सतलुज घाटी में श्रावन मास में जिला मण्डी के सुकेत क्षेत्र व जिला शिमला के पूर्ववर्ती शांगरी की राजधानी बड़ागांव में शणचा मेले का आयोजन सम्बन्धित देवों की उपस्थिति में होता है. शणचा वास्तव में ऐसा देवोत्सव होता है जिसमें देव परम्पराओं के साथ-साथ लोकोत्सव का भी आयोजन होता है. श्रावन मास भगवान शिव की पूजा-अर्चना को समर्पित मास है. लोग शिव के निमित प्रत्येक सोमवार को उपवास रखकर अभीष्ट फल को प्राप्त करते हैं. सतलुज घाटी में रामगढ़ क्षेत्र के अंतर्गत पहले शणचा मेले का आयोजन 27-28 जुलाई तदनुसार 12 व 13 श्रावन को पोखी गांव में होता है. पोखी का शणचा मेला एक देव परम्परा से जुड़ी घटना का परिणाम है. तेबनी महादेव के गूर किशोरी लाल मैहता के अनुसार पोखी का क्षेत्र पूर्व में तेबनी महादेव के क्षेत्राथिकार में था. पूर्व में पोखी के समीप मझोट में पंदोई देव द्वारा मंदिर निर्माण किया जाने लगा. तेबनी महादेव ने पंदोई देवता को अपने क्षेत्र में अधिकार से रोकने के लिये रामगढ़ के देवाधिपति सोमेश्वर महादेव से गुहार लगाई. इस काम के बदले में सोमेश्वर महादेव ने तेबनी महादेव से तेबन के समीप समतल भूमि पेकवा का आधा भागा मांगा.परन्तु तेबनी महादेव ने सोमेश्वर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और बदले में पोखी का आधा भाग प्रदान करने का संकल्प लिया. सोमेश्वर महादेव वृष्टि के देव माने जाते हैं. घोर वर्षा कर सोमेश्वर महादेव ने पंदोई देवता की मझोट में कोटी बनाने के प्रयोजन को असफल कर दिया. अत: पोखी का आधा क्षेत्र सोमेश्वर महादेव को प्राप्त हो गया. इस ऐतिहासिक विजय पर तेबनी महादेव व सोमेश्वर महादेव ने तीसरे, पांचवें व सातवें वर्ष देव सम्मेलन शणचा मेले के आयोजन का निर्णय लिया. परन्तु पोखी में तेबनी महादेव के पास शणचा में बैठने का स्थान न रहा. अत: महादेव तेबनी ने सोमेश्वर महादेव से 80 रूपये में पोखी के समीप हरदोल-कोट का क्षेत्र प्राप्त किया. पोखी में गंगापुत्र भीष्म नाग रूप में प्रतिष्ठित है. परन्तु शणचा मेले में केवल तेबनी महादेव व सोमेश्वर महादेव ही ‘मेड़’ अर्थात् दिव्य मिलन कर लोगों को आशीष प्रदान करते हैं. इस बार 20 वर्ष बाद तेबनी महादेव पोखी सोमेश्वर महादेव से मिलन के लिये शणचा मेले मे सम्मिलित हुए. पोखी शणचा से जुड़ी देव परम्परा विशिष्टता लिये हुए है. शणचा से पूर्व 11 श्रावण को तेबन के शाड़ा गांव का ब्राह्मण व मंदिर का पुजारी सोमाकोठी सोमेश्वर देवता को पोखी शणचा में सम्मिलित होने का आमंत्रण देने पहुंचते हैं. तेबनी महादेव अपनी शवाठी के लोगों के साथ 11 श्रावण को पोखी की ओर प्रस्थान करते हैं. परम्परा यह भी है कि जैसे ही तेबनी महादेव तेबन के समीपस्थ पेकवा पहुंचते हैं तो यहां से सोमाकोठी व पोखी के मंदिर दृष्टिगोचर होते हैं. उस समय सोमेश्वर महादेव के देवलु यह अनुमान लगा लेते हैं कि तेबनी महादेव पोखी शणचा के लिये प्रस्थान कर चुके हैं।

तेबनी महादेव 11 श्रावन को पोखी पहुंचते हैं. उधर सोमेश्वर महादेव भी मिलन ‘मेड़’ के लिये नियत स्थान पर पहुंच कर ‘मेड़’ करते हैं. दोनों भाई नृत्य मुद्रा में गुरों की आवेशित अवस्था में आपस में मिलते हैं. तेबनी महादेव व सोमेश्वर महादेव भाई-भाई माने जाते हैं. दोनों देव पांच पाण्डवों में से दो भ्राता माने जाते हैं. अन्य भाई नीथर के बूढ़ा महादेव,बिनण के महादेव व ममेल के ममलेश्वर महादेव हैं. ‘मेड़’ की बेला के बाद सोमेश्वर महादेव पोखी गांव में रात्रि प्रवास के लिये प्रस्थान करते हैं. जबकि तेबनी महादेव हरदोल में विराजित होते हैं. अगामी दिवस 12 श्रावन को पूर्वाह्न हरदोल खड़ में देवखेल ‘झाड़ा’ का आयोजन होता है. इस उद्देश्य के लिये पोखी से महादेव सोमेश्वर को हरदोल खड़ में झाड़ा में आमंत्रित किया जाता है. हरदोल खड़ में दोनों देव भाईयों गूरों के माध्यम से आशीष प्रदान करते हैं. इसके बाद दोनों मेला स्थल पर विराजित होते हैं. शणचा मेले में बड़ी संख्या में लोग महादेव का आशीष ग्रहण कर कृतकृत्य होते हैं.सांय से पूर्व दोनों भाई देव नृत्य के बाद एक दूूसरे से विदा होते हैं. महादोव तेबनी अपने धाम तेबन व महादेव सोमेश्वर स्वधाम सोमाकोठी की ओर प्रस्थान करते हैं. पोखी का शणचा मेला दो भाईयों के दिव्य मिलन का प्रतीक है।
14 व 15 श्रावन को शिमला जिले की कुमारसैन तहसील में पूर्ववर्ती शांगरी रियासत की राजधानी बड़ागांव में शणचा मेले का आयोजन किया जाता है. बड़ागांव शांगरी में शणचा मेले का आयोजन राय हीरासिंह ने 1874 ई.में अपने राज्याभिषेक की स्मृति में आरम्भ किया. राय हीरा सिंह ने बड़ागांव के अतिरिक्त बाहरी सराज के आनी एवम् उर्टू में भी मेलों का आरम्भ किया. एक लोक मान्यता के अनुसार एक बार 18 व 19 श्रावन को राय हीरासिंह ने पारवीधार (बनाहर) में तेबन के पेकवाधार में आयोजित होने वाले शणचा मेले में वाद्य यंत्रों की ध्वनि को सुना. अपने मंत्री से पेकवा में इस आयोजन का प्रयोजन पूछा. तब मंत्री ने बताया कि सुकेत में तेबन के समीप महादेव तेबनी के जन्मोत्सव पर पेकवा में शणचा मेले का आयोजन हो रहा है. लोग महादेव के सानिध्य में लोकोत्सव मनाकर अपने इष्ट का आशीष पा रहे हैं. यदि आप चाहें तो शांगरी में भी इसी तरह का मेला आरम्भ कर लिजिए. यह सुन कर राय हीरासिंह ने तुरन्त शणचा मेला आरम्भ करने का संकल्प लिया. राय हीरा सिंह ने बड़ागांव में शणचा मेले के आरम्भ किये जाने की घोषणा की. राय हीरासिंह ने तेबन के पेकवा में आयोजित 18-19 श्रावण की शणचा से दो दिन पूर्व 14-15 श्रावण को बड़ागांव में भी शणचा मेले का आयोजन महादेव ब्रह्मेश्वर के सानिध्य में करने की घोषणा की. तभी से बड़ागांव में शणचा मेले का पारम्परिक आयोजन होता आ रहा है. ब्रह्मेश्वर देव बड़ागांव के आराध्य देव हैं जिनकी उत्पत्ति सतलुज के किनारे शगाई नामक स्थान पर बरगाल गांव के व्यक्ति के खेत में सपैला के व्यक्ति द्वारा हल चलाते हुए हुई. देवता का धात्विक विग्रह हल चलाते हुए औंधे मुंह पाया गया.औंधे मुह को स्थानील बोली में ‘तवाणा’ कहा जाता है. अत: तवाणा का विशेषण रूप तवाणसी स्थानीय बोली में होता है. अत: देव को तवाणसी भी कहा जाता है.

ब्रह्मेश्वर देव का श्रृंगार 13 श्रावण को आरम्भ हो जाता है. देव 14 श्रावण को छोटी शणचा में रथारोहित होकर मंदिर से बाहर आते हैं. यह परम्परा भी रही है कि ब्रह्मेश्वर देव के गुरू भाई पारवीधार के देव बानेश्वर भी शणचा में पधारते हैं.छोटी शणचा की संध्या को ब्रह्मेश्वर देव अपने देवरे में विराजत होते हैं.बड़ी शणचा के दिन ब्रह्मेश्वर देव पुन: मेला मैदान में विराजित होते हैं. दोपहर देव खेल के माध्यम से लोग देवता का आशीष ग्रहण करते हैं. अपराह्न देवता की उपस्थिति में माला नाटी नृत्य का भव्य आयोजन होता है. सबसे पहले कारदार नाटी का आरम्भ होता है. यानी देवता के मुख्य कारदार व अन्य पदाधिकारी देवता की रजत छड़ी को हाथ में उठाकर नाटी नृत्य का नेतृत्व करते हैं. तदोपरान्त सभी लोग नाटी नृत्य में सम्मिलित होकर लोकगीतों की मधुर स्वरलहरियों से आनंद की आभ को बिखेरते हैं. सूर्यास्त से पूर्व देवता के सानिध्य में गोपालकों की ‘ग्वालटु नाटी’ का आयोजन होता है. ग्वालटु नाटी के शणचा के अवसर पर आयोजन के पीछे ऐतिहासिक घटना का संदर्भ अंतर्निहित है. पूर्व में जब इस क्षेत्र में मवानों का राज्य था. उसी समय देवता के प्राकट्य के बाद ग्वाले दिन में अपने मवेशियों को चराने के उपरान्त अपने साथ मंदिर के निर्माण के लिये सामग्री भी एकत्रित करते रहे. अत: ग्वालों के प्रयास से ब्रह्मेश्वर देवता के आरम्भिक मंदिर का निर्माण सम्पन्न हुआ. वर्तमान में ब्रह्मेश्वर देवता के मंदिर का पार्श्व भाग यथावत रूप से स्थित है जिसे गोपालकों ने बनाया है. इस भाग को ग्वालटु का मंदिर ही कहा जाता है. मंदिर का अग्र भाग लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व सिरमौर की रानी बरमणी ने करवाया. अत: गोपालकों द्वारा मंदिर निर्माण के कारण शणचा में ग्वालटु नाटी की परम्परा चली आ रही है. सांय नृत्य के उपरान्त ब्रह्मेश्वर देव अपने मंदिर में विराजित होते हैं।
सुकेत क्षेत्र के चवासी गढ़ में अवस्थित तेबनी महादेव के जन्मोत्सव के रूप में 18-19 श्रावण को शणचा उत्सव को आयोजन किया जाता है. तेबनी महादेव की प्रतिष्ठा व आराधना पाण्डवों ने लाक्षागृह की घटना के बाद व अज्ञातवास काल में की थी. तेबन शब्द लोक मान्यता के अनुसार तपोबन का अपभ्रंश माना जाता है. तेबनी महादेव का प्राकट्य तेबन के उत्तर में सराहन नामक स्थान पर हुआ था. उस काल में सराहन को ‘शाठका’ अर्थात् साठ घरों की बस्ती कहा जाता था.18 श्रावण को महादेव का जन्मोत्सव मनाया जाता है. महादेव के जन्मोत्सव को मनाने के लिये लोग पांच या सात दिन पूर्व जौ को काष्ठ पट्टिका पर बीजते हैं. जन्मोत्सव के दिन जौ की डालियां (जरी) को सर्वप्रथम महादेव के विग्रह पर अर्पित किषा जाता हैं. सुबह महादेव के चलायमान धात्विक विग्रह को रथ में सुसज्जित कर देहरे के अंतराल क्षेत्र में प्रतिष्ठित किया जाता है. ब्राह्मण महादेव के जन्मदिन की आनुष्ठिनक पूजा करता है. नवग्रह पूजा,धातु दान व गऊ दान कर ब्रह्मण को प्रदान किया जाता है. इस दिन आगत सभी लोगों को खीर खिलाई जाती है. अपराह्न महादेव तेबनी रथारूढ़ होकर शणचा स्थल पेकवा के लिये प्रस्थान करते हैं. पहले दिन की पेकवा धार की इस देव यात्रा को ‘गट्टी चुगणा’ अर्थात् मेला स्थल की साफ-सफाई करना कहा जाता है. पेकवा पहुंचकर महादेव नृत्य करते हैं. लोग मेलास्थल की सफाई करते हैं ताकि मेले का आयोजन सुव्यवस्थित ढंग से हो सके. सांय तेबन लौटने से पूर्व अढाई फेरे नाटी नृत्य मंदिर के प्रमुख प्रबंधक व गूर द्वारा दिये जाते हैं. पहले दिन पेकवा से लौटकर महादेव कोठी के बायें किनारे दिवानखाने में विराजित होते हैं. यहीं रात्रि पर्यंत रहते हैं.सुबह महादेव देहरे में विराजित होते हैं.

दूसरे दिन 19 श्रावण को पूर्वाह्न देहरे में ‘झाड़ा’ सम्पन्न किया जाता है. महादेव व अन्य अधीनस्थ देव आवेशित अवस्था में लोगों को सुख-सौख्य का आशीष प्रदान करते हैं. तदोपरान्त भोजन करने के बाद महादेव तेबनी पेकवा की और प्रस्थान करते हैं. पेकवा में महादेव नृत्य के बाद अपने चौरा (थड़े) पर विराजत होते हैं. लोग जौ की लायी गई शाखाओं (जरी) को देवता को अर्पित करते हैं. तदोपरान्त जरी को लोग परस्पर आदान-प्रदान करते हैं.सांय महादेव नृत्य करते हैं. लोग नाटी नृत्य के माध्यम से आनंदोत्सव में सम्मिलित होते हैं. मंदिर के कारदार व गूर आदि नाटी का आरम्भ कर अढाई फेरे की रस्म पूर्ण करते हैं. अंत में सांय महादेव पेकवा से अपना धाम तेबन लौट आते हैं. इस प्रकार सतलुज घाटी में शणचा देवोत्सव परम्परा जहां श्रावण मास में शिवोपासना की द्योतक है वहीं अपने इष्ट के प्रति आस्थाभाव का भी प्रतिनिधित्व करती है. चूंकि श्रावण मास में वर्षा के जल से प्रकृति का श्रृंगार मनमोहक होता है. लोग अपनी फसलों का पहला अंश देवता को अर्पित कर धन-धान्य की अभिवृद्धि का आशीष भी इष्ट देव से प्राप्त करते हैं. जौ की शाखाओं (जरी) को देव के निमित चढ़ाकर वंशवृद्धि की कामना भी की जाती है. समग्रत: शणचा देवोत्सव देवोपासना के माध्यम से लौकिक व पारलौकिक सुख की अभीप्सा का पर्व है।
✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली, प्रधानाचार्य
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नारकण्डा
जिला शिमला हि.प्र. मो.7018674280