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Editorial/सम्पादकीय धर्म-संस्कृति साहित्य

सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अमृत काल

✍️ आचार्य डॉ. कर्म सिंह

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमा हमारा।

सृष्टि की संरचना के बाद जल का स्तर धीरे-धीरे नीचे होने पर सबसे पहले हिमालय क्षेत्र का भूभाग जल से बाहर जमीन के रूप में उभर कर सामने आया। इसके अनुसार वर्तमान सृष्टि हिमालय क्षेत्र में ही हुई। स्वामी दयानंद का यह मत है कि सबसे पहले त्रिविष्टप अर्थात् हिमालय क्षेत्र के तिब्बत में मानवीय सृष्टि हुई। इसके बाद जैसे-जैसे जलस्तर नीचे होता गया अन्य भूभाग भी पानी से बाहर निकल आए और उन क्षेत्रों पर भी मनुष्य की सृष्टि का विस्तार होने लगा। प्रकृति में जीव जंतु मनुष्य आदि समस्त प्राणियों की जीवन लीला प्रारंभ हुई। ईश्वर द्वारा उत्पन्न सभी प्राणी अपने-अपने गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार जीवन यापन करने लगे। प्रकृति ने सबको जन्म देने के साथ-साथ उनका पालन पोषण करने के लिए अन्य औषधीय वनस्पतियां जल वायु अग्नि आदि पदार्थ को उत्पन्न करके भोग के लिए उपलब्ध करवाया।

वर्तमान में भी एक तिहाई भाग जमीन है और तीन भाग समुद्र। अर्थात् जल अधिक है और जमीन कम। समुद्र के बीच सात द्वीप हैं। अतः पृथ्वी को सप्तद्वीपा कहा गया है। विभिन्न द्वीपों पर अलग-अलग देश, समुदाय, जातियां, वर्ग ,समुदाय बस रहे हैं, जहां उनकी अपनी-अपनी संस्कृति है। भारत की संस्कृति, सभ्यता और परंपराएं सबसे प्राचीन हैं और भारतवर्ष की पवित्र भूमि से ही दुनिया के विभिन्न देशों में मानव संस्कृति का विस्तार हुआ है। अतः भले ही कालांतर में देशकाल स्थिति की अनुकूलता में देशकाल एवं परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न संस्कृतियां पनपती रहीं परंतु उनका मूल कहीं न कहीं भारत की ही संस्कृति में जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि आज भी विभिन्न देशों में भारत की संस्कृति के अनेक चिन्ह प्राप्त होते हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, गीता, उपनिषद की परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत के अनेक प्रसंग विभिन्न देशों की पूजा पद्धतियों और संस्कृति में रचे बसे हैं, जो उन्हें भारत की मूल संस्कृति के साथ जोड़ने के लिए पर्याप्त हैं। इसीलिए वेद का मंत्र यही संकेत देता है सा संस्कृति या वै विश्ववारा अर्थात् भारत की संस्कृति विश्व में वरणीय एवं सर्वश्रेष्ठ है।

वेदों के विषयों में ज्ञान, विज्ञान, कर्म, उपासना प्रमुख हैं। पुरुषार्थ चतुष्टय के रूप में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्रतिष्ठा है। समाज को गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के अनुसार व्यवस्थित किया गया है। भारतीय संस्कृति में भौतिक, अध्यात्मिक उन्नति की पराकाष्ठा रही है। प्राचीन वैदिक लौकिक और समकालीन साहित्य में समाजशास्त्र, विज्ञान, राजनीति, अर्थ चिंतन आदि विभिन्न विषयों का प्रामाणिक विवरण उपलब्ध है जिसके आधार पर विदेशों में इसी ज्ञान परंपरा को आधार मानकर विभिन्न क्षेत्रों में उन्नति के मार्ग अपनाए हैं । भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को स्वीकार करते हुए अनेकों विदेशी यात्रियों ने यहां के साहित्य को अपने देश पहुंचाया। उन ग्रंथों के अनुवाद करवाए और अपनी-अपनी भाषाओं में भारतीय ज्ञान का पठन-पाठन करते हुए वैज्ञानिक उन्नति को प्राप्त किया।

