Himalayan Digital Media

Himalayan Digital Media

Editorial/सम्पादकीय राजनीति साहित्य

आठवीं अनुसूची की राह देखती पहाड़ी भाषा

✍️ आचार्य डॉ कर्म सिंह

भारत की स्वतंत्रता के बाद कुछ प्रदेशों के गठन में आंचलिक भाषाओं और संस्कृति तथा जनजीवन की परंपराओं का विशेष महत्व रहा है। हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार के भागीरथ प्रयासों से हिमाचल प्रदेश को भी पहाड़ी भाषा, साहित्य, संस्कृति और प्राचीन लिपियों के आधार पर राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। हिमाचल का गठन होने के बाद प्रारंभिक वर्षों में पहाड़ी को एक भाषा के रूप में स्थापित किए जाने की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी शिक्षा विभाग , भाषा संस्कृति विभाग और हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के माध्यम से हुए। डॉ यशवंत सिंह परमार के मार्गदर्शन में लालचंद प्रार्थी ने भी पहाड़ी की मुहिम को आगे बढ़ाया। उसके बाद नारायण चंद्र पाराशर ने भी लोकसभा में पहाड़ी भाषा के मुद्दे को उठाया और हिमाचल अकादमी की ओर से कुछ प्रस्ताव पारित करवा करके भी प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को भेजे जाते रहे।

हिमाचल प्रदेश के अधिकांश लेखकों ने अपने लेखन की यात्रा पहाड़ी भाषा में प्रारंभ की और उसके बाद जब वह कवि कथाकार, उपन्यासकार संपादक जैसे महान लेखकों के रूप में स्थापित हुए। पहाड़ी भाषा में हिभारती और बागर आदि पत्रिकाएं प्रकाशित होती रही। गिरिराज साप्ताहिक में भी कुछ समय तक पहाड़ी भाषा में अधिक रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए पृष्ठों की संख्या बढ़ाई गई थी जो अब पूरी तरह एक पृष्ठ तक सिमट गई है। भाषा संस्कृति विभाग और हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी द्वारा भी पहाड़ी भाषा में कुछ पुस्तकें के प्रकाशित करके पहाड़ी साहित्य को समृद्ध किया गया।

प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल की सरकार में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करके केंद्र सरकार को पहाड़ी भाषा की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भेजा गया था जिसे केन्द्र द्वारा कुछ आपत्तियां सहित वापस भेजा गया। उन आपत्तियों का निराकरण करते हुए पुनः केंद्र सरकार को यह प्रस्ताव दोबारा वापस नहीं भेजा जाना है। केंद्रीय साहित्य अकादमी ने पहाड़ी को आंचलिक भाषा के तौर पर प्रचार प्रसार के लिए मान्यता देते हुए डॉ गौतम शर्मा व्यथित ,डॉ प्रत्यूष गुलेरी और प्रेम भारद्वाज के संपादन में पहाड़ी हिमाचली कविता, कहानी और नाटक संग्रहों का प्रकाशन किया है।

यद्यपि कांग्रेस सरकार पहाड़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और साहित्य को प्रोत्साहन प्रदान करने मान्यता दिलवाने के लिए अग्रणी रही है । भाजपा की पिछली सरकार ने अपने घोषणा पत्र में पहाड़ी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए विश्वविद्यालय में एक केंद्र स्थापित करने की बात की परंतु कुछ खास नहीं हो सका। अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में भी प्राथमिक शिक्षा दिए जाने का प्रावधान तो किया गया है परंतु हिमाचल प्रदेश में मातृभाषा में पढ़ाई के लिए किसी भी तरह का साहित्य तैयार नहीं किया गया है । इस दिशा में अकादमी की ओर से एक प्रारूप बनाकर शिक्षा विभाग को भेजा गया था परंतु उसका भी अभी तक कोई अता-पता नहीं है। साहित्य उत्सव में भी पहाड़ी पर केन्द्रित एक सेमिनार में भी पहाड़ी को सतनाजा बताए जाने से पहाड़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मुहिम को गहरा धक्का लगा। इसी बीच कुछ लोगों ने पहाड़ी के वर्तमान स्वरूप की बजाय मध्य पहाड़ी का राग अलापना शुरू कर दिया । वर्तमान में आठवीं अनुसूची में पहाड़ी को शामिल करने की दिशा में कोई सार्थक और गंभीर प्रयास नहीं किया जा रहे हैं। क्योंकि जो लेखक पहाड़ी भाषा और साहित्य के प्रोत्साहन मान सम्मान के लिए आगे आते रहे हैं वे अब हाशिए पर चले गए हैं और कुछ लेखक पहाड़ी के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में एक आध रचना पढ़कर पहाड़ी के लेखक तो बन जाते हैं परंतु पहाड़ी में निरंतर लिखना नहीं चाहते। इधर सोशल मीडिया पर पहाड़ी भाषा मैं समाचारों और अन्य कार्यक्रमों का प्रसारण और पहाड़ी में रचनाओं का प्रकाशित होने का सिलसिला निरंतर जारी है।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ सिकंदर कुमार के प्रयासों से हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की डॉक्टर यशवंत सिंह परमार पीठ में पहाड़ी भाषा साहित्य और लिपियां पर आधारित एक वर्ष का डिप्लोमा करवाया जाना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही । परमार पीठ में पाठ्य पुस्तक के लिए डॉ ओम प्रकाश शर्मा द्वारा पहाड़ी भाषा एवं साहित्य पुस्तक लिखकर स्वयं प्रकाशित की गई। अब उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद यहां भी पहाड़ी भाषा के प्रचार- प्रसार की अधिक उम्मीद बाकी नहीं रह गई है। इसके साथ केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला में भी पहाड़ी को प्रोत्साहन दिए जाने के लिए एक केंद्र स्थापित किया गया है।कुछ वर्ष पहले भाषा संस्थान मैसूर द्वारा पहाड़ी भाषा का सर्वेक्षण करते हुए भाषा वैज्ञानिक अध्ययन की परियोजना के अंतर्गत शोध कार्य किया गया परंतु अभी तक पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं हो सका। आईआईटी हमीरपुर द्वारा भी पहाड़ी भाषा को गूगल पर अध्ययन के लिए शोध कार्य हुए हैं। इस विषय पर और टांकरी लिपि में डिजिटल कीबोर्ड आदि तैयार करने के लिए भी कुछ विद्वान प्रयासरत हैं।वर्तमान में पहाड़ी भाषा की सहायक बोलियां धीरे-धीरे समाप्त हो रही है क्योंकि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनता जा रहा है और पहाड़ी बोलने, लिखने तथा व्यवहार करने के अवसर कम होते जा रहे हैं। परिवारों में भी नई पीढ़ी के साथ पहाड़ी में बोलने का चलन कम हो गया है। इसलिए बहुत सारी बोलियां समाप्त हो चुकी हैं और जो कुछ चलन में है वे भी आने वाले कुछ ही वर्षों में दम तोड़ती नजर आएंगी। इस प्रकार पहाड़ी का भविष्य चुनौतियों से भरा हुआ है राजनीतिक इच्छा शक्ति और लेखकों का अपनी भाषा संस्कृति के प्रति समर्पण होना अत्यंत आवश्यक है। यदि पहाड़ी भाषा और साहित्य की प्रोत्साहन तथा सम्मान के लिए हिमाचल अकादमी, भाषा संस्कृति विभाग ,शिक्षा विभाग, लोक संपर्क विभाग हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा मिलकर प्रयास किए जाएं तो पहाड़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास किया जा सकते हैं और सफलता भी मिल सकती है।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *