मण्डी जिला की करसोग तहसील के अंतर्गत भनेरा पंचायत के थाच गांव के 101 वर्षीय सत्याग्रही हेतराम के 8 सितम्बर 2023 शुक्रवार को निधन से सुकेत सत्याग्रह के एक अध्याय का अवसान हो गया. सुकेत सत्याग्रह हिमाचल के प्रजामण्डल के आन्दोलन का एक ऐसा विप्लवकारी जनान्दोलन था जिसने यहां की रियासतों के भारत संघ में विलय का मार्ग प्रशस्त किया था. सुकेत रियासत की स्थापना 765 ई. में बंगाल से आये सेन वंशज वीरसेन ने पांगणा में की थी. सुकेत सतलुज व व्यास घाटियों में बसी रियासत थी जिससे अलग होकर 11वीं शताब्दी में मण्डी रियासत अस्तित्व में आई थी. सुकेत हिमाचल में आबाद उन रियासतों में अग्रणी थी जहां सर्वप्रथम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जनान्दोलन का सूत्रपात हुआ था. सन् 1862 ई. में सुकेत में दूम्ह नामक जनान्दोलन के माध्यम से लोगों ने रियासत की दमनकारी नीतियों के विरूद्ध आवाज उठाई थी. रियासत के तत्कालीन वजीर धुंगल ने निर्दोष लोगों व प्रतिष्ठित लोगों से दण्ड (जुर्माना) वसूला. वजीर के इस शोषणकारी कदम से चवासी गढ़ की जनता ने धुंगल वजीर को चवासी के किले में बारह दिनों तक बंधक बनाये रखा था. राजा के हस्तक्षेप से ही वजीर धुंगल को मुक्त किया गया.
सन् 1876 ई. में सुकेत की जनता ने राजा द्वारा मनमाने कर लादने के विरूद्ध जनान्दोलन भड़क उठा. लोगों का आक्रोश इतना बढ़ गया की करसोग क्षेत्र के रियासती कर्मचारी भागकर राजधानी सुन्दरनगर चले गये. जनता ने रियासती प्रशासन के आदेशों को मानने से इन्कार कर दिया. अंतत: ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप से 1876 का यह प्रचण्ड सुकेत सत्याग्रह शांत हो सका. वास्तव में 1876 का सुकेत सत्याग्रह पहला ऐसा असहयोगात्मक आंदोलन था जिसने शासक वर्ग की दमनकारी नीतियों के विरूद्ध जनता को उत्प्रेरित किया. सन् 1924 ई. में सुकेत में पुन: बेगार प्रथा के विरूद्ध वीर रत्न सिंह के नेतृत्व में जनान्दोलन की ज्वाला भड़क उठी. इस जनाक्रोश का आवेग इतना प्रचण्ड था की रियासत के कर्मचारियों ने पड़ोसी रियासत मण्डी व बिलासपुर में शरण ली. इस प्रकार 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से ही सुकेत की जनता ने रियासती शासन की जन विरोधी नीतियों का उत्कट विरोध किया. सन् 1947 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता मिलने के बावजूद हिमाचल की जनता रियासती दमन चक्र से मुक्त न हो पायीं. 8 फरवरी 1948 ई. को हिमालयन प्रान्त प्रोविजनल सरकार की स्थापना हुई जिसकी बैठक में हिमालयी रियासतों के भारत संघ में विलय का संकल्प धारण किया गया. चूंकि सुकेत का शासक प्रजामण्डल के प्रति सख्त था. दूसरे सुकेत में सत्याग्रह के लिये वातावरण व परिस्थितियां अनुकूल थीं. डॉ. यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व में सुकेत के 60-70 प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं के साथ तत्तापानी में बैठक हुई. इसी बैठक में सुकेत सत्याग्रह का कार्यक्रम निर्धारित किया गया. 