हिमाचल प्रदेश के लिए इस बरसात का आपदा काल कोरोना महामारी से भी भयानक रहा। इस वर्ष जुलाई माह के आरम्भ से ही हिमाचल में बरसात ने अपना कहर बरसाया। प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर भूस्खलन होने के कारण सैंकड़ों लोग बेघर हुए। इस कहर में कई लोगों ने अपनी जानें भी गंवाई। वैसे तो हिमाचल में हर वर्ष बरसातों में नुकसान होता था परन्तु इस वर्ष बहुत ही अधिक नुकसान हुआ। हिमाचल के ऊपरी जिलों कुल्लू, मण्डी, चम्बा, किन्नौर, सिरमौर, शिमला, सोलन आदि में इस वर्ष बरसात ने अपना कहर इस प्रकार बरसाया कि इससे अनेक प्राणी प्रभावित हुए और निचले जिलों में भी कसर नहीं छोड़ी। पिछले कई वर्षों की बजाए इस वर्ष की बरसात ने सम्पूर्ण हिमाचल को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे कई लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। कहीं मकानों पर मलवा गिरा तो कहीं एक ही परिवार के सात-आठ से अधिक लोग दबे, कहीं पालतू पशु दबे तो कहीं नदियों के तेज बहाव में लोगों के आशियाने बहे, इस प्रकार का खौफनाक मंजर हिमाचल में इस वर्ष देखने का मिला। समय के साथ-साथ परिस्थितियों में भी अवश्य ही परिवर्तन होता है, क्योंकि परिवर्तन ही सृष्टि को नियम है। परिवर्तन होने आवश्यक भी है परन्तु वर्तमान में जो हो रहा है वह अधिकतर मानव भूल के कारण ही है। कहा जाता है कि संसार के सभी प्राणियों में से केवल मनुष्य ही है जिसे सोचने-समझने की शक्ति प्राप्त है। उसे सृष्टि का वरदान बुद्धिमता प्राप्त है। वही मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु अनेक प्रकार की सुख सुविधाएं जुटाने का प्रयास करता है। अपने हित की कामना, आदर्शों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अन्य मनुष्यों से सहायता भी प्राप्त करता है। कई मनुष्यअपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए बहुत बार घोर पाप करते हैं। ऐसे पाप जिनकी उन्हें भविष्य में परिणाम की चिंता नहीं होती। जब वह परिणाम सामने आते हैं तो दूसरे लोग ही उनके अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में चर्चा करते हैं। यह जो अनेक प्रकार की आपदाओं का सामना समाज के सभी लोगों को करना पड़ता है, इसका कारण मानव भूल ही है। इसका दण्ड भी अवश्य ही भुगतना पड़ता है। आज यदि गहन विचार किया जाए तो शिमला जैसे पहाड़ी शहर में ऊँची व उबड़-खाबड़ पहाड़ियों को खोद कर छः-सात मंजिलों के भवनों का निर्माण क्या उचित है? नालों के समीप कच्ची मिट्टी पर पाँच-छः मजिलों के भवनों का निर्माण उचित है? उचित नहीं है। केवल अपने कारोबार चलाने एवं किराएदारों से किराया वसूली के लिए इन बहूमुजिले भवनों का निर्माण बिल्कुल भी उचित नहीं है। करोड़ों रुपए खर्च करके, अपने सम्पूर्ण जीवन का संघर्ष और मेहनत दाव पर लगाकर तैयार किया गया भवन जब नष्ट होने की कगार पर आता है तो अत्यन्त पीड़ा महसूस होती है। इतना ही नहीं जब वही भवन गिरकर अनेकों अनमोल जीवन नष्ट करता है तब उस पीड़ा का अनुमान लगाना भी खौफनाक होता है। आज शिमला के अधिकतर क्षेत्रों में बने भवनों की ऐसी स्थिति है कि यदि एक भवन को गिरने का खतरा है तो उसके साथ कई भवन खतरे की चपेट में आ रहे हैं और भविष्य में भी कई भवन खतरे की चपेट में आने की सम्भावना है। ऐसे हादसों को देखकर क्या आज भी बहुमंजिले भवन निर्माण करने वालों की रुह नहीं कांपती? हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है। शिमला ही नहीं अन्य जिलों में भी कई भवनों का निर्माण खतरनाक स्थानों पर किया गया है। कहीं ऊँची