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आत्मकल्याण एवं विश्व-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है संस्कृतभाषा- मोनिका ठाकुर

श्रावणी पर्व ऋषियों के स्मरण तथा समर्पण का पर्व – डॉ मनोज शैल

विश्वभर में संस्कृतसप्ताह का आयोजन अत्यन्त उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इसी क्रम में मण्डी जिला की राजकीय उच्च पाठशाला बिजन-ढलवान में शनिवार को संस्कृत सप्ताह के उपलक्ष्य पर विविध गतिविधियों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ कक्षा छठी की छात्रा मुस्कान ने वैदिक मन्त्रोच्चारण के साथ किया तथा कक्षा नवमी की छात्राओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। जिसमें छात्रों ने विद्या विनयेन शोभते तथा विद्या ददाति विनयम् इन विषयों पर विद्यालय की 10 वीं की छात्रा समीक्षा और आठवीं के छात्र गौरव ने संस्कृत में भाषण दिया। इसके साथ वर्षा, गुंजन एवं मुस्कान ने श्लोकोच्चारण तथा मानसी एवं गौरव ने एकल संस्कृत गीत प्रस्तुत किया। कक्षा छठी के छात्रों ने पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षों के महत्व को बताते हुए सामूहिक संस्कृतगीत वने वने निवसन्तो वृक्षा: वनं वनं रचयन्ति वृक्षा: प्रस्तुत किया। कक्षा आठवीं के छात्रों ने जीवन में सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा हेतु चल चल पुरतो निधेहि चरणम् सदैव पुरतो निधेहि चरणम् संस्कृत गीत प्रस्तुत किया।विद्यालय के छात्रों ने विविध प्रकार के संस्कृत से सम्बन्धित चार्टों का निर्माण किया। विद्यालय की मुख्याध्यापिका मोनिका ठाकुर ने छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि हम कुछ भी अध्ययन कर लें। लेकिन संस्कृत के विना अपूर्ण हैं। आत्मकल्याण एवं विश्व-कल्याण का मार्ग संस्कृत के द्वारा ही प्रशस्त है। अतः संस्कृत सप्ताह हमें अपनी संस्कृति एवं उसके मूल संस्कृत से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

हिमाचल राजकीय संस्कृत शिक्षक परिषद् के प्रदेशाध्यक्ष तथा राजकीय उच्च पाठशाला बिजन-ढलवान के संस्कृत शिक्षक डॉ मनोज कुमार शैल ने संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान के स्वरूप एवं आदर्श जीवन की परम्पराओं पर प्रकाश डाला। इसके साथ श्रावणी पूर्णिमा को भारत में संस्कृत दिवस मनाने के विषय पर उन्होंने कहा कि श्रावणी पूर्णिमा अर्थात् रक्षा बन्धन ऋषियों के स्मरण तथा पूजा और समर्पण का पर्व माना जाता है। वैदिक साहित्य में इसे श्रावणी कहा जाता था। इसी दिन गुरुकुलों में वेदाध्ययन कराने से पहले यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। इस संस्कार को उपनयन अथवा उपाकर्म संस्कार कहते हैं। इस दिन पुराना यज्ञोपवीत भी बदला जाता है। ब्राह्मण यजमानों पर रक्षासूत्र भी बांधते हैं। ऋषि ही संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत हैं, इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को ऋषि पर्व और संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। राज्य तथा जिला स्तरों पर संस्कृत दिवस आयोजित किए जाते हैं। इस अवसर पर संस्कृत कवि सम्मेलन, लेखक गोष्ठी, छात्रों की भाषण तथा श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है, जिसके माध्यम से संस्कृत के विद्यार्थियों, कवियों तथा लेखकों को उचित मंच प्राप्त होता है। सन् 1969 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के आदेश से केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश जारी किया गया था। तब से संपूर्ण भारत में संस्कृत दिवस श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। वर्ष 2000 में संस्कृत भाषा को समर्पित संस्कृतवर्ष घोषित किया गया था और उस वर्ष पूरे देश में वर्षभर संस्कृत के अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इसके बाद श्रावणी पूर्णिमा के तीन दिन पूर्व एवं तीन दिन बाद तक संस्कृत सप्ताह मनाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया। अब राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत सप्ताह का आयोजन एवं विश्व स्तर पर श्रावणी पूर्णिमा को विश्व संस्कृत दिवस का आयोजन किया जाता है। हमारा सौभाग्य है कि देश के प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में भी विश्व संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं दी तथा संस्कृत की महिमा पर प्रकाश डाला।इस अवसर पर विद्यालय के शिक्षक पुनीत गुप्ता, कुलदीप राणा, जीवन लाल, अंजलि शर्मा, पिंकी शर्मा, ममता शर्मा, सुमन ठाकुर, ऊषा शर्मा एवं ऊषा गुलेरिया उपस्थित रहे।

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