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आधुनिकता के दौर में भाषा व संस्कृति को क्यों भूलता जा रहा है आज का युवा?

जिस दौर में हम आज प्रवेश कर चुके हैं वह दौर आधुनिकता का दौर है कहा जाता है जिसमें हम अपनी सुख सुविधाओं के लिए नई नई तरकीब ओर आधुनिकीकरण का प्रयोग करते हैं आमतौर पर हम लोग आधुनिकता का संबंध आधुनिक युग से समझते हैं, जबकि यह एक विशिष्ट अवधारणा की निर्णायक है। वास्तव में आधुनिकता हमें अज्ञानता एवं तर्कहीनता से मुक्त कराकर एक प्रगतिशील बौद्धिक मंच प्रदान करती है। इतना ही नहीं, यह हमें एक खुली स्वतंत्रता प्रदान करती है, जिसके द्वारा हम अपने बहुआयामी बौद्धिक विचार आसानी से दुनिया के सामने रखकर प्रायोगिक रूप से कुछ सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। परंतु आज हमारे सामने अहम सवाल यह है कि क्या हम सब आधुनिकता को सही मायने में आत्मसात कर रहे हैं.? क्या यह सच नहीं, कि ओछी आधुनिकता मानवीय मूल्यों की विध्वंसक बन गई है.?

आज आधुनिकता महज दिखावा, अश्लीलता, फूहड़पन और अज्ञानता में सिमटती नजर आ रही है। हम लोग अपने विवेक का प्रयोग किए बिना कुसंस्कृति एवं संस्कार को अपनाने की होड़ में जद्दोजहद कर रहे हैं, जोकि यह हमारे वर्तमान एवं भावी समाज के लिए अत्यंत घातक है।आज हम आधुनिकता के इस युग में अपनी बहुमूल्य संस्कृति ओर भाषा को खोते जा रहे हैं जिससे हम सबकी एक पुरातन पहचान ओर रूतवा क़ायम था आज हम ख़ुद अपने बच्चों को शहरों के दूर दराज अधिकांश निजी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने भैज रहें हैं जहां वह अपनी मात्री भाषा ओर संस्कृति से दिन प्रतिदिन होता जा रहा है जिसमें मेरे अनुभव अनुसार उस विधार्थी ओर आने वाले भविष्य का कोई दोष नहीं है क्योंकि हम ख़ुद ही आधुनिकता के इस दौर में एक दूसरे को देखकर पलायन करने ओर अपने संस्कार,संस्कृति ओर भाषा से दूर करते जा रहे हैं और हम भागम भाग के इस दौर में इतने चूर हो चुके हैं कि हमें भविष्य में इन बातो का अंदाजा नहीं है कि जब हम खुद ही अपने भविष्य को अपनी संस्कृति ओर भाषा से दूर करते जाएंगे तो हम किस बात को लेकर दुहाई ओर आशा आने वाले भविष्य से कर पाएंगे ,आज हम सभी क्षेत्र वासियों की कही ना कही अपनी संस्कृति ओर भाषा में अपनी एक अलग पहचान ओर ख्याती है जिसकी हमारे समाज और क्षेत्र में अलग पहचान स्थापित है हमारी संस्कृति ओर भाषा में जैसे कहा भी जाता है कि भारत विभिन्नताओं का देश है जहां अलग-अलग क्षेत्रों ओर प्रदेशों में ओर कुछ ही दूरी पर हम अलग-अलग भाषा ओर परम्परा को देखते ओर सुनते हैं और उसी परिप्रेक्ष्य में हमारी स्थानीय भाषा व संस्कृति भी अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती हैं आज के बच्चे ओर खासकर शिक्षित युवा अपनी पहाड़ी भाषा ओर संस्कृति से अनजान ओर दूर होते जा रहे हैं जबकि आज भी कुछ जिलों और क्षेत्रों में अपनी संस्कृति ओर भाषा को अधिकांश स्थानों में बोली जाती है और संस्कृति को बखूबी अपनाया जाता है परन्तु आज अधिकांश क्षेत्रों ओर समाज में अपनी पहाड़ी भाषा बोलने से कुछेक नासमझ विधार्थी ओर युवा शर्म महसूस करते हैं और अपने आप को आधुनिकता के आग में झोंक रहे हैं जो हमारे आने वाले बच्चों ओर भविष्य के युवाओं के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं होगा क्योंकि अगर हम अपनी बहुमूल्य धरोहर ओर आधुनिकता की चाहत में अपनी पहाड़ी भाषा ओर संस्कृति को तिलांजलि दे रहे हैं जो हमारे पूर्वजों की दी हुई अनमोल धरोहर है और हम उन्हीं जड़ों से दूर होते जा रहे हैं तो इससे बढ़कर क्यों बिडबना ओर दुःख हो सकता है हम आज भी अनेकों क्षेत्रों ओर जिलों पाते हैं कि हम जीवन में जितनी भी तरक्की ओर उन्नति पा जाएं परन्तु हमें अपनी संस्कृति ओर भाषा को सदैव जीवित रखना पड़ेगा जिससे हमारी पहचान ओर विश्वास जुड़ा है।

