सतलुज घाटी क्षेत्र देवोत्सव व लोकोत्सव परम्परा के लिये विख्यात है. हिमाचल प्रदेश के प्राचीनतम् क्षेत्र त्रिगर्त के बाद कुलांतपीठ, किनिन-बुशहर व कुलिन्द क्षेत्र प्राचीन जनपदों की श्रेणी में आते हैं.सतलुज घाटी क्षेत्र का पूर्वी भाग किन्नर-बुशहर खण्ड व दक्षिण-पश्चिमी भाग कुलिन्द जनपद के अधीन है. किन्नर का संदर्भ रामायण,महाभारत व मनुस्मृति आदि प्राचीन वांङमय में सन्निहित है.कुलिन्द जनपद का नामकरण कुनिन्दों के नाम से हुआ माना जाता है जो आर्यों के पूर्ववर्ती बन्धु थे जो भारत के हिमालयी क्षेत्र में बसे.कुलन्दों ने यहां की आदि जातियों की अनेक परम्पराओं को आत्मसात् कर मिश्रित संस्कृति को जन्म दिया. अत: यहां की धर्म व संस्कृति में आर्य व अनार्य संस्कृति की परम्पराएं अंतर्निहित हैं.सतलुज घाटी के सुकेत क्षेत्र में वैदिक संस्कृति के दिग्दर्शन यहां प्रचलित देवानुष्ठान एवम् देवोत्सव में होते हैं.सतलुज घाटी क्षेत्र में शिशिर ऋतु के आगमन के साथ रात्रि उत्सवों व लोकनाट्यों का आयोजन आरम्भ हो जाता है. हालांकि आज के उपग्रह युग में रात्रि उत्सव व इन उत्सवों में लोकानुरंजन और देवार्चन के निमित्त लोकनाट्यों का मंचन लगभग लुप्तप्राय: हो गया है. परन्तु देवपरम्परा का आज भी अनुशीलन होता आ रहा है.शिशिर ऋतु में सतलुज घाटी क्षेत्र में खरीब की फसलों का भण्डारण व घास- चारा काटकर निवृत हो जाते हैं. अब लोग सर्दी से बचाव के लिये केवल ईधन की लकड़ियों के संग्रह में लग जाते हैं.अत: लोगों के पास देवार्चन व लोकानुरंजन का पर्याप्त समय होता है. इसी कारण ऐसी परम्पराओं का प्रतिपादन हुआ होगा ताकि श्रम के अवकाश में देवोत्सव का आयोजन हो.वास्तव में सतलुज घाटी में विजयदशमी से लोकनाटयों का सिलसिला आरम्भ हो जाता हैं.कोटगढ़ में दशहरे के अवसर पर रियासती काल में देवी के प्रांगण में लोकनाट्य बांठड़ा का आयोजन हुआ करता था. उस समय कुमारसैन व शांगरी की बांठड़ा लोकनाट्य दल कोटगढ़ में दशहरे के अवसर पर लोकनाट्य का मंचन किया करते थे. आज भी कोटगढ़ में रियसती परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रहसनात्मक दृश्यों का मंचन किया जाता है.सुकेत क्षेत्र में कार्तिक मास की पूर्णिमा शिशिर पूर्णिमा के दिन से रात्रि उत्सव परैहते का आयोजन होता है. चूंकि इस रात का आध्यात्मिक, वैदिक व पौराणिक महत्व है. शिशिर पूर्णिमा में चन्द्रमा सभा कलाओं से सम्पन्न होकर मनुष्य पर प्रभाव प्रक्षेपित करते हैं. श्रीकृष्ण गोपियों सहित सबसे अधिक ज्योत्सना में रास लीला करते हैं. ऐसी चिताकर्षक रात्रि में सुकेत में देवोपस्थित में परैहते रात्रि उत्सव का आयोजन होता है. सुकेत की राजधानी पांगणा के दक्षिण-पूर्व में फरास नामक स्थान पर भगवान श्रीराम के गुरू वसिष्ठ ऋषि देव थड़ा देव रूप में आराधित हैं. देव थला के सम्मान में शिषिर पूर्णिमा को पांगणा के समाप बाग गांव में पूर्व में प्रथम प्रैहते का आयोजन होता था.आज हालांकि प्रैहते के अवसर पर जनसमूह देवता को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिये न तो एकत्रित होते हैं और न ही बांठड़ा जैसे लोक नाट्य का मंचन लोकानुरंजन के लिये होता है.