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हिमाचल के मंदिर काष्ठ वास्तुशिल्प के संरक्षण को समर्पित: मुंबई के आर्किटेक्ट स्वपलिन भोले और आर्किटेक्ट नेहा राजे भोले

✍️ डॉ. जगदीश शर्मा, पांगणा

गेयटी में लगी प्रदर्शनी में का भाषा कला संस्कृति विभाग के निदेशक पंकज ललित ने किया उद्घाटन, उमड़ी भीड़

शिमला ग्रीष्मोत्सव के अवसर पर मुंबई की सराहन संस्था द्वारा हिमाचल प्रदेश में मंदिर वास्तुशिल् : एक अध्ययन पर आधारित “फोटो जरनी” प्रदर्शनी का हिमाचल प्रदेश सरकार,भाषा,कला संस्कृति लिभाग और हिमाचल प्रदेश संग्रहालय के सहयोग से गेयटी थियेटर में आयोजन किया गया है।

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए निदेशक पंकज ललित ने कहा किइस प्रदर्शनी के माध्यम से प्रयास किया गया है कि इससे न केवल स्थानीय लोगों व पर्यटकों को हिमाचल की समृद्ध संस्कृति व विशिष्ठ वास्तुशैली के बारे में जानकारी मिलेगी बल्कि उन्हें इस प्राचीन धरोहर का संरक्षण करने तथा उसे बचाये रखने की भी प्रेरणा मिलेगी। निदेशक ने स्वप्निल भोले व नेहा राजे भोले के अथक प्रयासों व लंबे समय से किये जा रहे अनुसंधान की भूरी भूरी प्रशंसा की।

पंकज ललित के साथ संग्रहालय के डाॅक्टर हरि चौहान ने महाराष्ट्र की सराहन संस्था के आर्किटेक्ट के महत्वपूर्ण प्रयासों की प्रशंसा की।सूचना और जन संपर्क विभाग के सेवानिवृत्त वरिष्ठ संपादक विनोद भारद्वाज का कहना है कि इस फोटो यात्रा प्रदर्शनी में हिमाचल क्षेत्र में प्राचीन वास्तु शिल्प की बेजोड़ कारीगरी का झलक मिलती है। यह सच में हिमाचल भाषा व संस्कृति विभाग की प्रशंसनीय पहल है आशा है कि इस प्रदर्शनी के माध्यम से हिमाचल की समृद्ध धार्मिक धरोहर के प्रति पर्यटक,संस्कृति मर्मज्ञ,पुरातत्व प्रेमी और शोधकर्ता आकर्षित होंगे।

इतिहासकार और साहित्यकार डाॅक्टर हिमेंद्र बाली हिम का कहना है की हिमाचल का वास्तुशिल्प शैली की दृष्टि से चार शैलियों में विभक्त है।हिमाचल प्रदेश का काष्ठ वास्तुशिल्प वैज्ञानिक प्राविधि और प्रदेश की जलवायु के अनुरूप सिद्धांतों पर आधारित है।भाषा संस्कृति विभाग के निदेशक डाॅक्टर पंंकज ललित, आर्किटेक्ट स्वप्लिन और नेहा के प्रयास सराहनीय ही नहीं अपितु अनुकरणीय भी हैं।

पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्वर्गीय चंद्रमणी कश्यप पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डाॅक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि इस प्रदर्शनी को लगाकर विभाग ने पुरातत्व जागरुकता का बहुत बड़ा कार्य किया है।स्वपलिन, नेहा के इस श्रमसाध्य कार्य को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। चंडीगढ के संस्कृति मर्मज्ञ और धरोहरों को बचाने के लिए कृत संकल्प विरेन्द्र शर्मा वीर का कहना है कि महाराष्ट्र के मूल निवासी पेशे से वास्तुकार ,स्वप्निल भोले एवं वास्तुकार नेहा राजे भोले हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व की धरोहरों को सहेजने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। भाषा एवं संस्कृति विभाग तथा हिमाचल सरकार ने इन युवाओं के सार्थक प्रयास हेतु स्तुत्य साथ दिया है ताकि हमारी यह सदियों पुरानी धरोहर आने वाली पी पीढ़ियों को सदियों तक हस्तांतरित हो सके।यह प्रयास निश्चित ही भारत का गौरव बनेगा।