संस्कृति को जहां हम अपने रिति रिवाजों,परंपराओं वेश भूषा,भान पान मेले, त्योहारों,रहन सहन, धार्मिक स्थलों विभिन्न क्षेत्रों के गीत संगीत इत्यादि का तात्पर्य संस्कृति से रहता है तो वहीं भाषा हमें हमारी पहचान ओर अपनी जड़ों से जुड़ा रहना सिखाती है जिसको हमें ताउम्र अपनाने ओर प्रयोग करने की परम् आवश्यकता आज के परिप्रेक्ष्य में बनी हुई है आज का युवा पहाड़ी भाषा बोलने ओर जानने से भी शर्म महसूस करता है क्योंकि अब वह आधुनिकता के दौर में प्रवेश कर चुका है जिसमें इन सब बातों ओर अपनी पहचान को कायम रखने का समय ही नहीं है और ना कोई सरोकार रह गया है जिसका अंदाजा हम अपने क्षेत्रों में अपनी लोक संस्कृति को ना अपनाकर डीजे ओर अंग्रेजी गानों में अपने आप को भूलते जा रहे हैं तो वहीं अपने स्थानीय पहाड़ी भाषा का बहुत कम प्रयोग अपने दिनचर्या में बोलने ओर जानने में करते हैं क्योंकि आज हम अधिकांश समय ओर क्षेत्र में अंग्रेजी ओर हिन्दी भाषा का प्रयोग करके अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं और अपनी मूल व पहाड़ी भाषा को दिन प्रतिदिन भूलते ओर बहुत कम अपनाते जा रहे हैं इसमें कोई दोहराई नहीं है कि समय के साथ साथ हमें भी बदलना चाहिए परन्तु अपने स्थानीय पहाड़ी भाषा ओर संस्कृति को हमारे अनुभव अनुसार अपने जीवन ओर अपने आने वाले भविष्य को जरूर जागरूक ओर इन अनमोल धरोहरों ओर अलग पहचान की अहमियत को सदैव अपनाने की जरूरत है ताकि लुप्त होती हमारी संस्कृति ओर पहाडी भाषा को पुनः स्थापित ओर संचालित किया जा सके। संस्कृति जहां हमें उस क्षेत्र के इतिहास की जानकारी ओर रिति रिवाजों का वोध करवाती है तो वहीं स्थानीय पहाड़ी भाषा वहां की स्थानीय बोली ओर अपनत्व से हमें उस क्षेत्र की पहचान ओर ओर आपसी प्रेम और विश्वास को दर्शाती है..!

✍️ स्वतन्त्र लेखक हेमराज राणा सिरमौर

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