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Editorial/सम्पादकीय साहित्य

किराएदार : एक आत्मचिंतन

पापा! ये किराएदार कौन होते हैं? यही उसका प्रश्न था। मेरी बेटी जब पांच साल की थी और मैं उसे स्कूल बस में बिठाने जा ही रहा था कि रास्ते में चलते चलते बड़ी मासूमियत भरी आवाज़ में अचानक ही उसने यह प्रश्न पूछ कर मेरे मानसिक और बौद्धिक पटल पर चोट की। मैं उस समय तो उसके प्रश्न का ठीक से जवाब तो नही दे पाया क्यूंकि स्कूल बस आने ही वाली थी, लेकिन सारा दिन उसके प्रश्न का सटीक और सही उत्तर खोजता रहा।और मैं मन ही मन में खुद को कुरेदता रहा, खोजता रहा कि वास्तव में किराएदार कौन होते हैं। हालांकि उस समय तो मैंने सिर्फ यही कह कर उसे टाल दिया कि जैसे हम यहां लोगों के घर में पैसे देकर रहते हैं तो हम जैसे लोगों को किराएदार बोला जाता है। लेकिन किराएदार शब्द को सही ढंग से परिभाषित करना और नन्ही सी बच्ची के प्रश्न का सही उत्तर ढूंढना अब मेरे लिए पहाड़ जैसी चुनौती बन चुका था।

अपने काम पर पहुंचते ही मैं अपने साथियों से भी पूछने लगा कि ये किराएदार कौन होते हैं? सभी का उत्तर एक जैसा और स्वाभाविक था और वैसा ही था जैसा उत्तर मैंने अपनी बेटी को दिया था। अभी भी खुद के और अपने साथियों के उत्तर से मैं पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं था, मानो मेरी अंतरात्मा कुछ और गहनता में जा कर और भी बहुत कुछ खोजबीन करना चाहती थी। किराएदार शब्द के भावार्थ को कई भागों में मेरे मन ने विभाजित करना चाहा। केवल पैसे देकर किसी के मकान में कुछ समय के लिए रहने मात्र से ही किराएदार की परिभाषा सम्पूर्ण नहीं हो जाती। क्योंकि बहुत से शहरों में अच्छे खासे पैसे देकर भी किराए पर अच्छा मकान नहीं मिल पाता। उदाहरण के तौर पर मुंबई जिसे मायानगरी के नाम से भी जाना जाता है, में बहुत संख्या में लोग फुटपाथ पर सोते हुए दिख जाते हैं।

वैसे तो आदमी किराएदार होता नहीं लेकिन कई कारणों से किराएदार बन जाता है और बंद हो जाता है एक ऐसे पिंजरे में जो कभी उसका था ही नहीं। किराए का वो पिंजरा जिसमें किसी को भी जोर जबरदस्ती से नहीं धकेला जाता लेकिन हालात और मजबूरी एक अच्छे भले आदमी को किराएदार बना देते हैं। किराए पर आदमी बहुत से कारणों से रहता है, जैसे किसी दूसरे शहर में नौकरी पेशे के कारण, पढ़ाई लिखाई के कारण इत्यादि। सबसे ज्यादा जो लोग किराएदार होते हैं वो नौकरी पेशे वाले ही होते हैं। मेरे और मेरे परिवार के जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष अलग अलग किराए के मकानों में कटे हैं। परन्तु कुछ किराए किराए के मकानों से भावनात्मक लगाव रहते रहते हो ही गया, वहां की निर्जीव दीवारें भी मानों अपनेपन का अहसास करवाती हैं, और अब कभी भी समय मिलता है तो उन किराए के मकानों को देखने उनसे मिलने जरूर जाता हूं जिन्होंने मुझे बचपन से जवानी में प्रवेश करते देखा है। आपने भी देखा होगा की आज भी ब्रिटेन से नागरिक अपने पूर्वजों के मकानों को उनकी कब्रों को देखने उन्हें महसूस करने के लिए शिमला, डगशाई, डलहौजी चले आते हैं।

एक बार मैने भी अपने पिता जी के सामने अपने मन के भाव रखे, मैं भी अब जमीन खरीद लेता हूं तथा उस पर अपना मकान बना कर किराए के पिंजरे से मुक्त हो जाऊंगा। यह सुन कर पिताजी खुश नहीं हुए और न ही शोकित। उनके मुख से निकले शब्द बहुत गहराई वाले और जीवन का सार बताने वाले थे। उन्होंने मुझे उत्तर दिया की तुम्हारे पड़दादा के बनाए मकान में तुम्हारे दादा नहीं रहे, तुम्हारे दादा के बनाए मकान में मैं नहीं रहा और मेरे बनाए मकान में तुम लोग नहीं रह रहे हो, जब किसी ने किसी के साथ रहना ही नहीं है तो ये कंकर पत्थर किसलिए इक्कठे करने हैं, क्यों सबकुछ होते हुए भी इन झमेलों में फंसना है। जो जिंदगी है उसे अच्छे से जी लो बस यही है जीवन का सार। मकान तो ईंट और पत्थरों से बनाया जा सकता है लेकिन उसको घर के रूप में उसमें रहने वाले लोग ही करते हैं। मैं उनकी इस सलाह से बहुत प्रभावित हुआ। क्योंकि यही जीवन का सत्य है।

यही सब सोचते सोचते मैं किराएदार शब्द का विश्लेषण करने में डूबा हुआ था तभी बगल वाले घरों में से एक गीत की आवाज़ आई गीत के बोल वाकई में अद्भुत लग रहे थे मानो भगवान ने मेरी बेटी के प्रश्न का सही और सटीक उत्तर दे दिया हो। “जिन्दगी इक किराए का घर है, इक न इक दिन बदलना पड़ेगा, मौत जब तुझको आवाज़ देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा” कुछ ऐसे ही बोल इस गीत के रहे होंगे। बात केवल रात गुजारने भर की होती तो किसी भी मकान का शायद अस्तित्व ही न होता और न ही कोई अस्तित्व होता किसी मकानमालिक का न ही किसी किराएदार का। जिसका दिल जहां करता वह वहीं सो जाता और सुबह फिर अगले सफर पर निकल जाता। लेकिन बात जीवन बिताने की होती है। वह जीवन जो अपने आप में ही किराए का लगता है।

✍️ अनुराग शर्मा, शिमला।

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