इसके विपरीत कालांतर में भारत में विदेशी आक्रांताओं ने नालंदा और तक्षशिला जैसे महान भारतीय पुस्तकालयों को जलाया और यहां की सांस्कृतिक विरासत को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए अनेकों षड्यंत्र रचे परंतु भारतीय जन जीवन में संस्कृति और परंपराएं जुड़ी रहीं। भारत के लोगों ने श्रोत परंपरा से अपने ज्ञान को बचाए रखा और लोक साहित्य में गीत, गाथा आदि विभिन्न रूपों में अपने इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को जीवित रखने में भी समर्थ रहे। विदेशी आक्रमण कार्यो ने भारत की गुरुकुल प्रणाली को नष्ट करते हुए विदेशी शिक्षा नीति को अमल में लाया।

भारतीय संस्कृति में साहित्य तथा भाषा विज्ञान और व्याकरण की संरचना का कोई भी जोड़ नहीं है। संस्कृत, हिंदी और भारत की आंचलिक भाषाओं में उपलब्ध एवं प्रचलित शब्द संपदा किसी भी विदेशी भाषा के शब्दों से बहुत अधिक है। भारतीय ज्ञान परंपरा में उपलब्ध साहित्य दुनिया के समस्त साहित्य से भी बहुत बड़े आकार में उपलब्ध है। ब्रह्मांड सौरमंडल और खगोलीय ज्ञान तथा ज्योतिष शास्त्र के आधार पर गणना और फलादेश धार्मिक कर्मकांड, तीज, पर्व ,त्यौहार, धार्मिक अनुष्ठान विभिन्न देवी देवताओं की पूजा-अर्चना और योग प्राणायाम आदि साधनों के माध्यम से अध्यात्म की उन्नति का केंद्र भारतीय संस्कृति में ही निहित है जो आज भी विश्व समुदाय का मार्गदर्शन कर रहा है। भारतीय संस्कृति वसुदधैव कुटुंबुकम् की भावना से ओत-प्रोत है।

भारतवर्ष की मान्यताओं में मानव में मानवता का धर्म होना अनिवार्य है । प्रत्येक प्राणियों को जीवन जीने का अधिकार है और रहा प्रत्येक मनुष्य को अपने मन, बुद्धि ,आत्मा की उन्नति के लिए संयमपूर्वक जीवन जीने की सीख दी जाती है। इस जीवन में पुण्य कर्मों का अर्जन करते हुए पुनर्जन्म में भी मनुष्य के जीवन की लालसा भारतीय संस्कृति और परंपराओं का प्रमुख अंग रहा है। पुण्य और सत्य कर्मों के आधार पर स्वर्ग एवं सुख की प्राप्ति और पाप कर्म एवं असत्य आचरण से नरक अर्थात दुख की प्राप्ति भारतीय संस्कृति का मूल चिंतन है । स्वयं अन्न ग्रहण करने से पहले अन्य प्राणियों के भोजन की चिंता करना भारत में पारिवारिक संस्कृति की परंपरा है। प्राचीन भारत में युद्ध विद्या का कौशल, विमान शास्त्रों का निर्माण आदि ऐसे अनेक प्रसंग वर्णित हैं जो भारत की प्राचीन वैज्ञानिक उन्नति का प्रमाण है। भारत का पूरे विश्व में चक्रवर्ती साम्राज्य रहा है। भगवान श्रीराम द्वारा अश्वमेध महायज्ञ के माध्यम से सारे विश्व को विजय करने का प्रसंग भारत के सार्वभौम साम्राज्य का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।

