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सतलुज घाटी क्षेत्र में दो दिवसीय आषाढ़ संक्रांति (साजी साढ़) देवोत्सव शुक्रवार को संपन्न

डाॅ. जगदीश शर्मा, पांगणा

च्वासीगढ की पहाड़ियों के आंचल में बसा तेबन वाकई करसोग के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है। इतिहासकार और साहित्यकार डाॅक्टर हिमेंद्र बाली “हिम” और संस्कृति मर्मज्ञ हितेन्द्र शर्मा का कहना है कि तेबनी महादेव का मंदिर पुरातात्विक धरोहरों का अनमोल खजाना है।साल भर की सक्रांतियों मे “साजी” आषाढ़ मनाने की विशिष्ट परम्परा सबसे अलग ही है।

तेबनी महादेव आषाढ़ संक्रांति के दिन पूर्वाह्न रथारूढ़ हुए। सारे क्षेत्र के लोग महादेव के साथ कोट पद यात्रा के लिये मंदिर परिसर में इकट्ठे हुए।अपराह्न अढाई बजे महादेव का रथ मंदिर से वाद्ययंत्र की मधुर ताल पर निकला। महादेव के गूर व अधीनस्थ देव रक्सेटा, डबराची व सिद्ध आदि देवों के गूर रथ के साथ कोठी तक आए। यहां महादेव के गूर ने मंदिर में आवेशित अवस्था में प्रवेश किया। फिर महादेव मंदिर के साथ अपने खेत में नृत्य किया। यहीं ग्रामवधुओं ने महादेव के रथ पर मोड़ी व अखरोट का वर्षण कर आशिष प्राप्त किया। यहीं महादेव ने लोगों के दुखों का निवारण भी किया।

महादेव के मंदिर में इस दिन प्रत्येक परिवार ने नये अन्न को देवता को अर्पित किया। चवासी गढ़ के अंतर्गत तेबनी महादेव रथारोहण कर अपने पावन धाम से सतलुज नदी के किनारे कोट स्थान पर रात्रि पर्यन्त विराजित रहे। महादेव की शवाठी के सभी लोगों ने अपने साथ अपने-अपने घर से बनाकर लाए भोजन को लेकर खुले आकाश के नीचे रात्रि विश्राम कर इसे ग्रहण किया। उधर कोट के साथ बहती कोटलु सरिता के दायीं ओर बगड़ा गढ़ के अंतर्गत नांज में धमूनी नाग रात्रि को विराजित हुए।य हां लोग अपनी मनौति को पूर्ण करने के लिये खुले आकाश के नीचे रात्रि व्यतीत की।

सांय महादेव तेबनी व नाग धमूनी की अपने स्थान से ही वाद्य यंत्रों की धुन पर मिलन हुआ। इसी दिन नांज के साथ लगते गांव मुमला में खन्योल बगड़ा के देव हवाहड़ी और नांज के देव तुंदली ने भी रात्रि प्रवास किया। शुक्रवार प्रात: वैदिक नदी सतलुज नदी के जल से देवों का अभिषेक सम्पन्न हुआ। आषाढ़ संक्रांति को प्रत्येक घर से नये अन्न का पहला भाग “राश्” देवताओं को भेंट किया गया।तथा अपनी मन्नौतियां अर्पित की। शुक्रवार को देव कोठियों को लौटने के साथ ही “साजी” आषाढ की देव परंपरा का हर्षोल्लास से समापन हो गया।

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