हिमाचल के वरिष्ठ इतिहासकार और साहित्यकार ओ.सी. हांडा ने कहा कि स्वप्लिन व नेहा की मेहनत,लग्न और संकल्प कों देखते हुए इस प्रदर्शनी के लिए साधुवाद। शिमला ग्रीष्मोत्सव के अवसर पर मुंबई की सराहन संस्था द्वारा हिमाचल प्रदेश में मंदिर वास्तुशिल्प: एक अध्ययन पर आधारित “फोटो जरनी” प्रदर्शनी के सहयोग के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार,भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक पंकज ललित व डाॅक्टर हरि चौहान का आभार व्यक्त किया। आर्किटेक्ट स्वप्लिन शशिकांत भोले व आर्किटेक्ट नेहा राजे भोले ने हिमाचल प्रदेश पर पिछले बीस वर्षों से किये जा रहे पुरातात्विक धरोहरों के शोध पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि वे मुम्बई स्थित वे स्कूल को आर्किटेक्चर के वास्तुकार हैं। वे सन् 2003 में पहली बार हिमाचल में सुकेत की ऐतिहासिक राजथानी पांगणा में स्थित महामाया के टावर शैली के दुर्ग/मंदिर के वास्तशिल्प का अध्ययन करने आये. पांगणा का दुर्ग मंदिर लगभग 1268 वर्ष पुराना है जो काठकुणी दीवारों से बना है. छ: मंजिला यह मंदिर इतने वर्षों के बाद भी उत्कृष्ट वास्तिशिल्प के कारण खड़ा है।

स्वपलिन भोले के अनुसार हिमाचल के काष्ठ मंदिरों में महज लकड़ी व पत्थर का प्रयोग हुआ है।अत: यह मंदिर सुदीर्घ वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है।यही कारण है कि यह मंदिर सहस्राब्दियों से आजतक सुरक्षित खड़े हैं।अत: दोनों वास्तुकारों ने हिमाचल के मंदिरों के दीर्घकालिक वास्तुशिल्प की तकनीक को सहेजने का संकल्प लिया है ताकि यहां के वास्तुशिल्प की मौलिकता को चिरस्थायी रूप दिया जा सके।नेहा राजे ने बंजार के टावर मंदिर चैहणी कोठी के क्षय होने पर चिंता जताई।उन्होने कहा कि चैहणी कोठी हिमाचल का सबसे ऊंचा टावर मंदिर है।यदि आंशिक रूप से मंदिर की मुरम्मत की जाये तो इस स्मारक भवन की आयु को बढ़ाया जा सकता है। वास्तुकारों ने चिंता जताई कि स्थानीय लोगों व मंदिर समितियोः द्वारा मंदिरों के नवीकरण या सौंदर्यीकरण के नाम पर मंदिर के मौलिक स्वरूप,उत्कीर्णत्व व वास्तुशिल्प के साथ छेड़छाड़ की जा रही है जो हिमाचल के कला इतिहास को बहुत बड़ा आघात है। मंदिरों के काष्ठ शिल्प की जो वैज्ञानिक तकनीक उस काल में प्रचलित थी उसे पुन:स्थापित कर इन धरोहर मंदिरों को आने वाली पीढ़ियों तक बचाया जा सकता है। इस शिल्प के संरक्षण के लिये मंदिर प्रबंधन के साथ साथ लोगों को भी प्राचीन कला के संरक्षण के लिये आगे आना होगा।

स्वप्निल शशिकांत भोले व नेहा राजे भोले ने हिमाचल प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश भाषा कला संस्कृति विभाग के सौजन्य से हिमाचल के प्राकृतिक सौंदर्य व मंदिरों की गेयटी थियेदर में एक जून से आठ जून तक प्रदर्शनी लगाई हैं।इस प्रदर्शनी के माध्यम से वे हिमाचल के मंदिरों के कला पक्ष को दर्शकों के समक्ष लाना चाहते हैं।दोनों वास्तुकार हिमाचल के लगभग बीस धरोहर मंदिरों व भवनों के शिल्प पर अपना शोध कार्य जारी रखे हुए है।बहरहाल दोनों वास्तुकार हिमाचल प्रदेश के विलुप्त होते काष्ठ वास्तुशिल्प के संरक्षण व इसके दस्तावेजीकरण का वीड़ा उठाकर इन धरोहरों को बचाने में निरन्तर लगे हुए हैं।इस छाया चित्र दीर्घा में हिमाचल के तीस विशाल चित्र दर्शकों का आकर्षण बने। अनेक दर्शकों ने इस कार्य से जुड़े आर्किटेक्ट स्वप्निल शशिकांत मोले और आर्किटेक्ट नेहाराजे भोले को बधाई दी। इस प्रदर्शनी में अर्की की महारानी यशोदा और धामी रियासत के कुंवर दुष्यंत सिंह सहित बहुत से राज परिवारों ने भी प्रशंसा की।

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