भारतीय संस्कृति वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ,आरण्यक, रामायण, महाभारत ,गीता और पुराण आदि ग्रंथों पर आधारित है, जिनमें समस्त सत्य विधाओं का वर्णन उपलब्ध है‌ भारतीय संस्कृति जीवन के लिए एक उद्देश्य प्रस्तुत करती है कि हमें इस जीवन में दुखों पर संयमपूर्वक विजय करके सुख अर्थात् मुक्ति एवं मोक्ष के आनंद को प्राप्त करना है। प्रकृति पर विजय पाकर जीवात्मा द्वारा परमात्मा का दर्शन करना ही भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च लक्ष्य माना जाता है। यहां मान्यता है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद जन्म-जन्मांतरों के पुण्य कर्मों के बाद यह मनुष्य का तन प्राप्त होता है । इसीलिए मनुष्य के जीवन को प्राप्त करने के बाद भौतिक सुखों को भोगते हुए अंततः अध्यात्म को अपनाते हुए योगाभ्यास आदि के द्वारा मुक्ति को प्राप्त करना, यही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य कहा गया है। इसी के लिए सभी प्रकार का ज्ञान, विज्ञान, कर्म ,उपासना की साधना की जाती है । भारतवर्ष में प्राचीन काल में एक ईश्वर की उपासना की मान्यता रही है। कालांतर में ईश्वर के विभिन्न रूपों की सगुण उपासना के लिए विभिन्न देवी देवताओं की कल्पना की गई, जिनकी आराधना, पूजा -अर्चना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। भारतीय संस्कृति में अवतारवाद की परंपरा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, योगेश्वर श्री कृष्ण को विष्णु के अवतार माना गया है। शिव और शक्ति का समन्वय संसार को ऊर्जा प्रदान करने के साथ-साथ जीवन में शक्ति और उपासना अर्थात समर्पण की भी सीख देता है । धर्म को सर्वस्व मानकर अधर्म का त्याग करने की प्रेरणा दी जाती है।

भारतीय संस्कृति में धर्म का अभिप्राय सनातन संस्कृति , दर्शन, जीवन परंपरा और वैचारिकता है । धर्म अर्थात् निश्रेयस एवं मोक्ष की प्राप्ति। धर्म अर्थात्सदाचार । धर्म अर्थात् कर्तव्यनिष्ठा ।धर्म मायने प्रत्येक वस्तु को सत्य एवं विज्ञान की कसौटी पर कसते हुए व्यवहार में अपनाना। धर्म मायने वह आचरण जो मन ,बुद्धि ,आत्मा को पवित्र, निर्मल,उन्नत बनाता हुआ ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से मन, बुद्धि ,आत्मा को संयमपूर्वक जीवन यापन करते हुए मुक्त होने की साधना का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दृष्टि से सनातन धर्म सबसे प्राचीन ,सत्य ,व्यवहार और विज्ञान की कसौटी पर खरा उतारने वाला है । भारतीय सनातन धर्म व्यक्ति ,समाज, राष्ट्र और विश्व को एक परिवार मानते हुए सब की उन्नति चाहता है। सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुखभाग भवेत्। सब सुखी रहें। सब स्वस्थ हों। सब का कल्याण हो। किसी को भी दुख न हो , यह भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र है। अतः इस अमृत काल में सांस्कृतिक विरासत को दोहराने, समझने और अपनाने का प्रयास किए जाने का आह्वान है। हमारा अतीत गौरवपूर्ण रहा है। हमारा वर्तमान आत्मनिर्भर, एवं संस्कृतिनिष्ठ है। हमें अपना भविष्य चहुंमुखी विकास तथा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के समन्वय के साथ सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करने की प्रेरणा देने वाला है।

अमृत मंथन की इस बेला में सत्य, सत्य, पाप ,पुण्य के मर्म को विचार करने की आवश्यकता है। धर्म को जीवन के लिए अनिवार्य मानते हुए मत मतांतरों और मजहबी संकीर्ण एवं कुंठित विचारों को छोड़ने की आवश्यकता है। धर्म एक सार्वभौम सत्य है। धर्म विश्व के सभी मनुष्यों के लिए एक समान आचार संहिता प्रस्तुत करता है। धर्म मनुष्य का मनुष्य के साथ गैर विरोध बढ़ने की बात नहीं करता। जो आतंक ,अलगाव, लूटपाट का समर्थन करता है, वह कभी धर्म नहीं हो सकता । वह धर्म का ऐसा एक विकृत रूप है जो व्यक्ति, समुदाय के स्वार्थ और द्वेष पर निर्भर रहता है तथा अन्य मनुष्यों को आतंकित करता है। ‌ मन ,वचन, कर्म से सत्य धर्म परोपकार का व्यवहार ही भारतीय संस्कृति को अभिप्रेत रहा है और यही हमारा एकमात्र आदर्श है। अतः सनातन धर्म के गौरवपूर्ण इतिहास को अपनाते हुए वर्तमान में सत्यनिष्ठ होकर परिश्रम एवं समर्पण भाव को स्वीकार करते हुए उज्जवल भविष्य के निर्माण के लिए कटिबद्ध होने का संकल्प किया जाना आवश्यक है।

✍️ आचार्य डॉ. कर्म सिंह, शिमला

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