18 फरवरी 1948 को सुकेत सत्याग्रह का आरम्भ हुआ. लगभग सौ सत्याग्रहियों ने तत्तापानी व फिरनू की चौकियों पर अधिकार कर लिया और जयघोष करते व मार्ग में लोगों को साथ में जोड़ते सांय करसोग पहुंचे. सुकेत सत्याग्रह के फूट पड़ने से पहले ही सुकेत के सत्याग्रही गांव गांव जाकर युवाओं को आन्दोलन में संगठित करने का प्रयास करते रहे. करसोग तहसील की भनेरा पंचायत के थाच गांव से सम्बंध रखने वाले हेतराम सुकेत सत्याग्रह के सक्रिय सदस्य रहे हैं. हेतराम का जन्म सन् 1922 में हुआ. वे देव मिस्त्री रहे और कामाख्या माता की काओ में प्राचीन पीठ के मंदिर के जीर्णोद्धार में हेतराम मुख्य राजगीर थे. हेतराम के अनुसार 1947-48 में सुकेत की जनता में रियासती शासन के प्रति भारी आक्रोश था. यहां अन्य रियासत की जनता की अपेक्षा जनचेतना अधिक थी. यही कारण था कि प्रजामण्डल के नेताओं ने सुकेत को प्रथम सत्याग्रह के लिये चुना था. महावन गांव का व्यक्ति मनोहरू एक जुझारू सत्याग्रही था. वह अन्य सत्याग्रहियों के साथ सुकेत के गांव गांव जाकर लोगों को आंदोलन में जोड़ता रहा. मनोहरू ने जब युवा हेतराम को देखा तो उस समय वे खेत में हल चला रहे थे. मनोहरू के आग्रह पर हेतराम ने काम छोड़कर तुरन्त सत्याग्रहियों के जत्थे में जुड़ गये. हेतराम की माता ने बेटे को जाने से रोका.परन्तु मुक्त संघर्ष भावना से भरे हेतराम भला मां का आग्रह कहां मानने वाले थे.
फिरनू व तत्तापानी की रियासती चौकियों पर सत्याग्रहियों ने अधिकार कर वहां अपने लोगों को तैनात कर लिया. जहां जहां से सत्याग्रही गुजरे वहां के गांव के लोग जत्थे में जुड़ते गये. तत्तापानी व फिरनू की दोनों शाखाओं के सत्याग्रही करसोग में वर्तमान में वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के स्थान पर जरोड़ादड़ में एकत्रित हुए.18 फरवरी की सांय सैंकड़ों सत्याग्रहियों ने करसोग पहुंचे कर यहां कार्यरत सभी रियासती कर्मचारियों को अपने अधीन कर लिया. हेतराम भी सत्याग्रहियों में एक थे और सत्याग्रहियों ने करसोग के पहाड़ी सर्कल पर अधिकार कर रात्रि में विजयोल्लास में तिरंगा फहराया.
हेतराम घर-परिवार छोड़कर एक विरक्त सत्याग्रही बन चुके थे. उनके अनुसार 19 फरवरी को लगभग चार हजार सत्याग्रही सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा पहुंचे और उन्होने राजधानी पर अधिकार कर लिया. अगामी दो दिन भारी बारिश के कारण सत्याग्रही पांगणा में ही रुके रहे. पांगणा में हेतराम को चवासी क्षेत्र से बड़ी संख्या में सत्याग्रही मिले. 22 फरवरी को बारिश के थम जाने के बाद सत्याग्रहियों का जुलूस भारत माता की जय व इन्कलाब जिन्दावाद के गगनभेदी नारों के जयघोष के साथ राजधानी सुन्दरनगर की ओर बढ़ा. जब सत्याग्रही जयदेवी पहुंचे तो वहां सुकेत प्रजामण्डल के अध्यक्ष वीर रत्न सिंह 1000 सत्याग्रहियों सहित जुलूस में शामिल हो गये. यहां घटित एक घटना का संदर्भ हेतराम ने प्रस्तुत किया. जब सत्याग्रही जयदेवी पहुंचे तो एक सत्याग्रही ने अपनी बंदूक से एक पक्षी को मार गिराया. अचूक निशाने की इस घटना को सत्याग्रहियों ने राजा पर विजय का शुभ संकेत मान कर उल्लास मनाया. यह मान्यता सत्याग्रहियों में व्याप्त हो गई कि जैसे पक्षी पर निशाना अचूक रहा वैसे ही सत्याग्रहियों का रियासत पर अधिकार करने का यह संघर्ष भी सफल होगा. जयदेवी से लगभग 25000 हजार सत्याग्रही 25 फरवरी 1948 को राजधानी सुन्दरनगर की ओर चले. जयदेवी से चलकर सत्याग्रही बनेड़ पहुंचे.