पहाड़ियों पर तो कहीं नदियों के किनारे भवनों का निर्माण किया गया है। यह सूझ-बूझ केवल मानव की ही है अन्य प्राणी की नहीं। खतरनाक स्थानों पर बहुमंजिले भवनों का निर्माण करने वाले करोड़पतियों को इस वर्ष की त्रासदी याद रखनी होगी, नहीं तो अनेकों अनमोल जीवन उनकी भूल के कारण नष्ट हो जाएंगे। उन्हें यह भी याद रखना होगा कि करोड़ तो बहुत दूर की बात है, एक हजार, लाख रुपए कमाने में भी उनका कितना समय और संघर्ष व्यय होता है। छोटी-छोटी धनराशि को जमा करके, बैंकों से लाॅन लेकर बहुमंजिले भवनों का निर्माण करते हैं, जिसके वे स्वयं ही साक्षी हैं। ज़रा उस समय को याद किया जाए जब एक या दो मंजिल बने भवनों में सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता 15 से अधिक लोगों का परिवार भी एक साथ रहता था। तब मानव छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति होने पर सन्तुष्ट था। पाँच, छः से अधिक भाई-बहन होते थे। आज इकलौता बेटा या बेटी उनके लिए भी कई मंजिल ऊँचे भवनों का निर्माण किया जाता है। कई लोगों की आवश्यकताएं इतनी है कि बहुमंजिले दो-तीन भवन बनाकर भी सन्तुष्ट नहीं है। इसी का परिणाम आज कई बेकसूर लोग भी भुगत रहे हैं। 14 अगस्त, 2023 को शिमला के समरहिल स्थित शिव मन्दिर में हुए भूस्खलन को देखकर शिमला ही नहीं बल्कि अन्य कई क्षेत्रों के लोगों की रुह कांप उठी। इस हादसे को देखकर कई लोगों ने कहा कि हम कहते हैं- ‘ईश्वर है’ परन्तु ईश्वर है ही नहीं। ऐसा कहने वालों ज़रा सोचो, ईश्वर नहीं होते तो जो भूस्खलन मन्दिर के ऊपर हुआ वह यदि दस-पन्द्रह मीटर समरहिल की तरफ होता तो कितने भवन गिर जाते, कितनी जानें नष्ट होती? ज़रा सोचिए! हम ईश्वर को दोष देते हैं, उसे ही कोसते हैं, जबकि हमें उससे पहले अपने से हुई भूलों को भी याद करना चाहिए। हाँ, उस दिन ईश्वर के घर में मौत का तांडव हुआ था। वह बहुत ही पीड़ादायक मंजर था। एक पूरा परिवार जिसमें तीन पीढ़ियाँ समाप्त हो गई। अन्य बेकसूरों ने भी अपनी जानें गंवाई। पूरे चार दिनों के बाद भी कई मृतक लापता थे। सम्पूर्ण समरहिल क्षेत्र शोक में डूब गया। मृतक जो किसी के रक्त सम्बन्धी नहीं थे, फिर भी उनके प्रति लोगों की संवेदना ने यह प्रमाण दिया कि मानवता आज भी जीवित है। ऐसे हादसों को देखकर एक कठोरहृदयी मनुष्य भी करुणा से भर जाता है। स्थानीय लोगों ने मलवे में दबे लोगों को बचाने का हर सम्भव प्रयास किया। हिमाचल सरकार के वरिष्ठ मंत्रीगण एवं अन्य उच्चाधिकारियों ने बालूगंज से शिव बावड़ी नामक स्थान पैदल चल कर उस हादसे में पीड़ितों के दुःख में शामिल होकर उनके दुःख को कम करने के हर सम्भव प्रयास किए। तत्काल निर्णय से पुलिस, आर्मी, एन.डी.आर.एफ., एस.डी.आर.एफ., होमगार्ड इत्यादि को तैनात किया गया। इन सभी ने मलवे में दबे लोगों को जीवित निकालने के भरपूर प्रयास किए। हिमाचल प्रदेश वर्तमान सरकार के ही नहीं बल्कि पूर्व सरकार के वरिष्ठ मंत्री एवं नेतागण भी पीड़ितों के दुःख में शामिल हुए। यह मानव सेवा ही तो मानवता है। भूल कहीं न कहीं मानव की ही है।