Himalayan Digital Media

Himalayan Digital Media

Editorial/सम्पादकीय News राजनीति

व्यवस्था परिवर्तन की चुनौतियां

हिमाचल प्रदेश में डॉ. यशवंत सिंह परमार, ठाकुर रामलाल, शांता कुमार, प्रो. प्रेम कुमार धूमल, वीरभद्र सिंह, जयराम ठाकुर आदि पूर्व मुख्यमंत्रियों के लंबे शासनकाल के बाद सुखविंदर सिंह सुक्खू को सत्ता मिली तो उन्होंने अपने शासन को व्यवस्था परिवर्तन का नारा दिया। ओपीएस के नाम पर सत्ता में आई सुक्खू सरकार को सुख की सरकार कहकर भी खूब प्रचारित किया गया। शासन में परिवर्तन की सोच को पुख्ता करने के लिए कुछ नजदीकी मित्रों को भी कैबिनेट का दर्जा देकर के महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई। रानी प्रतिभा सिंह मुख्यमंत्री बनती-बनती रही गई तो मुकेश अग्निहोत्री को भी डिप्टी सीएम बनकर ही संतोष करना पड़ा। यद्यपि विक्रमादित्य मंत्री बनाने में तो कामयाब हो गए परंतु चुनौतियां बनी रहीं।

कुछ विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर खुश करने के भी प्रयास हुए परंतु सरकार में भागीदारी ना मिलने पर जनता द्वारा भारी मतों से चुने गए कुछ विधायकों में अंदरूनी आक्रोश बना रहा। कुछ वरिष्ठ विधायकों को मंत्री न बनाए जाने पर भी खूब सियासत हो रही है। सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा तथा कुछ अन्य वरिष्ठ विधायक मंत्री बनने के लिए प्रयासरत रहे परंतु अभी तक कामयाब नहीं हो पाए। इसी बीच आठ महीने की सुख की सरकार में अब मंत्रियों के आपसी विरोधाभासपूर्ण बयान भी आने लगे हैं। विधायकों और मंत्रियों का आपस में वाकयुद्ध जनता में कतई अच्छा संदेश नहीं दे रहा है जिससे मुख्यमंत्री की छवि दांव पर है।

एक तरफ मुख्यमंत्री पर केंद्रीय नेतृत्व का दबाव बना हुआ है दूसरी तरफ मंत्रियों और विधायकों का आपसी मनमुटाव तथा प्राकृतिक आपदाओं के चलते अत्यधिक बारिश का कहर सड़कों का टूटना, मरम्मत के लिए लंबा इंतजार और आर्थिक अभाव से जूझता हुआ यह पहाड़ी प्रदेश सुख की सरकार के व्यवस्था परिवर्तन को नई चुनौतियां सामने खड़ी कर रहा है। यद्यपि इन आठ महीनों में केंद्र सरकार से भी किसी न किसी रूप में सहायता मिलती रही है परंतु कर्ज के बोझ तले दबे हुए इस पहाड़ी प्रदेश के लिए यह सहायता काफी नहीं है। सरकार जैसे ही अपने वित्तीय संसाधन बढ़ाने के लिए कुछ प्रयास करती है तो महंगाई बढ़ने का डर सामने आता है और धीरे-धीरे आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है जिससे विकास पर प्रतिकूल प्रभाव होना लाजमी है।

ओपीएस के बहाने सरकारी कर्मचारियों को खुश करके चुनाव जीत कर सत्ता तो प्राप्त हो गई है परंतु इन आर्थिक विषमताओं में प्रदेश को आगे ले जाना और विकास की गति को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। आने वाला लोकसभा का चुनाव तो सरकार के लिए एक सबसे बड़ी चुनौती है जिसमें सरकार की साख को बनाए रखना भी जरुरी रहेगा और अपने दल के विधायकों और मंत्रियों को भी एकजुट बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती रहेगी। अगर यह सब नियंत्रण से बाहर हो गया तो प्रदेश में आने वाले राजनीतिक समीकरण बिगड़ भी सकते हैं जिसका खामियाजा अंतत प्रदेश की भोली भाली गरीब जनता को ही भुगतना होगा। सरकार को व्यवस्था परिवर्तन के लिए इन चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति धरातल पर दिखानी होगी।

✍️ हितेन्द्र शर्मा
(पत्रकार एवं साहित्यकार)
कुमारसैन, शिमला, हि.प्र.

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *