✍️ डॉ. कर्म सिंह
खेलों को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए, यह कहावत खिलाड़ियों के लिए और खेलों का आयोजन करने वाली संस्थाओं तथा प्रशासन के लिए अत्यंत जरूरी है। यदि खेल में राजनीति घुस जाएगी और खेलों का राजनीतिकरण वोट बैंक की सियासत के आधार पर होने लगेगा तो खेल भावना भी आहत होगी और खेलो के परिणाम भी सुखद नहीं होंगे।
खेल तो चलता रहेगा लेकिन निराशा और खींचतान के माहौल में न खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर पाएंगे और न ही राष्ट्र का नाम ऊंचा हो सकेगा। खेलों को जिला, प्रांत और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है जिसमें खिलाड़ी को पहले जिला स्तर पर प्रदर्शन करके प्रांत की टीम में आना होता है और फिर प्रांत में विजेता बनकर राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करके अंतर्राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने के लिए अपना दावा प्रस्तुत करना होता है इसी प्रक्रिया से गुजरता हुआ खिलाड़ी अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर एशियन गेम्स और ओलंपिक्स में भाग लेता है और जब वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतता है तो देश का झंडा ऊंचा होता है। राष्ट्रगान की धुन बजाई जाती है जिसे देख, सुनकर के देश के नागरिकों का उत्साह बढ़ता है उन्हें सम्मान प्राप्त होता है परंतु यदि किसी कारणवश इस प्रक्रिया में रुकावट आती है, खेलों का आयोजन बंद हो जाता है, समय पर टीमों का चयन नहीं हो पाता है और खिलाड़ियों को अभ्यास का मौका नहीं मिल पाता है तो उससे उनके प्रदर्शन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
कई मुकाबलों में निराशाजनक परिणाम सामने आते हैं जिसके लिए अकेला एक खिलाड़ी नहीं, पूरा का पूरा खेल तंत्र पूरी तरह से जिम्मेदार होता है। ऐसे ही आजकल जंतर मंतर पर देखने को मिल रहा है जहां कुछ नामी-गिरामी खिलाड़ी धरने पर बैठे हैं ।खाप पंचायतों, किसान आंदोलनों से जुड़े नेताओं आंदोलन जीवियों, कांग्रेस और आप जैसे राजनीतिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी से खिलाड़ियों का मनोबल तो मीडिया के सामने बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है परंतु खाप पंचायतों किसान आंदोलन के नेताओं कांग्रेस और आप जैसी राजनीतिक पार्टियों के दखल से यह आंदोलन भटकता हुआ दिख रहा है। खेल में राजनीति का दखल सामने दिख रहा है खेल की प्रक्रिया बंद हो गई है यह चिंता कम दिखाई दे रही है खेल को नीति के अनुसार जिला प्रांत राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के माध्यम से चयनित होने पर खेला जाए या कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों को सीधा ही एशिया और ओलंपिक में भेज दिया जाए खींचतान का आरोप-प्रत्यारोप और टकराव का विषय यही सामने आ रहा है जोकि दुर्भाग्यपूर्ण है।
खिलाड़ियों का भी यह कर्तव्य है कि वे राष्ट्र की खेल नीति का समर्थन करें, अनुशासन में रहें। अगर सरकार द्वारा उनको सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं तो वे भी नियमों का भी पालन करें और दूसरी तरफ खिलाड़ियों के चयन प्रक्रिया में खेल संघ और सरकार की ओर से पारदर्शिता दिखलाई जाए ताकि गांव के गरीब बच्चों को भी खेलों में अपना भाग्य आजमाने का मौका मिल सके और यह खेल कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों तक सीमित ना रहे तथा कोई भी विषय विवाद का कारण ना बन सके। जंत्र मंत्र के इस धरने प्रदर्शन में जहां महिला पहलवानों के साथ देश के लोगों की संवेदनाएं जुड़ी हैं और उनसे उनके साथ यदि किसी प्रकार का दुर्व्यवहार हुआ है तो उसके लिए उन्हें उचित न्याय मिलना चाहिए । इधर माननीय न्यायालय की दखलंदाजी से एफ आई आर हो चुकी है । दिल्ली पुलिस छानबीन कर रही है । उसकी रिपोर्ट सामने आने पर ही सच सामने आ सकेगा। सरकारी स्तर पर भी कमेटी का गठन करके मामले की सच्चाई सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। कड़वा सच है दूसरी ओर यह भी कड़वा सच है कि खिलाड़ियों और कुछ रसूखदार नेताओं की खींचतान में विगत 4 महीनों में कुश्ती से जुड़े सभी आयोजन स्थगित रहे हैं जिसका दुष्प्रभाव आगामी प्रतियोगिताओं में अवश्य देखने को मिलेगा।
वास्तव में यह एक बहुत ही संवेदनशील मामला है इसलिए सोशल मीडिया पर अनावश्यक ट्रोलिंग और पक्ष विपक्ष की बयानबाजी से खेल की भावना का जो रूप सामने आ रहा है वह किसी भी स्थिति में सुखद नहीं कहा जा सकता है । ऐसी परिस्थितियों में सरकार को इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तुरंत न्याय संगत निर्णय पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए ताकि समय पर खेलों का आयोजन हो सके। खिलाड़ियों को अभ्यास और प्रदर्शन का मौका मिल सके और देश के युवा खिलाड़ी तिरंगे का मान बढ़ा सके।
- डॉ. कर्म सिंह