यदि मानव भूल नहीं है तो पहले ऐसे हादसे क्यों नहीं होते थे? मन्दिरों में पवित्रता का ध्यान रखना अति आवश्यक है। जिनसे शराब पीए बिना नहीं रहा जाता उसके लिए घर बनाए गए हैं और बीयरबार इत्यादि मन्दिरों के आस-पास गन्दगी फैलाने से बुरा परिणाम ही भुगतना होगा। सूतक-पातक एवं दाम्पत्य सम्बन्धों की अपवित्रता में ईश्वर को स्पर्श करने पर भी बूरे ही परिणाम भुगतने होंगे। महावारी के समय स्त्री पाँच दिनों तक अपवित्र और सातवें दिन पवित्र होकर पूजा करने योग्य होती है, यह सत्य है परन्तु आजकल की मॉडर्न स्त्रियाँ यह मानने को तैयार नहीं। ‘ऐसा कुछ नहीं होता’ यह कह कर ऐसी स्त्रियाँ अपने परिवार को विनाश की ओर ले जाती हैं। अपने घर-बाहर की स्त्रियों को भी परिवार के विनाश का कारण बनाती हैं। ईश्वर हमारे घरों में हों या मन्दिरों में, वे पवित्र हैं। उन्हें पवित्रता ही पसन्द हैं, अपवित्र करने वालों की वजह से कई बेकसूरों को भी इसके बुरे परिणाम झेलने पड़ते हैं। देव आस्था की यदि बात की जाए तो आज भी हिमाचल ‘देवभूमि’ ही कहलाई जाती है। यहां हर गाँव में स्थानीय देवता का मन्दिर अवश्य बना है। स्थानीय लोगों की देवी-देवताओं के प्रति आस्था है। सभी ग्रामीण पवित्रता का भी पूर्ण ध्यान रखते हैं जो आवश्यक भी हैं। उसी का परिणाम है कि कोरोना जैसी महामारी देवभूमि हिमाचल के लोगों को अधिक नुकसान नहीं पहुंचा पाई। ज़रा याद किया जाए उस कोरोना काल को जिसने करोड़ों जीवन नष्ट किए थे। हिमाचल के बाहरी राज्यों एवं अन्य देशों में भयानक त्रासदी थी। जीवित लोगों की सांसो भी जैसे चन्द घड़ी की दौलत थी। आज के हालातों को देखकर तो लगता है कि लोग बहुत जल्दी कोरोना काल को भूल गए। वर्ष 2020 की ही तो बात है, इतना जल्दी भूल गए? कोरोना काल तो उन्हें याद होगा जो दो वक्त की रोटी के लिए कई घंटों पंक्तियों में खड़े रहकर एक-एक किलो आटा और चावल लेते थे। एक तरफ शहरों में किराए के मकानों में रह रहे किराएदारों को मकान मालिकों द्वारा तंग किया जाता था। ऐसे मकान मालिक तो बहुत कम थे जिन्होंने गरीब किराएदारों से उस काल में किराया न लिया हो। शायद भूल गए कोरोना काल, तभी तो आज रोटी मंहगी कर दी, जिसके बिना जीवन चलेगा ही नहीं। कैसे मंहगी हुई, क्या कारण है? यह तो वही लोग जानें जिनको मासिक वेतन अच्छा मिलता है। जिनका मासिक वेतन बहुत कम है वे महंगाई का कारण नहीं जानते, उन्हें तो यही चिन्ता है कि इतने कम वेतन से कैसे पूरा महीना बीतेगा? रोटी के बिना कैसे जीवन चलेगा? पेट भरना ही तो बहाना है, इसी बहाने तो कई बड़े-बड़े अधिकारी और अन्य उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर गरीब लोगों का शोषण कर रहे हैं। कई बड़े-बड़े कारोबारी और अन्य व्यक्ति कामगारों को कम वेतन देकर उनकी भूख से खेलते हैं। काम और वेतन दोनों अपनी ही मुट्ठी में रखते हैं। स्वयं को लाख-करोड़पति होने पर भी सन्तुष्ट नहीं और एक गरीब को उसकी मेहनत के अनुसार वेतन देने को तैयार नहीं? वे लोग कैसे महंगाई को समझ सकेंगे? आरक्षण के कारण विवश एक योग्य व्यक्ति का अयोग्य के सामने हाथ जोड़कर खड़े रहना क्या उचित है? क्या यह मानव भूल नहीं है? अत्यधिक सड़कों का निर्माण भी प्रकृति को ललकार रहा है। आज जो पहाड़ों को खोद कर बड़े-बड़े निर्माण किए जा रहे हैं यह भी विनाश के संकेत ही हैं। आज आवश्यकता है पहले से बनी सड़कों को ठीक करने की। इस पहाड़ी राज्य की कच्ची सड़कों में बने ऊँचे-नीचे गड्ढे जिनके कारण कई दुर्घटनाएं होती है उन्हें ठीक करने की। जब भी कोई नव निर्माण जैसे भवन, सड़कें इत्यादि और रख-रखाव का कार्य हो उस समय सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों को अवश्य ही निरीक्षण करना चाहिए और उचित दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य करवाना चाहिए। साथ ही आवश्यकता है मानव भूलों को सुधारने की। यदि इस देवधरा में मानव भूल के कारण इसी तरह पाप बढ़ता गया तो उसके भयानक परिणामों को भोगने के लिए भी तैयार रहना होगा।
सरला शर्मा, लेखिका
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