुंचता है तो वह पक्के मकान की जड़ों को भी खोखला कर देता है और वहां की मिट्टी जब बह जाती है और मकान भुरभुराकर गिर पड़ता है।
मकान वही है, पक्का बना है लेकिन जमीन खिसक गई तो जमीन के खिसकने से मकान खिसक जाता है। इस बारिश में बहुत सारे मकान ऐसे देखने को मिले हैं। अब नियम कायदे कानून रीति नीति ऐसी है कि एक व्यक्ति अपना सीवरेज और छत का पानी पूरा का पूरा वेस्ट वाटर जमीन के अंदर डाल देता है और फिर भूल जाता है। उसके किसी भी प्रकार के होने वाले दुष्परिणामों को एक व्यक्ति अपने पड़ोसी की ओर पानी को धकेल देता है। वह पड़ोसी दूसरे वाले मकान की ओर अपना पानी का रुख मोड़ देता है। आगे वाला अगले मकान की ओर, धीरे-धीरे पूरा का पूरा गांव पूरा का पूरा शहर अंदर से पानी का बहाव का एक पूरा का पूरा रास्ता बन जाता है।
पानी तो पहले भी बहता था लेकिन छत के पानी को किनारे को ढलान पर खुला बहने दिया जाता था उसकी जमीन के अंदर इकट्ठा करके खतरा मोल लेने की परंपरा नहीं थी। तब मकान महफूज थे। पहले मकान कृषि के योग्य भूमि पर नहीं बनाए जाते थे क्योंकि वहां पर पानी जमा रहता था। ऐसे स्थान पर कोई मकान नहीं बनाया जाता था जहां पहाड़ी से पानी का ढलान होकर पानी इकट्ठा होता हो। पुराने गांव को किसी धार, टेकड़ी पर बसा हुआ देखा जाता है। अब क्योंकि हम आधुनिक होते जा रहे हैं। गाड़ी मकान के अंदर आनी चाहिए। इसलिए हमने ऐसी जगह पर भी नदी नालों खेतों में मकान बना दिए जहां पहले पानी बहा करता था और जब कभी बरसात ज्यादा होती है बर्फ का पानी ज्यादा होता है तो मकान के गिरने टूटने की संभावनाएं बढ़ती जाती हैं।
पहाड़ी राज्यों में विशेष कर हिमाचल प्रदेश में इस बरसात में जो हजारों मकान गिरकर जान माल और संपत्ति का नुकसान हुआ है इसका आकलन तो किया जाता रहेगा। कुछ ना कुछ मुआवजा भी मिल जाएगा परंतु क्या आने वाले मकान का निर्माण करने के लिए कुछ सीख कोई लेना चाहेगा। जो इस समय मकान बने हैं उनके भीतर जो पानी घुसने की कवायद चल रही है। क्या उसको रोकने के लिए कोई कारगर उपाय अमल में ले जा सकेंगे। अगर गंभीरता से इस विषय में नहीं सोचा गया तो हर बर्फ और बरसात के मौसम में पहाड़ों में मकान के गिरने की यह कड़ी खत्म होने वाली नहीं है। इस आपदा से बहुत बड़ा नुकसान हो चुका है, हो रहा है और जिस तरह से जमीन में, मकानों के आसपास, सड़कों पर दरारें आई हैं उससे और भी अधिक नुकसान होने का अंदेशा बना हुआ है। ऐसे में जान माल की रक्षा करना एक चुनौती बन गया है । सभी से सहयोग की अपील की जा रही है। यह सब तो फौरी तौर पर जरूरी है जिसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं परंतु जितनी बड़ी त्रासदी है उतने बड़े इंतजाम अभी भी किए जाने बाकी हैं जिसके लिए बहुत अधिक धन समय तथा काम किए जाने की जरूरत है ताकि भविष्य में इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित बचा जा सके।
✍️ हितेन्द्र शर्मा
लेखक, साहित्यकार
कुमारसैन, जिला शिमला, हि.प्र.