परन्तु देव परम्परा का अनुशीलन यथावत् होता आ रहा है. अत: देव थड़ा आज भी रथारूढ़ होकरपांगणा सरिता के बायीं ओर बाग में प्रैहता के आयोजन स्थल पर पहुंचते हैं. प्राचीन देव व लोक परम्पराओं के मिटने के पीछे लोकसमूह की उदासीनता और संस्कृति के प्रति अनादर मुख्य कारण रहे हैंतेरहवीं शताब्दी के इतिहासकार धूरजट्ट की पुस्तक धूरजट्ट की भारभाषणी में ऋषि वसिष्ठ के रूप देव थला के सुकेत में प्राकट्य के विषय में विशद वर्णन किया गया हैं. जनमानस की लोक परम्पराओं के प्रति विमुखता और अपनी लोकसंस्कृति से मोहभंग प्राचीन लोकोत्सव व देवोत्सव के विलुप्त होने के प्रमुख कारण रहे हैं।

देव थड़ा का फ्रास गांव में प्राकट्य के विषय में धूरजट्ट का विवरण है कि चुराग और कोट में दो ठाकुरों का राज्य था.ईहर वीहण कोट कटाये,सहजे ठाकरे मणे मणाये. 1रहन्दे कहन्देधड़े सराये,धरजा परजा लाओ बड़ाये. 2धीरजो वीरजोदुए वजीरा,रैत वलैत सिमरो सिरा.3अर्थात् कोट में मवाना सहजो को लोकोपकारी राज्य था. उसके चार पुत्र व एक सुशील लड़की थी. उधर पड़ोस में शिशुआ नामक मवाना शासक था जो सहजो छाकुर की लोकप्रियता से ईष्या से जल उठा.अत: उसने धो़खे से सहजो ठाकुर के चार पुत्रों रो बुलाकर मार डाला. अंत में अपनी क्रूरता की पराकाष्ठा को लांघते हुए शिशुआ ने अपने अनुचरों के माध्यम से सहजो ठाकुर के कुल का चिराग इकलौती बेटी का अपहरण कर डाला. सहजो ठाकुर की बेटी का अपहरण कर ठाकुर शिशुआ ने उसे एक गुफा में कैमद कर लिया. सहजो ठाकुर की लड़की ने अपने देवी-देवताओं का अपनी मुक्ति के लिये आह्वान किया. अंत में लड़की को एक राजकुमार उस गुफा में प्रकट हुआ मिला. उसने लड़की को आश्वासन दिया कि वह चिंता न करे. वह उसे सुरक्षित अपने घर ले जाने में सक्षम है. परन्तु वह तरूण राजकुमार शिशुआ व उसके सैनिकों को एक उल्लू के रूप में दृष्टिगोचर हुआ.उल्लू देखकर शिशुआ व उसके सैनिकोने अपशकुन समझा और उसे मार भगाने के लिये उसका पीछा करने लगे.उल्लू उड़कर अग्निपुंज में परिणत हो गया और शिशुआ ठाकुर के किले पर बैठ गया.देखते ही देखते शिशुआ ठाकुर का क्षेत्र जल गया. कालांतर में वसिष्ठ ऋषि कोट क्षेत्र के फरास में तपोनिष्ठ हुए.आज फरास में वसिष्ठ ऋषि का पाण्डव शरण शैली का मंदिर है. फरास देवता द्वारा सहजो ठाकुर की लड़की की रक्षा करने के कारण कृतज्ञ ठाकुर ने फरास देवता को अपने क्षेत्र का देव मानकर प्रतिष्ठित किया.देव थड़ा फरास के साथ दोऊरी जड़, हीरा मौहता व सुजिया व्ताड़ जैसै गण आधि-व्याधि का निराकरण करते हैं. हीरामौहता देव थड़ा के वजीर हैं. देव थड़ा परम्परानुसार शिशिर पूर्णिमा को पांगणा सरिता के बायीं ओर बाग में अपने स्थान पर पधार कर प्रैहते मेले में दिव्य उपस्थिति प्रदान करते हैं. पूर्व में प्रैहते के रात्रि देवोत्सव में लोकनाट्य बांठणा का मंचन होता था जिसके माध्यम से लोगों को धर्म-संस्कृति एवम् नीति-रीति का स्वस्थ संदेश प्रेषित होता था.सुकेत में लोकनाट्य बांठड़ा का आरम्भ सुकेत के संस्थापक राजा वीरसेन ने आरम्भ किया था।
✍️ डाॅ. हिमेन्द्र बाली ‘हिम’ कुमारसैन