यहां सत्याग्रहियों का सामना रियासत के सैनिकों से हुआ. सुकेत के राजा को जब सूचना मिली की उसके सैनिक भी सत्याग्रहियों के बढ़ते कदमों के आगे असहाय हो गई है तो उसने अपने दो पालतू शेरों को सत्याग्रहियों को रोकने के लिये छोड़ा. परन्तु सत्याग्रहियों ने शेरों को भी मौत की नींद सुला दिया. अब सत्याग्रहियों ने आगे बढ़कर राजा की राजधानी पर अधिकार कर लिया. राजा महल छोड़कर चला गया. सत्याग्रहियों ने राजा के सामने ही महल में ताले लगा लिये. इस प्रकार सुकेत के सत्याग्रहियों ने हिमालयी प्रांत की सुकेत रियासत पर अधिकार कर रियासतों के हजारों वर्षों के राज्य के अवसान का मार्ग खोल दिया. 26 फरवरी 1948 को चीफ कमीश्नर नागेश दत्त जालंधर से सेना सहित सुन्दरनगर पहुंचे. चीफ कमीश्नर ने सुकेत रियासत के भारत संघ में विलय की घोषणा की. इस प्रकार सत्याग्रहियों के नि:स्वार्थ सेवा-संघर्ष ने रजवाड़ाशाही की दासता से सुकेत को मुक्ति दिलाई. हेतराम की धर्मपत्नी 92 वर्षीय तवारसु देवी भी सुकेत सत्याग्रह के संघर्ष के उन दिनों के संस्मरण को सांझा करती हैं. तवारसु देवी ने उस समय प्रचलित सत्याग्रह पर बनाये गये लोकगीत की पंक्तियों को सांझा किया:
शाओटे लेजरा, मौंहे मनोहरूआ शिमलै लागे चढ़ाए,
रैत लागै डरदै आए गोए मनोहरू रे धज्जै,
मनोहरू हुआ मरणा रैता लै डा झगड़ा पाए l
अर्थात् मनोहरू सत्याग्रही ने सुकेत में लोगों को सत्याग्रह के लिये लामबंद किया. जब मनोहरू की मृत्यु हुई तो रैत अर्थात किसानों में झगड़ा पड़ा रहा. अर्थात् मनोहरू के आह्वान पर किसान आन्दोलित हुए और एक संगठित सत्याग्रह आंदोलन ने रियासती दासता से मुक्ति दिलाई.
हेतराम सत्याग्रह के सक्रिय सेनानी रहे. सुकेत सत्याग्रह के लिये जनचेतना अभियान से लेकर जनसंगठन व सुकेत सत्याग्रह आंदोलन के घटनाक्रम के हेतराम गवाह रहे. दस्तावेजों के अभाव में हेतराम का नाम स्वतंत्रता सेनानी की सूची में शामिल न हो सका. परन्तु हेतराम के रियासती शासन के विरूद्ध अपने नि:स्वार्थ योगदान को इतिहास सदैव याद रखेगा. हेतराम जैसे अनेक वीतराग स्वतंत्रता सेनानी का संघर्ष आज की युवा पीढ़ी के लिये उत्प्रेरक की भूमिका में है. हेतराम आजादी के बाद निरन्तर क्रियाशील रहे. अपने पुश्तैनी व्यवसाय राजगीरी के कार्य को पिछले दो-तीन वर्ष तक करते रहे. हेतराम का देहान्त 101 वर्ष की आयु में शुक्रवार 8सितम्बर 2023 को होने से सुकेत सत्याग्रह के एक अध्याय का अन्त हो गया. हेतराम जैसे गुमनाम वीरनायक व सत्याग्रह के नायक का राष्ट्र के लिये बलिदाल सदैव याद रखा जायेगा.
✍️ डॉ. हिमेन्द्र बाली