डाॅ. जगदीश शर्मा
इस बात को सभी मनुष्य एक साथ मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं कि हमारी भारत भूमि साहित्य, गणित, दर्शन ज्योतिष वैद्यक आदि सभी विषयों में संपन्न होने के कारण पूरे विश्व में सिरमौर समझी जाती है। हिमाचल प्रदेश में सांस्कृतिक क्षितिज पर ऐतिहासिक नगरी पांगणा की संस्कृति व परंपराएं गौरवपूर्ण रही हैं। यहां पंच देवों व अन्य देवी-देवताओं,देव गणों की पूजा में प्रकृति पूजा मन्नोवाञ्छित फल और आरोग्य देने वाली मानी गई है।औषधीय गुणों से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त तुलसी का प्रयोग जन्म से मृत्यु तक होता है।आज पांगणा के हर घर मे तुलसी का शालिग्राम से विवाह संपन्न हुआ।घर के आंगन में तुलसी की क्यारी के पास गोबर से लिपाई कर तुलसी की क्यारी के चारों कोनों पर मालती की की टहनियां रोपी गई। तुलसी के नए पौधों पर लाल रंग की चुनरी,डोरी,चूड़ी,बिंदी आदि सुहागी चीजों से तुलसी का श्रृंगार किया। तत्पश्चात शालीग्राम को आदर पूर्वक हाथों में लेकर तुलसी का सात परिक्रमा की गई। थूप-दीप से पूजन पूर्ण होने के बाद देवी तुलसी व शालिग्राम की आरती कर ऋतु फल,दान दक्षिणा अर्पित कर और सभी ने उनसे सुख सौभाग्य की कामना की । पूजा संपन्न होने के पश्चात परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित किया गया।बड़े खेद का विषय यह भी है कि आधुनिकता के चक्कर में भारतीय समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से आधुनिक कहलाने वाले समाज की दृष्टि फिर गई है।फिर भी भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग के रुप में तुलसी सदैव पूजी जाएगी।