परशुराम की सिद्ध शक्तिपीठ काओ-ममेल में यूर्व भारतीय प्रशासनिक युगल श्रीधर ने लिया आशीर्वाद तथा करसोग में हुआ गर्मजोशी से स्वागत
हितेन्द्र शर्मा, करसोग
सुकेत की वैदिक व पौराणिक भूमि में करसोग का विशिष्ट सांस्कृतिक व ऐतिहासिक स्थान है।भार्गव गोत्र के प्रवर्तक भृगु ऋषि की तप:स्थली करसोग ऋग्वैदिक ऋषि विमल व अमल की तपोभूमि रहा है। करसोग शहर में 26 वर्ष बाद अपनी सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी पत्नी सहित पधारे भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी तरुण श्रीधर का करसोग वासियों ने विभिन्न स्थानों पर गर्मजोशी से स्वागत किया।
मुख्य बाजार में स्वर्गीय ओम प्रकाश भारद्वाज के परिजनों व व्यापारी व कर्मचारी वर्ग तथा पुराने बाजार में विनोद गुप्ता व परिजनों,श्री संतमत समिति मे एडी शर्मा,खजाना राम शर्मा,जितेन्द्र महाजन आदि भक्तों ,पदम श्री पुरस्कार से सम्मानित नेकराम शर्मा,तहसीलदार, नायव तहसीलदार कानूनगो,पटवारी वर्ग ने स्वागत किया।अपने सद्भाव और अपने सद्व्यवहार के लिए “पैदल चलने वाले जिलाधीश” के नाम से प्रसिद्ध समाज के हर वर्ग के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ रहे तरुण श्रीधर ने भी छोटों के प्रति स्नेह, समानों के प्रति प्रीति और बड़ों के प्रति सेवाभाव के लिए आभार व्यक्त किया तथा कामाक्षा और ममलेश्वर महादेव मंदिरों में मत्था टेक आशीर्वाद प्राप्त किया। उप-मंडल मुख्यालय करसोग से 6 किलोमीटर दूर काओ गांव में स्थित है।
कामाक्षा का यह मंदिर शक्ति की देवी सती को समर्पित है। यह कलात्मक मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर पर बना है। इस मंदिर का तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है।भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ हिमाचल के शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है।यह स्थान आदिकाल से ही अनेक चमत्कारों से भरपूर रहा है।यहीं भगवती की महामुद्रा बनी है जिसके दर्शन कोई नहीं कर सकता।इस महामुद्रा के बाहर माता महिषासुर मर्दिनी के स्वरूप मे निवास करती है।इस मुर्ति के ऊपर छोटा सा सुराख है,जिसे मोरी कहते हैं।इस छेद/मोरी से पृष्ठ भाग में स्थापित महामुद्रा के रुप में स्थापित महाकाली को थूप दिया जाता है। सुकेत रियासत के प्रमुख महाशक्ति स्थलों मे माता कामाख्या का यह मंदिर मघैरधार के आंचल में सुशोभित है। श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र एवं तंत्र- मंत्र, योग-साधना के सिद्ध इस स्थान की स्थापना भगवान परशुराम जी ने है। सुकेत के सेन वंशज शासकों की कुलदेवी कामाक्षा की श्रध्दापूर्वक पूजा-अर्चना करने से सांसारिक भव बंधन से मुक्ति मिल जाती है ।
सोमवार को पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी मनीषा श्रीधर और पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी तरुण श्रीधर ने कामाक्षा माता के दर्शन, पूजन कर आशीर्वाद लिया।इस अवसर यर मंदिर समिति की ओर से दोनों भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों को सरोपा भेंट किया गया।इस अवसर पर नायक तहसीलदार शांता शुक्ला, कानूनगो मोतीराम चौहान,संस्कृति मर्मज्ञ डाॅक्टर जगदीश शर्मा,विनोद गुप्ता,रवि चंदेल पुनीत कुमार,आशा शर्मा आदि भी उपस्थित थे। इन्द्र द्वारा भृगु ऋषि के तपश्चर्या को खण्डित करने के प्रयोजन से प्रेषित किन्नर बाला ममलेशा के नाम से ही ममेल नाम की व्युत्पति हुई।
ममलेशा व ऋषि भृगु की तेजस्वी पुत्र विमल व अमल ने वेदों के मंत्रों का प्रणयन करसोग धरा पर किया। यहीं भृगु ऋषि ने शिव की आराधना की। त्रेतायुग के प्रारम्भिक काल में परशुराम ने ममेल में महाकाल की आराधना कर इस नगरी को बसाया। लाक्षागृह की घटना के बाद पाण्डव कुन्ती सहित करसोग में रहे और महादेव की आराधना की।यहीं पाण्डवों ने अस्सी शिवलिंग प्रतिष्ठित किये जिन्हे आज भी यहां देखा जा सकता है। ममलेश्वर महादेव युगों से यहां का धर्म संस्कृति के केन्द्र में प्रतिष्ठित हैं।भारतीय प्रशासनिक सेवा के दोनों सेवानिवृत्त अधिकारियों ने ममलेश्वर महादेव के दर्शन के साथ 5160 वर्षों से जल रहे अखंड धूने,200 ग्राम के गेहूं के दाने और विशाल ढोल के भी दर्शन किए।